Explainer: फाइटर जेट इंजन की फैक्ट्री बनेगा भारत, US के बाद फ्रांस भी 100% इंजन टेक्नोलॉजी देने के लिए तैयार
France Ready For 100% Jet Engine Transfer To India: फ्रांस में भारत के राजदूत जावेद अशरफ ने कहा है, कि सफरान भारतीय लड़ाकू विमान के इंजन निर्माण के लिए 100 प्रतिशत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए तैयार है। जावेद अशरफ, 26 जनवरी को नई दिल्ली में गणतंत्र दिवस परेड में चीफ गेस्ट बने फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों की भारत की राजकीय यात्रा के दौरान मीडिया को संबोधित कर रहे थे।
यानि, अमेरिका के बाद फ्रांस दूसरा देश बन गया है, जिसने भारत में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का फैसला लिया है और भारतीय लड़ाकू विमानों के लिए इंजन बनाने का फैसला किया है।

पिछले साल जून में जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अमेरिका के राजकीय दौरे पर गये थे, उस वक्त अमेरिकी हथियार कंपनी जीई ने भारत में इंजन निर्माण के लिए समझौता किया था, जिसका दफ्तर बैंगलौर में खुल चुका है और माना जा रहा है, कि अगले तीन सालों में इंजन का निर्माण शुरू हो जाएगा। अमेरिकी इंजन, भारत के तेजस फाइटर जेट में इस्तेमाल किया जाएगा।
फ्रांस के साथ विमान इंजन टेक्नोलॉजी ट्रांसफर डील
भारत और फ्रांस पहले से ही सफरान और भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के बीच सहयोग पर चर्चा कर रहे हैं। जुलाई 2023 में, भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की पेरिस की आधिकारिक यात्रा के दौरान, दोनों देशों ने घोषणा की थी, कि लड़ाकू जेट इंजन के लिए संयुक्त विकास परियोजना का रोडमैप उस वर्ष के अंत तक तैयार किया जाएगा। हालांकि, अभी तक रोडमैप की कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।
अशरफ ने कहा, कि वर्तमान में जो बातचीत चल रही है, उसका फोकस "भारत की भविष्य की लड़ाकू जेट जरूरतों को पूरा करने के साथ इंजन की जरूरतों की पहचान करना है, यानि भारत को किस तरह का इंजन चाहिए, उसकी पहचान करना है।" उन्होंने कहा, कि भारत सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी के ट्रांसफर पर ही बात नहीं कर रहा है, बल्कि उससे भी आगे, पूरी तरह से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की तलाश में है।
भारतीय राजदूत के मुताबिक, भारत जिस सौदे की तलाश में है, उसमें इंजन के वास्तविक डिजाइन, इंजन के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले धातुओं की पहचान के साथ साथ, तमाम तरह के तत्वों की गहराई तक पहचान करना शामिल है, ताकि भारत एडवांस इंजन का विकास कर सके। हालांकि, अशरफ ने माना, कि सौदे पर बातचीत जटिल थी, और जटिलताओं से निपटने के लिए भारत की समग्र सैन्य आवश्यकता लक्ष्यों को पूरा करने के लिए सामान्य आधार खोजने की आवश्यकता थी।

भारत से जुड़ना चाहता है सफरान
एयरोस्पेस उद्योग में सफरान एक प्रमुख खिलाड़ी है, जो डिजाइन डेवलपमेंट्स, प्रमाणन और उत्पादन सहित एडवांस मध्यम लड़ाकू विमान (AMCA) परियोजना के विभिन्न चरणों में भारतीय सैन्य अनुसंधान एजेंसी के साथ जुड़ने का इच्छुक रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, जब यह सौदा पूरा हो जाएगा, तो यह दूसरी ऐसी व्यवस्था होगी, जो भारत ने हाल ही में अपने स्वदेशी लड़ाकू विमान परियोजनाओं के लिए जेट इंजन की अधूरी जरूरत को पूरा करने के लिए की है।
AMCA के लिए सफरान, Tejas Mk2 के लिए GE
जून 2022 में, प्रधानमंत्री मोदी की संयुक्त राज्य अमेरिका की आधिकारिक यात्रा के दौरान, अमेरिकी जेट इंजन निर्माता जनरल इलेक्ट्रिक ने एक मीडिया बयान में घोषणा की थी, कि जीई एयरोस्पेस ने लड़ाकू जेट इंजन बनाने के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं।
जीई ने उस वक्त कहा था, कि "भारत के साथ जुड़ने से कई तरह के नये काम के लिए रास्ते खुलेंगे और कई अमेरिकी संस्थानों को मदद मिलेगी, जो वर्तमान में अतिरिक्त वॉल्यूम के साथ F414 इंजन पर काम का समर्थन करती हैं।"
वहीं, सफरान सौदा, भारत के भविष्य के डबल इंजन AMCA प्रोजेक्ट के लिए जेट इंजन की आवश्यकता को पूरा करेगा। जीई के साथ समझौते से एक और भविष्य के लड़ाकू विमान की बिजली की जरूरतों को देखा जाएगा। जीई जिस इंजन का निर्माण करेगी, उसे तेजस लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट का एमके 2 वेरिएंट में इस्तेमाल किया जाएगा।
भारत ने पहले ही तय कर लिया है, कि उसके तेजस LCA Mk2 विमान में GE F414 जेट इंजन लगाया जाएगा, और उसके LCA Mk1A में भी अमेरिकी इंजन ही इस्तेमाल होगा, जिसके तहत, HAL बैंगलोर में 180 विमान तैयार किए जाएंगे। GE F404 जेट इंजन LCA Mk1 जेट को शक्ति प्रदान करते हैं। भारतीय वायुसेना के बेड़े में पहले ही 40 तेजस MK-1 फाइटर जेट को शामिल किए जा चुके हैं, जो दो स्क्वाड्रन में ऑपरेशन के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
GE के साथ समझौते में भारत में F414 इंजन का संभावित संयुक्त उत्पादन शामिल है। LCA Mk2 के लिए चल रहे विकास कार्यक्रम के हिस्से के रूप में आठ F414 इंजन वितरित किए गए हैं।
GE ने 1986 में F404 इंजन के साथ भारत के हल्के लड़ाकू विमान (LCA) के विकास का समर्थन करने के लिए एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी और HAL के साथ काम करना शुरू किया था। इसके बाद, GE एयरोस्पेस के F404 और F414 LCA Mk1 और LCA Mk2 के विकास और उत्पादन कार्यक्रमों का हिस्सा रहे हैं। GE ने 75 F404 इंजन वितरित किए हैं, वहीं अन्य 99 एलसीए एमके1ए के लिए ऑर्डर दिए गये हैं।

जेट इंजन टेक्नोलॉजी के लिए भारत की प्यास
जेट इंजन टेक्नोलॉजी का ना होना, भारत की डीआरडीओ की क्षमताओं में महत्वपूर्ण कमियों में से एक है, क्योंकि डीआरडीओ ने स्वदेशी इंजन बनाने के लिए लगातार कोशिशें की हैं, लेकिन ये कोशिशें नाकाम रही हैं। वहीं, सफरान के साथ जो डील हो रही है, उसे 'शक्ति' इंजन परियोजना कहा जाएगा।
भारत ने जेट इंजन के घरेलू निर्माम के लिए 1986 में पहली बार कोशिशें शुरू की थी, जब डीआरडीओ के गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (जीटीआरई) के तहत परियोजना को 'कावेरी' नाम दिया था, जिसके तहत टर्बोफैन तकनीक का उपयोग करके जेट इंजन का निर्माण करने का प्रयास था। टर्बोफैन पावरप्लांट को विमान को वायुमंडलीय ग्लाइड और सुपरमैनुवरेबिलिटी प्राप्त करने के लिए पर्याप्त थ्रस्ट सक्षम होना चाहिए।
भारत की इस परियोजना के लिए अमेरिका ने 53 मिलियन डॉलर की फंड दी थी और कावेरी प्रोजेक्ट, तेजस लड़ाकू जेट परियोजना का हिस्सा थी। हालांकि, यह योजना कावेरी इंजनों के 17 प्रोटोटाइपों के लिए थी, जिसकी पहली बोली केवल कोर मॉड्यूल को ही हासिल कर सकी, जिसे 'काबिनी' कहा जाता है। तीसरा प्रोटोटाइप, पहले तीन कंप्रेसर चरणों पर वैरिएबल इनलेट गाइड वेन्स प्राप्त करने वाला पहला प्रोटोटाइप था और इसका पहला रन इन साल 1995 था।
1996 में, कावेरी इंजन का पहला फूल ऑपरेशन किया गया और सभी पांच ग्राउंड-परीक्षण प्रोटोटाइप का परीक्षण 1998 में किया गया। प्रारंभिक उड़ान परीक्षण 1999 के लिए योजनाबद्ध थे, और तेजस पर परीक्षण 2000 में होना था। हालांकि, 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद भारत पर अमेरिका ने कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए, लिहाजा, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का काम अटक गया और कावेरी परियोजना की रफ्तार धीमी हो गई।
हालांकि, कावेरी प्रोजेक्ट 2004 तक तेजी से चलता रहा, लेकिन 2004 के मध्य में रूस में महत्वपूर्ण टेस्ट फेल हो गया, जिससे तेजस विमान में स्वदेशी इंजन लगाने की सारी उम्मीदें खत्म हो गईं। तब तक कावेरी इंजन 1,700 घंटे का परीक्षण कर चुका था।
कावेरी इंजन को उसके दूसरे उच्च-ऊंचाई परीक्षण के लिए 2008 में फिर से रूस भेजा गया था, हालांकि 2007 में, जीटीआरई ने परियोजना को दो अलग-अलग कार्यक्रमों में विभाजित करने का फैसला लिया। K9+ कार्यक्रम पूर्ण डिजाइन और एकीकरण और उड़ान परीक्षणों में अनुभव के लिए अवधारणा का प्रमाण था, और K10 कार्यक्रम विदेशी सहयोग के माध्यम से अंतिम उत्पादन संस्करण था।
विभिन्न परीक्षणों और कठिनाइयों के बाद, 2016 में, भारत ने कावेरी इंजन को तेजस फाइटर जेट के योग्य बनाने के लिए सफरान के साथ सहयोग की घोषणा की। हालांकि, योजना अब भविष्य में भारत के स्वदेशी मानवरहित लड़ाकू हवाई वाहनों को शक्ति देने के लिए कावेरी को तैयार करने की है।
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