पाकिस्तान के नसीब में अब बम धमाके लिखे हैं... जानिए कैसे खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान बना TTP का गढ़?
TTP terror in Pakistan: रविवार को पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी प्रांत खैबर पख्तूनख्वा में एक राजनीतिक रैली में हुए विस्फोट में कम से कम 44 लोगों की जान चली गई और 200 से ज्यादा लोग गंभीर घायल हुए हैं। स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक, मरने वाले लोगों की संख्या में इजाफा हो सकता है।
ये बम धमाका, यह घटना पूर्व आदिवासी क्षेत्र बाजौर में की गई है, जहां रूढ़िवादी कट्टरपंथी जमीयत उलेमा इस्लाम-फजल (जेयूआई-एफ) पार्टी की एक सभा हो रही थी। जेयूआई-एफ, कट्टरपंथी विचारधारा के लिए प्रसिद्ध है और इसके कार्यक्रम में करीब 500 लोग जुटे थे। जेयूआई-एफ ने शहबाज शरीफ को समर्थन दे रखा है, यानि, एक कट्टरपंथी पार्टी के समर्थन की बुनियाद पर पाकिस्तान की सरकार चल रही है।

और पाकिस्तान में दर्जनों ऐसी कट्टरपंथी पार्टिया हैं, जो अपने अपने फायदे के हिसाब से इस्लाम की व्याख्याएं करती हैं और पाकिस्तानी समाज में अपनी जड़ें जमा चुकी हैं। तहरीक-ए-तालिबान भी उनमें से एक है, जिसे पाकिस्तान सरकार ने आतंकी संगठन घोषित कर रखा है, लेकिन खैबर पख्तूनख्वा में इसे जितना समर्थन हासिल है, वो पाकिस्तान के लिए खतरनाक है, लेकिन इसके लिए जिम्मेदार भी खुद पाकिस्तान ही है।
खैबर पख्तूनख्वा कैसे बना अभिशाप?
खैबर पख्तूनख्वा की सीमा अफगानिस्तान से लगती हैं और अफगानिस्तान से टीटीपी के आतंकी आकर पाकिस्तान में हमला करते हैं, और फिर अफगानिस्तान चले जाते हैं और पाकिस्तान की सेना हाथ पर हाथ धरे देखती रह जाती है।
खैबर पख्तूनख्वा के अलावा, बलूचिस्तान, जहां पाकिस्तान की आर्मी ने जुल्म की हर हदें पार कर दी थीं, वहां कई संगठन बन चुके हैं, जो अब आर्मी के खिलाफ खड़ी हैं और अब इन्होंने टीटीपी से हाथ मिला लिए हैं।
बलूचिस्तान के संगठन और टीटीपी ने अब पाकिस्तान में एक साथ बम धमाकों को अंजाम देना शुरू कर दिया है। लिहाजा, खैबर पख्तूनख्वा के साथ साथ बलूचिस्तान में हर दूसरे दिन भीषण बम धमाके होते रहते हैं।
पाकिस्तान के आर्मी चीफ और रक्षा मंत्री ने अफगानिस्तान के तालिबान शासकों को धमकी दी, कि टीटीपी और दूसरे प्रतिबंधित संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की जाए, लेकिन तालिबान ने इसे पाकिस्तान की अंदरूनी समस्या बताकर इससे पल्ला झाड़ लिया।
पाकिस्तान को सिर्फ इस महीने अभी तक 31 से ज्यादा बड़े हमलों का सामना करना पड़ा है।
अफगान तालिबान को किसी भी वैश्विक दबाव से बचाने के लिए टीटीपी ने अब एक नया संगठन बना लिया है, जिसका नाम है टीजेपी यानि तहरीक-ए-जिहाद पाकिस्तान। वहीं, पाकिस्तान की मुश्किलें बलूच लिबरेशन आर्मी ने पहले से ही काफी बढ़ा रखी हैं, जिसने बलूचिस्तान में अपने हमले बढ़ाने का फैसला किया है।
जिसके बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने तालिबान पर 'पड़ोसी और भाईचारे वाले देश के रूप में अपने कर्तव्यों की उपेक्षा' करने का आरोप लगाया। उन्होंने यह भी दावा किया, कि तालिबान दोहा समझौते का पालन नहीं कर रहा है, लेकिन इसके जवाब में तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने कहा, कि 'हमने दोहा समझौता पाकिस्तान के साथ नहीं, बल्कि अमेरिका के साथ किए हैं।'
दोहा समझौते में उल्लेख किया गया है, 'अमेरिका और उसके सहयोगियों की सुरक्षा के खिलाफ किसी भी अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी समूहों या व्यक्तियों द्वारा अफगान धरती के उपयोग को रोकने की गारंटी।'
पाकिस्तान अमेरिका का सहयोगी नहीं है, लेकिन आतंकवाद का एक प्रबल समर्थक रहा है। जबीहुल्लाह मुजाहिद ने उन्हीं टिप्पणियों को दोहराया, जो पाकिस्तान सालों से भारत के आरोपों पर दोहराता रहा है। तालिबानी प्रवक्ता ने कहा, कि 'अफगानिस्तान में कोई टीटीपी नहीं है। अगर पाकिस्तान के पास कोई सबूत है, तो उसे हमारे साथ साझा करना चाहिए। हमारे क्षेत्र का उपयोग पाकिस्तान के खिलाफ नहीं किया जाता है।'
ये डायलॉग पाकिस्तान ने हमेशा से भारत के आरोपों पर बोला है और अब तालिबान वही शब्द दोहरा रहा है।
यह वही पाकिस्तान है, जिसने अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के कब्ज़ा होने पर जश्न मनाया था। तत्कालीन प्रधान मंत्री इमरान खान ने कहा था, कि "अफगानिस्तान ने 'गुलामी की बेड़ियां' तोड़ दी हैं।
उनकी पार्टी की प्रवक्ता नीलम इरशाद शेख ने एक टीवी डिबेट में खुशी से टिप्पणी की थी, कि 'तालिबान ने कहा है, कि वे हमारे साथ हैं और वे कश्मीर को (मुक्त) करने में हमारी मदद करेंगे।' पाकिस्तान के तत्कालीन डीजी आईएसआई जनरल फैज हमीद, खुशी से उछलते हुए काबुल तक पहुंच गये थे।
पाकिस्तान में इसलिए जश्न मनाया गया, क्योंकि उसे लग रहा था, कि अफगानिस्तान अब उसके घर का बैकयार्ड बन चुका है। फैज हमीद ने काबुल के एक होटल में कहा था, कि 'चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा।'
लेकिन, अब अफगानिस्तान की जमीन से पाकिस्तान का रोज खून बहाया जाता है और तालिबान आंख मूंदकर बैठा है।

तालिबान बनाम पाकिस्तान
तालिबान ने डूरंड रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा मानने से खारिज कर दिया है। इसके रक्षा मंत्री, मौलवी मुहम्मद याकूब मुजाहिद ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसे सिर्फ एक 'रेखा' कहा है, सीमा नहीं।
उन्होंने टीटीपी को समर्थन देने के पाकिस्तान के आरोपों को भी खारिज कर दिया और कहा कि अगर वह अफगानिस्तान में होता, तो वह पाकिस्तान की सीमा चौकियों पर हमला करता, न कि देश के भीतर के स्थानों पर।
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान टीटीपी के खिलाफ अपनी रक्षा करने में असमर्थ है, इसलिए अफगानिस्तान पर आरोप लगाता है।
पाकिस्तान का ही पुराना पाप है टीटीपी
ऐसा नहीं है, कि टीटीपी कोई नया संगठन है। यह जुलाई 2007 में इस्लामाबाद की लाल मस्जिद पर मुशर्रफ की कार्रवाई के बाद उभरा था। लाल मस्जिद पर मुशर्रफ के आदेश के बाद हमला किया गया था, जिसमें 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी।
जिसके बाद टीटीपी का निर्माण हुआ, जिसका पहला हमला जर्रार कंपनी के उच्च सुरक्षा बेस पर था। पाकिस्तानी सेना की ये वो वही टुकड़ी थी, जिसने लाल मस्जिद पर हमला किया था। जर्रार सुरक्षा बेस पर टीटीपी के एक आत्मघाती हमलावर ने खुद को उड़ा लिया था, जिसमें 22 पाकिस्तानी सैनिक मारे गये थे।
जिसके बाद टीटीपी का सबसे दुस्साहसिक हमला दिसंबर 2014 में पेशावर के आर्मी स्कूल पर हुआ था, जिसमें सवा सौ से ज्यादा बच्चों समेत 150 से ज्यादा लोग मारे गये थे।
फिर भी, पाकिस्तान ने तालिबान को समर्थन देना और उसे पैसों के साथ साथ हथियार पहुंचाने का काम जारी रखा। दूसरी तरफ, इमरान खान की सरकार ने टीटीपी से शांति समझौता किया और ये मान लिया, कि अब टीटीपी का खतरा खत्म हो जाएगा।
जबकि, खुद पाकिस्तान के एक्सपर्ट्स ये कहते रहे, कि टीटीपी और तालिबान एक हैं, लेकिन पाकिस्तान की सरकार और सैन्य संस्थान, जो अपनी खतरनाक मंसूबों के लिए खतरनाक है, उसने टीटीपी के खतरों को कम करके आंका, जबकि इस दौरान टीटीपी लगातार खैबर पख्तूनख्वा में अपना जनाधार बढ़ाती रही और उसने बलूचिस्तान के फ्रीडम फायटर्स के साथ हाथ मिलाना जारी रखा। लिहाजा, अब टीटीपी को खैबर पख्तूनख्वा के साथ साथ बलूचिस्तान में भी भारी समर्थन हासिल हो चुका है।
पाकिस्तान को इस साल मार्च में भी, टीटीपी-तालिबान गठबंधन के प्रति जाग जाना चाहिए था, जब तालिबान के हक्कानी समूह के नेता और वर्तमान में आंतरिक मंत्री की, टीटीपी नेता हकीमुल्ला महसूद के साथ नमाज पढ़ते हुए तस्वीरें सामने आईं थीं। लेकिन, पाकिस्तान अभी भी दुनिया को टीटीपी और तालिबान अलग अलग हैं, ये बताता रहता है, क्योंकि उसका अफगानिस्तान पर अदृश्य शासन करने का मोह खत्म नहीं हुआ है।
जब तक काबुल में अमेरिका समर्थित सरकार थी, पाकिस्तान ने टीटीपी के पीछे होने का आरोप भारत पर लगाया। इसने भारत पर टीटीपी को मदद पहुंचाने का आरोप लगाते हुए अनगिनत डोजियर जारी किए। यहां तक कि इसने अपने दावों को आगे बढ़ाने के लिए, काल्पनिक भारतीय चरित्र और नकली इंटरसेप्ट संचार भी बनाए। इन दस्तावेजों में टीटीपी के लिए अफगानिस्तान में भारत द्वारा संचालित तथाकथित प्रशिक्षण शिविरों के स्थान दिए गये थे।
लेकिन, काबुल में तालिबान की सरकार बनने के बाद अब पाकिस्तान ये दावा भी नहीं कर पा रहा है और अब खुद आतंक की मौत मरने के लिए मजबूर है।
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