'रुपया कमजोर नहीं, डॉलर हो रहा है मजबूत...', जानिए क्यों एकदम सही है निर्मला सीतारमण का ये कहना
सोशल मीडिया के साथ साथ विपक्षी पार्टियों ने भी निर्मला सीतारमण पर जमकर हमले किए और कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी भारत यात्रा से निर्मला सीतारमण के इस बयान का मजाक बनाने के लिए वक्त निकाल लिया।
Nirmala Sitharaman Indian Rupee vs Dollar: भारतीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले हफ्ते अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन में विवादास्पद टिप्पणी की थी, कि भारतीय रुपया कमजोर नहीं हुआ है, असल में यह अमेरिकी डॉलर है जो मजबूत हुआ है। भारतीय वित्तमंत्री के इस बयान का सोशल मीडिया पर जमकर मजाक उड़ाया गया और मीम्स बनाए गये। सीतारमण ने शुक्रवार को वाशिंगटन डीसी में एक मीडिया ब्रीफिंग में कहा था, कि "भारतीय रुपये ने कई अन्य उभरती बाजार मुद्राओं की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है।" उन्होंने कहा कि, "भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) रुपये की अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए काम किया है और रुपया फिर से अपने स्तर पर पहुंच जाएगा।" सोशल मीडिया पर वित्तमंत्री का ये बयान सुर्खियों में रहा और उनकी जमकर आलोचना की गई, लेकिन आंकड़े बताते हैं, कि वित्तमंत्री ने जो कहा है, वो बिल्कुल सही और सटीक है, क्योंकि साल 2022 में अमेरिकी डॉलर लगातार मजबूत ही हुआ है।

वित्तमंत्री की जमकर आलोचना
सोशल मीडिया के साथ साथ विपक्षी पार्टियों ने भी निर्मला सीतारमण पर जमकर हमले किए और कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी भारत यात्रा से निर्मला सीतारमण के इस बयान का मजाक बनाने के लिए वक्त निकाल लिया और कहा कि, "भूख और कुपोषण में भारत 121 देशों में 107वें स्थान पर! अब प्रधानमंत्री और उनके मंत्री कहेंगे,'भारत में भुखमरी नहीं बढ़ रही है, बल्कि दूसरे देशों में लोगों को भूख ही नहीं लग रही है।' उन्होंने आगे कहा कि, "RSS-BJP कब तक असलियत से जनता को गुमराह कर, भारत को कमज़ोर करने का काम करेगी"? वहीं, आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा ने सीतारमण का वीडियो ट्वीट करते हुए उनपर तंज कसा कि, 'मेरा अर्थशास्त्र कमजोर नहीं है, बल्कि तुम्हारा मजबूत है"। कुल मिलाकर निर्मला सीतारमण की जमकर आलोचना की गई, लेकिन क्या निर्मला सीतारण ने गलत कहा? आइये पड़ताल करते हैं।

निर्मला सीतारमण ने वास्तव में कहा क्या?
अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन में इस सवाल पर, कि रुपया किस चुनौतियों का सामना कर रहा है और इसकी "फिसलने" से बचाने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं? निर्मला सीतारमण ने कहा कि, "सबसे पहले, मैं इसे रुपये की गिरावट के रूप में नहीं देखूंगी, और इसे मैं डॉलर की मजबूती के रूप में देखूंगी ... डॉलर की मजबूती में लगातार इजाफा। तो जाहिर तौर पर अन्य सभी मुद्राएं मजबूत डॉलर के मुकाबले प्रदर्शन कर रही हैं और... मैं तकनीकी बातों की बात नहीं कर रही हूं, लेकिन वास्तविकता यह है, कि भारत का रुपया शायद इस डॉलर को झेल चुका है... आप जानते हैं, दरें बढ़ रही हैं और एक्सचेंज रेट भी डॉलर की मजबूती के पक्ष में है। और...मुझे लगता है कि भारतीय रुपये ने कई अन्य उभरती बाजार मुद्राओं की तुलना में काफी बेहतर प्रदर्शन किया है...।"

तो, पहला प्वाइंट, क्या डॉलर मजबूत हो रहा है?
हां, डॉलर "लगातार" मजबूत हो रहा है, जैसा कि भारतीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है। रुपये का उदाहरण लेकर देखें तो, एक जनवरी को एक डॉलर 74.50 रुपये था, जो अब 82.30 रुपये से ज्यादा हो चुका है। डॉलर का मूल्य अब एक साल से अधिक समय से लगाता ऊपर की तरफ बढ़ा जा रहा है और सिर्फ रुपये के मुकाबले नहीं, बल्कि दुनिया में हर करेंसी के मुकाबले डॉलर ने अपना वर्चस्व हासिल किया है, जिसमें ब्रिटिश करेंसी पाउंड और यूरोपीय करेंसी यूरो भी शामिल है। यूरोपीय करेंसी यूरो जो एक जनवरी को डॉलर के मुकाबले 0.88 था, वो अब 1.02 है। वहीं, ब्रिटिश पाउंड, जो साल की शुरुआत में डॉलर के मुकाबले 0.73 था, वो अब 0.89 है। इसी अवधि में, ऑस्ट्रेलियाई डॉलर 1.37 से 1.61 हो गया है, और जापानी येन डॉलर के मुकाबले 115 से बढ़कर 148 हो गया है।

डॉलर क्यों मजबूत हो रहा है?
बहुत बुनियादी स्तर पर देखें तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था अन्य अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बेहतर प्रदर्शन कर रही है। मुद्रास्फीति की उच्च दर के बावजूद अमेरिका में नौकरी बाजार ने शानदार प्रदर्शन किया है और सर्विस सेक्ट्र जैसे क्षेत्रों में लचीलापन बना हुआ है। इससे निवेशकों का अमेरिकी बाजार में विश्वास बढ़ा है, और हाउसिंग सेक्टर में मंदी जैसी चिंताओं को दूर किया है।

दूसरी बात, क्या रुपया अन्य मुद्राओं से बेहतर कर रहा है?
हां, बिल्कुल यह सही बात है। भारतीय रुपये ने दूसरी करेंसी के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है। जबकि रुपया सितंबर में डॉलर के मुकाबले 2.6% गिर गया था और 81 और 82 के मनोवैज्ञानिक सीमारेखा को तोड़ते हुए, यह वर्तमान परिवेश में दुनिया की सबसे स्थिर मुद्राओं में शामिल हो गया है। क्योंकि, अस्थिर बाजार ने लगभग दुनिया की सभी मुद्राओं और अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित किया है। इसलिए, सितंबर में डॉलर के मुकाबले कोरियाई मुद्रा में लगभग 6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी और ब्रिटिश मुद्रा पाउंड को भी लगभग उतना ही नुकसान हुआ था। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर में 4.8% की गिरावट आई और स्वीडिश मुद्रा क्रोना, चीनी मुद्रा युआन और फिलीपीन की मुद्रा पेसो में क्रमशः 4.6%, 4.1% और 4.1% की गिरावट आई। लिहाजा, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, इन मुद्राओं के विपरीत रुपये में तुलनात्मक रूप से कम गिरावट आई है। भारतीय रुपये में सिर्फ 2.6% की ही गिरावट आई है, जो यूरोपीय मुद्रा यूरो में आई गिरावट के बराबर है, जिसमें सितंबर में 2.4% की गिरावट आई थी।
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