Explainer: विश्वसनीयता, सक्षमता और उपयुक्तता.. दुनिया की फैक्ट्री बनने के कितना करीब पहुंचा भारत?
India Production Hub: चीन, जिसे अब तक दुनिया की फैक्ट्री कहा जाता रहा है, राष्ट्रपति शी जिनपिंग की नीतियों की वजह से उसके मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को तगड़ा नुकसान पहुंचा है और अमेरिका के साथ चल रहे 'व्यापार युद्ध' की वजह से भारत के पास दुनिया की नई फैक्ट्री बनने का सुनहरा मौका है।
मोदी सरकार इस मौके का बखूबी फायदा उठाने के लिए कई नीतियों के सहारे आगे बढ़ रही है, जिसमें मेक इन इंडिया जैसे प्रोग्राम हैं, जिसके विदेशी निवेशक ना सिर्फ भारत में निवेश को लेकर आकर्षित हो रहे हैं, बल्कि रिपोर्ट्स से पता चलता है, कि भारत पर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए एक विश्वसनीय देश बन चुका है।

लिहाजा, भारत की स्मार्ट नीति और स्मार्ट आबादी के कॉकटेल ने भारत के ग्रोथ रेट को डबल डिजिट में ले जाने का रास्ता खोल दिया है, जो एक बड़ी आर्थिक उपलब्धि है, जिसके लिए पूर्व राष्ट्रपति देंग जियाओपिंग ने रास्ता खोला था, लेकिन शी जिनपिंग उस रास्ते को ब्लॉक करने पर तुले हुए हैं।
अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मन अखबारों में लिखे गये आर्टिकिल्स को पढ़कर जो लोग भारत को 'नफरत का गढ़' मानते हैं, उनके लिए भारत कुछ और भले ही हो सकता है, लेकिन भारत में मैन्युफैक्चरिंग फ्यूचर को पढ़ने वाले विदेशी निवेशकों के लिए अखबारों के कॉलम रद्दी से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं।
और यही वजह है, कि विदेशी निवेशकों ने अरबों डॉलर का निवेश भारत में करने का फैसला किया है।
भारत का मैन्युफैक्चरिंग डेवलपमेंट
भारत, जिसे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सूचना टेक्नोलॉजी के रास्ते पर लाया था, उसका एक शहर बेंगलुरू दुनिया भर में आईटी इंडस्ट्री के लिए प्रख्यात हो चुका है। दुनिया भर से निवेश बेंगलुरू में पहुंच रहा है, खासकर टेक्नोलॉजी सेक्टर में।
Apple के प्रमुख टिम कुक ने एक बार कहा था, कि उनकी कंपनी के उत्पादों के लिए मैन्युफैक्चरिंग सेंटर के रूप में चीन को प्राथमिकता देने का कारण, सिर्फ लागत को लेकर नहीं था, बल्कि "कार्यबल की गुणवत्ता" भी थी।
पिछले दशक में, कामकाजी आबादी के भीतर कौशल सेट के बढ़ते प्रसार ने यह सुनिश्चित किया है, कि भारत में कार्यबल अन्य जगहों के सर्वोत्तम मानकों को पूरा करता है। एक बार जब वे नौकरी पर कुछ महीनों का अनुभव प्राप्त कर लेते हैं, तो भारतीय, उन चीनी श्रमिकों की तुलना में कहीं बेहतर हो जाते हैं, जिन्हें टिम कुक ने बेहतर कहा था।
और इसे आसानी से इस बात से समझा जा सकता है, कि आखिर क्यों एप्पल ने चीन की जगह भारत को चुनने का फैसला किया है।
चाहे वह टेस्ला हो, टीएसएमसी हो या फिर कई देशों की जीडीपी से ज्यादा की साइज वाली कई और कंपनियां, अब भारत को ऐसे देश के रूप में देखा जा रहा है, जहां महत्वपूर्ण पैमाने पर नई उत्पादन क्षमता स्थापित करने की शक्ति है।
प्रोडक्शन कैपिसिटी कैसे बढ़ा रहा भारत?
किसी भी देश के प्रोडक्शन हब बनने के लिए उसकी योग्यता, उसकी उपयुक्तता और उस देश की विश्वसनीयता.. ये तीन शर्ते होती हैं।
हालांकि, इसमें कोई शक नहीं, कि चीन के पास भी ये क्षमताएं हैं, लेकिन चीन की विश्वसनीयता अब पहले जैसी नहीं रही है। वहीं ताइवान और जापान, जो टेक्नोलॉजी मैन्युफैक्चरिंग को लेकर हब रहे हैं, ऐसा लगता है, कि उन्होंने विकास के चरम को हासिल कर लिया है और अब उनका डाउनफाउल शुरू हो गया है।
चीन ने 1980 और 90 के दशक में 10 प्रतिशत से ज्यादा का ग्रोथ रेट ना सिर्फ हासिल किया, बल्कि उसे बरकरार भी रखा, लेकिन शी जिनपिंग की आक्रामकता और पड़ोसी देशों की जमीन हड़पने की नीति ने चीन को एक ऐसे देश के रूप में साबित कर दिया है, जो अब निवेश के लिए खतरनाक साबित हो रहा है।
शी जिनपिंग ने कई विदेशी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए हैं, उनके खिलाफ सख्ततम एक्शन लिए हैं, लिहाजा विदेशी कंपनियों का अब चीन से मोहभंग हो रहा है। एप्पल पर लगाए गये प्रतिबंध की वजह से इसने एक हफ्ते में ही 200 अरब डॉलर चीन में खो दिए थे। लिहाज, ज्यादा से ज्यादा कंपनियां अब चीन से बाहर आने की जद्दोजहद कर रही रही हैं और भारत उनके लिए एक विकल्प बन रहा है।
भारत एक वैकल्पिक उत्पादन मंच के रूप में सक्षम, उपयुक्त और विश्वसनीय देश है, खासकर जहां भू-राजनीतिक कारणों से चीन से बाहर निकलने की इच्छुक कंपनियों को लेकर सवाल है। लिहाजा सवाल ये है, कि क्या मोदी सरकार की विदेशी कंपनियों को लुभाने की पॉलिसी और नरम होने वाली है? ये एक अहम सवाल है और क्या भारत, इज ऑफ डूइंग को और आसान बनाएगा

2014 के बाद से भारत का व्यापार परिवर्तन
2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद चीनी-बहाबी मीडिया ने भारत के खिलाफ जमकर निगेटिव प्रचार किया है, लेकिन मोदी सरकार की नीतियों पर उनका नगण्य प्रभाव पड़ा है। भारत से बाहर रहने के दौरान लोगों के मन में जो विचार बनते हैं, भारत आने के बाद वो विचार बदल जाते हैं। भारत आने के बाद उन्हें पता चलता है, कि चीन समर्थक वामपंथी मीडिया ने भारत के खिलाफ कितना खतरनाक, झूठा और भ्रामक प्रचार कर रखा है।
वामपंथी मीडिया ने भारत के वातावरण को पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक से तूलना कर दी है।
लेकिन, हकीकत ये है, कि 2014 के बाद भारत में निवेश करने वाले निवेशक चीन, जापान और दक्षिण कोरिया से ज्यादा मुनाफा भारत में कमा रहे हैं।
मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान देश में आई स्थिरता, निरंतरता और मानव संसाधन ने दुनिया का ध्यान खींचा है।
सप्लाई चेन को लेकर भारत अब चीन को रिप्लेस कर रहा है, जिससे घबराए चीन-वहाबी लॉबी ने भारत के बारे में गलत सूचनाओं की बाढ़ काफी हद तक बढ़ा दिया है और फिर भी इसका प्रभाव भारत पर कम ही हो रहा है।
चाहे वह क्वाड को सक्रिय करना हो, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और शिंजो आबे द्वारा संयुक्त रूप से की गई उपलब्धि हो, या यूरोप, यूएई, इज़राइल और भारत को जोड़ने वाले I2U2 गठबंधन जैसी परिवहन श्रृंखला में इनोवेशन हो, भारत सरकार ने जियो-पॉलिटिक्स को लेकर सख्त रूख 'इंडिया फर्स्ट' बनाए रखा है।
भारत अब आक्रामकता से चीनी विस्तारवाद का विरोध कर रहा है और इस बार ताइवानी कंपनी फॉक्सकॉन के सीईओ यंग लियू को पद्म पुरस्कार से सम्मानित कर भारत ने इसका ही संकेत दिया है।
ताइवानी कंपनियों के मन भारत सालों से रहा है, लेकिन भारत के मजबूत इरादों ने उन्हें भरोसा दिया है, और इसी वजह से ताइवान की कंपनियां बिना चीनी डर के भारत में आ रही हैं।
दुनिया की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में से फिलहाल तीन एशिया से हैं: चीन, जापान और भारत, और जल्द ही शीर्ष चार में से तीन एशिया से होंगी, जिसमें भारत चौथे स्थान पर जर्मनी को हटा देगा और बाद में जापान को तीसरे स्थान से हटाकर भारत टॉप-3 इकोनॉमी वाले देशों में शामिल हो जाएगा।
स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है, कि वामपंथी लॉबी से भरे होने के बाद भी बाइडेन प्रशासन भारत के साथ संबंधों को विस्तार देने के लिए मजबूर रही है और ओबामा से लेकर ट्रंप तक और फिर बाइडेन प्रशासन तक ने चीन को काउंटर करने के लिए भारत का ही मुंह ताका है।
मोदी सरकार की स्मार्ट पॉलिसीज
शासन के मामलों और नीति की दिशा में निरंतरता को देखते हुए, अगले पांच वर्षों में भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन जाएगा और अगले पांच वर्षों में अमेरिका और चीन के बाद दुनिया की तीसरी महाशक्ति बन जाएगा।
भारत की स्मार्ट नीति और स्मार्ट आबादी के संयोजन ने दोहरे अंकों की वृद्धि की पीढ़ी के लिए रास्ता खोल दिया है, एक आर्थिक उपलब्धि जो अब तक केवल पूर्व चीनी राष्ट्रपति देंग जियाओपिंग के समय चीन ने हासिल की थी।
पिछले एक दशक में भारत निवेश के मामले में सक्षम, उपयुक्त और विश्वसनीय बन गया है। यह आश्चर्य की बात नहीं है, कि विशेषज्ञ आखिरकार 21वीं सदी को भारतीय सदी के रूप में कहने लगे हैं। चाहे अंतरिक्ष हो, महासागर हो, ज़मीन हो या साइबरस्पेस, विकास के अवसरों का इस तरह से लाभ उठाया जा रहा है, जैसा 1947 में औपनिवेशिक शासन से आज़ादी मिलने के बाद के वर्षों में पहले कभी नहीं देखा गया था।












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