कहीं बाढ़ से बर्बादी, कहीं गर्मी से हाहाकार, वैज्ञानिकों ने कहा...आएगी तबाही, दुनिया में अब कोई सुरक्षित नहीं
यूरोपीय देशों में विनाशकारी बाढ़ और अमेरिका-कनाडा में ऐतिहासिक गर्मी ने बता दिया है कि धरती पर इंसान खतरे में आ गया है और कोई भी अब सुरक्षित नहीं है।
नई दिल्ली, जुलाई 18: यूरोप के कुछ सबसे अमीर देश इस हफ्ते अस्त-व्यस्त हो गए। जर्मनी और बेल्जियम में पिछले सौ सालों में ऐसा संकट नहीं आया है, जैसा पिछले एक हफ्ते में आया है। दर्जनों नदियां ओवरफ्लो हैं और शहरों में कई फीट पानी भरा हुआ है। जर्मनी की बड़ी आबादी खतरे में है और हजारों लोग लापता हैं। यूरोपीय देशों में विनाश की इन तस्वीरों ने पूरी दुनिया को सन्नाटे में ला दिया है। तो दूसरी तरफ अमेरिका और कनाडा में इस बार जितनी गर्मी पड़ रही है, उतनी गर्मी आजतक नहीं पड़ी है। अमेरिका और कनाडा में भीषण गर्मी और लू की वजह से सैकड़ों लोग मारे गये हैं। कनाडा में कई समुद्री तटों पर पानी इतना गर्म हो गया कि लाखों समुद्री जानवरों की उबलने से मौत हो गई। इन घटनाओं पर आप आश्चर्य कर सकते हैं, लेकिन ये घटनाएं पूरी तरह से सच हैं, लिहाजा वैज्ञानिकों ने साफ कह दिया है कि प्रकृति के साथ इंसानों ने जो किया है, उससे अब हर कोई खतरे में आ गया है।

अमेरिका में गर्मी से हाहाकार
संयुक्त राज्य अमेरिका के उत्तर-पश्चिमी हिस्से अपनी ठंढ़े मौसम के लिए जाना जाता है। इन इलाकों में साल भर बर्फबारी होती है, लेकिन पिछले एक महीने में सैकड़ों लोग भीषण गर्मी की वजह से मारे गये हैं। कनाडा में इतनी ज्यादा गर्मी पड़ने लगी कि जंगलों में आग लगने लगी। जिसकी वजह से जंगलों के आसपास बसे दर्जनों गांव पूरी तरह से जल गये। वहीं, रूस में इस साल रिकॉर्ड तापमान दर्ज किया गया है। वहीं, इस हफ्ते के अंत में अमेरिका के उत्तरी रॉकी पर्वत के किनारे बसे जंगलों में ऐसी आग लगी, जो एक के बाद एक 12 राज्यों में फैलती चली गई। जिसकी चपेट में आने से हजारों जंगली जानवर मारे गये हैं। ऐसे में सवाल ये है कि पूरी दुनिया के मौसम में अचानक हुए परिवर्तन की वजह क्या है ?
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संकट में पूरी दुनिया
पूरे यूरोप और उत्तरी अमेरिका में मौसम जी भरकर अपना कहर बरपा रहा है, जिसके इतिहास और विज्ञान को देखते हुए दो अहम बातें निकलकर सामने आ रही हैं। पहली बात ये कि दुनिया अब भी जलवायु परिवर्तन को लेकर सीरियस नहीं है और ना ही इसके साथ जीने की तैयारी कर रहा है। पिछले एक हफ्ते में पूरी दुनिया मौसम के जिस कहर को बर्दाश्त करने के लिए मजबूर हो रही है, उसने साबित कर दिया है कि पिछले सौ सालों में यूरोप और अमेरिका के सबसे धनी देशों ने प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ किया है, कोयला, तेल और गैस जलाकर प्रकृति का जो दोहन किया है, उसने दुनिया को बर्बादी के रास्ते पर ला खड़ा किया है। विश्व के मौसम में आया ये खतरनाक परिवर्तन ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का ही नतीजा है, जिससे दुनिया गर्म हो रही है, बर्फ पिघल रहे हैं और दुनिया तबाही के रास्ते पर फिसलती जा रही है।

प्रकृति में नहीं ढल रहे हैं इंसान?
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में फिजिक्स के प्रोफेसर फ्रेडरिक ओटो ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा है कि ''यह विचार की आप मौसम बदलने से मर सकते हैं, ये काफी अलग है। क्योंकि, अभी तक हमारी दुनिया ने इस तरफ सोचना भी नहीं शुरू किया है कि प्रकृति के अनुकूल होकर कैसे रहना है और कैसे इंसानों की जिंदगी बचानी है?'' यूरोप में बाढ़ ने कम से कम 200 से ज्यादा लोगों की जान ले ली है, और हजारों लोग लापता हैं। जिनमें से ज्यादातर यूरोप की सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्था जर्मनी के रहने वाले हैं। जर्मनी, बेल्जियम और नीदरलैंड में हजारों लोग लापता बताए गए हैं, जिससे पता चलता है कि मरने वालों की संख्या बढ़ सकती है। अब सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या अधिकारियों ने जनता को चेतावनी जारी की थी ? लेकिन, बड़ा सवाल यह है कि क्या विकसित दुनिया में बढ़ती आपदाओं का असर दुनिया के सबसे प्रभावशाली देशों और कंपनियों पर पड़ेगा कि वे ग्लोबल वॉर्मिंग और खतरनाक गैसों उत्सर्जन को कम कर सकें?

खतरे में धंसती जा रही है दुनिया
ग्लोबल वार्मिंग ने दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में खतरे की घंटी को जोर-जोर से बजाना शुरू कर दिया है और विश्व के सबसे विकसित देश असहाय हैं। जाहिर है, प्रकृति के आगे आपका वश नहीं चल सकता है। बांग्लादेश में फसलों का सफाया हो गया है और समुद्री जलस्तर बढ़ने से छोटे द्वीप में बसे देशों का अस्तित्व ही संकट में आ गया है। टाइफून हैयान तूफान ने 2013 में फिलीपींस को करीब करीब तबाह ही कर दिया था, जिसके बाद विकासशील देशों मे जलवायु परिवर्तन से होने वाले आपदाओं के लिए विकसित देशों पर नुकसान की भरपाई के लिए दवाब डालना शुरू कर दिया था, लेकिन उस मांग को यूरोपीयन देशों के साथ साथ अमेरिका ने खारिज कर दिया। इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए भारत में जलवायु निदेशक उल्का केलकर ने कहा कि, "विकासशील देशों में मौसम के प्रकोप की वजह से अकसर भीषण घटनाएं घटती हैं, लेकिन इन्हें हमारी जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता है, न कि सौ साल से अधिक समय तक प्रकृति में जहरीली गैसों का उत्सर्जन करने वाले देशों की जिम्मेदारी तय की जाती है?'' उन्होंने कहा कि ''अब ये प्राकृतिक आपदाओं ने विकसित देशों को मारना शुरू किया है तो वो पूरी दुनिया से मदद मांग रहे हैं''

जहरीली गैस छोड़ने में चीन अव्वल
दरअसल, 2015 के पेरिस समझौते पर बातचीत के बाद से जलवायु परिवर्तन के सबसे बुरे प्रभावों को टालने का लक्ष्य भले ही रखा गया, लेकिन अभी भी ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन काफी तेजी से जारी है। चीन आज दुनिया मेंम सबसे ज्यादा जहरीली गैस का उत्सर्जन कर रहा है। सैकड़ों सालों के बाज जाकर अब संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय दोनों में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में गिरावट आई है, लेकिन वैश्विक तापमान को स्थिर रखने के लिए अभी काफी तेजी से काम करने की जरूरत है। छोटे द्वीपों पर बसे मालदीव जैसे देशों के सामने अब अस्तित्व बचाने की चिंता है और वहां की सरकार बार बार इस खतरे के लिए आवाज उठा रही है।

विज्ञान से विनाशकारी चेतावनी
वैज्ञानिकों ने जलवायु मॉडल का अध्ययन करने के बाद दुनिया के लिए विनाशकारी चेतावनी जारी की है। 2018 में वैज्ञानिकों ने कहा है कि किसी भी तरह से दुनिया का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस कम करना कम करना जरूरी है, नहीं तो दुनिया के कई हिस्सों में बाढ़, समुद्र के तटीय शहरों में भयानक ज्वार आएगा। जो अब दिखने लगा है। वैज्ञानिकों ने कहा है कि अब जो दुनिया की स्थिति बन गई है, उसमें कोई भी सुरक्षित नहीं है और जिस रफ्तार से प्रदूषण बढ़ रहा है, कुछ सालों बाद स्थिति हद से ज्यादा बर्बाद हो जाएगी, जो इंसानों के लिए विनाशकारी होगा।












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