मुसीबत में फंसे यूरोपीय देश, सऊदी अरब-UAE नहीं दे रहे बाइडेन को भाव, अब क्या करेगा अमेरिका?
सऊदी अरब और अमेरिका के बीच के संबंध जो बाइडेन के सत्ता में आने के बाद से तनावपूर्ण हो गये हैं, जबकि, डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में सऊदी अरब और अमेरिका के संबंधों में ऐतिहासिक नजदीकी आई थी
नई दिल्ली, अप्रैल 11: यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक संतुलन को उलट-पुलट कर रख दिया है और रूस पर प्रतिबंधों का अत्यधिक असर हो, इसके लिए अमेरिका और यूरोपीय देश लगातार हाथ-पैर मारने में लगे हुए हैं। खासकर जर्मनी ने यूक्रेन युद्ध के दौरान महसूस किया है, कि उन्होंने रूसी ऊर्जा पर इतना निर्भर होकर एक गंभीर गलती की है। लिहाजा, अब यूरोपीय देश, खाड़ी देशों की तरफ रूख कर रहे हैं। लेकिन, सऊदी अरब और यूएई उन्हें भाव नहीं दे रहा है। ऐसे में सवाल ये उठ रहे हैं, कि क्या रूस को पाबंदियों से फर्क पड़ेगा?

गैस के लिए रूस पर निर्भरता
वर्तमान में, यूरोप अपनी प्राकृतिक गैस जरूरतों के लगभग 40 प्रतिशत खरीददारी के लिए रूस पर निर्भर है, और यूरोपीय नेताओं ने अपनी निर्भरता को दो-तिहाई कम करने की कसम खाई है। इसलिए, यूरोपीय देश मध्य पूर्व और भूमध्यसागर से आपूर्ति सुरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। ऊर्जा संकट और ऊर्जा सुरक्षा यूरोप की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक बन गई है, जिसने जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए लड़ाई को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। बेशक, गैस और तेल-समृद्ध खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के सदस्य पहले देश हैं, जिनसे यूरोपीय नेताओं ने भविष्य में रूसी गैस और तेल की खरीददारी कम करने के लिए एक विकल्प के तौर पर चुना है और उनसे यूरोप की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अनुरोध किया है।

यूरोपीय देशों के सामने दिक्कतें
जीसीसी का कहना है कि, वो पहले से ही एशियाई देशों के साथ करार में बंधे हैं और उन्होंने प्रोडक्शन में कमी कर रखी है, लिहाजा हाइड्रोकार्बन के एक्सपोर्ट में वृद्धि करने में वो असमर्थ हैं और उनके सामने पहला लक्ष्य अपने एशियाई ग्राहकों को ऊर्जा उपलब्ध करवाना है, जिनमें चीन और भारत शामिल है, जो मध्यपूर्वी देशों से भारी मात्रा में प्राकृतिक तेल और गैस का आयात करते हैं। एशियाई देशों ने काफी लंबे वक्त के लिए मध्यपूर्वी देशों के साथ अनुबंध कर रखे हैं, लिहाजा यूरोपीय देशों के लिए उन अनुबंधों को कम करना संभव नहीं है। पिछले कुछ हफ्तों में जर्मनी, अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम ने अपने अधिकारियों को सऊदी अरब और संयुक्त अमीरात भेजा था, जो हाइड्रोकार्बन के प्रमुख उत्पादक हैं, और उनसे ऊर्जा आपूर्ति बढ़ाने के लिए अनुरोध किया था, लेकिन सऊदी अरब और यूएई ने अमेरिका, जर्मनी और यूनाइटेड किंगडम की बातों को अनसुना कर दिया।

सिर्फ कतर हुआ था तैयार
मध्यपूर्वी देशों में सिर्फ कतर ही एक ऐसा देश है, जिसने मदद की पेशकश की है और कतर ने ब्रिटेन और बेल्जियम को छह एलएनजी टैंकर भेजे हैं, जो टैंकर असल में एशियाई ग्राहकों के पास जाने वाले थे। कतर ने एक संकेत देने की कोशिश की, कि वह कमी के हिस्से को कवर करने के लिए अपने गैस उत्पादन में वृद्धि करेगा। कतर का अमीरात वर्तमान में अपनी लिक्विड गैस का लगभग 30 प्रतिशत यूरोपीय संघ को आपूर्ति करता है, लेकिन इसमें जर्मनी शामिल नहीं है, क्योंकि उसके पास एलएनजी टर्मिनल नहीं है। इस स्थिति को ठीक करने के लिए जर्मनी दो एलएनजी टर्मिनलों का निर्माण कार्य तेजी से कर रहा है, लेकिन इन दोनों टर्मिनल के निर्माण में कम से कम 3 सालों का वक्त लगेगा और सवाल ये है, कि अगर जर्मनी रूस से ऊर्जा आयात करना बंद कर देता है, तो फिर अगले तीन सालों तक वो अपनी जरूरतों को कैसे पूरा करेगा?

‘रूस पर निर्भरता...एक गलती’
पिछले महीने, जर्मनी के वित्तमंत्री रॉबर्ट हेबेक ने दोहा की यात्रा के दौरान कहा था, कि जर्मनी और कतर के बीच एक दीर्घकालिक गैस आपूर्ति सौदा हो गया है और उन्होंने कहा कि, 'हमें इस साल अभी भी रूसी गैस की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन भविष्य में नहीं।' लेकिन, उन्होंने यह भी स्वीकार किया, कि पिछली जर्मन सरकार ने रूसी गैस आपूर्ति पर काफी ज्यादा निर्भर होकर बड़ी गलती की है। यहां पर आपको यह भी बताते चलें कि, अमेरिकी राष्ट्रपति जोसेफ बाइडेन ने पिछले महीने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस, मोहम्मद बिन सलमान (एमबीएस के रूप में जाना जाता है) को सऊदी अरब से अपनी तेल आपूर्ति बढ़ाने के लिए उनसे बात करने की कोशिश की थी, क्योंकि अमेरिका ने औपचारिक रूप से रूसी तेल आयात पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन, प्रिंस सलमान ने बाइडेन का फोन ही नहीं उठाया। यूएई ने भी जो बाइडेन से बात करने से इनकार कर दिया।

बाइडेन से क्यों खफा है सऊदी अरब?
सऊदी अरब और अमेरिका के बीच के संबंध जो बाइडेन के सत्ता में आने के बाद से तनावपूर्ण हो गये हैं। डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में सऊदी अरब और अमेरिका के संबंधों में ऐतिहासिक नजदीकी आई थी, लेकिन बाइडेन ने राष्ट्रपति बनने के बाद सऊदी क्राउन प्रिंस से टेलीफोन पर इसलिए बात करने इनकार कर दिया, क्योंकि क्राउन प्रिंस सऊदी अरब के प्रधान नहीं हैं। इसके साथ ही बाइडेन ने सऊदी क्राउन प्रिंस को सऊदी अरब के वरिष्ठ पत्रकार जमाल खशोगी हत्याकांड के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया और बाइडेन ने सऊदी अरब को 'एक अछूत राज्य' बनाने की धमकी दी थी। बाइडेन ने सऊदी अरब को 'बिना किसी सामाजिक मूल्य' वाला देश करार दिया था, लेकिन बाइडेन के सत्ता संभालने के लिए ठीक एक साल बाद परिस्थितियां बदल चुकी हैं। अब बाइडेन, सऊदी क्राउन प्रिंस से बात करना चाहते हैं, लेकिन क्राउन प्रिंस बाइडेन को भाव देने के लिए तैयार नहीं हैं।

यमन युद्ध भी बना तनाव की वजह
बाइडेन को नजरअंदाज करने की एक और बड़ी वजह यमन युद्ध है। यमन में स्थित हूती विद्रोही लगातार सऊदी अरब और यूएई पर हमले कर रहे हैं। और अब सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात, दोनों का मानना है कि अमेरिका अब हूती विद्रोहियों के खिलाफ लड़ाई में उनका साथ नहीं दे रहा है, जबकि हूती विद्रोही लगातार तेल प्रतिष्ठानों पर हमले कर रहे हैं। वे इसलिए भी नाराज हैं, क्योंकि, राष्ट्रपति जो बाइजेन ने सत्ता में आने के बाद हूती विद्रोहियों को आतंकवादियों की लिस्ट से बाहर कर दिया, जिसपर पूर्ववर्ती डोनाल्ड ट्रंप ने काफी ज्यादा सख्ती दिखाई थी और सऊदी अरब को लड़ाई में काफी ज्यादा मदद दी थी।

रूस के साथ स्पेशल संबंध
सऊदी अरब रूस को अलग-थलग नहीं करना चाहता, क्योंकि, सऊदी अरब अमेरिका की तरफ से कई हथियारों की आपूर्ति बंद करने के बाद वो मॉस्को को संभावित हथियार आपूर्तिकर्ता देश के रूप में मानता है, और यह अब अमेरिका के लिए बर्दाश्त करना काफी मुश्किल हो गया है। जबकि, डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात को "अमेरिकी रक्षा उद्योग के लिए एक नकद गाय।' बताया था। वहीं, सऊदी अरब को यह भी डर है, कि अगर वो रूस के खिलाफ जाता है, तो रूस के एक इशारे पर ईरान समर्थित हूती विद्रोही उनके ऊपर भीषण हमला करना शुरू कर देंगे। लिहाजा, सऊदी अरब नहीं चाहता है, कि रूस उससे नाराज हो। रूस और ईरान में काफी अच्छे संबंध हैं और हूती विद्रोहियों तक हथियार ईरान ही पहुंचाता है।

यूरोप को भी नहीं करना चाहता नाराज
दूसरी तरफ, सऊदी अरब यह भी नहीं चाहता है, कि वो यूरोपीय देशों को तेल की आपूर्ति नहीं करे। सऊदी अरब को डर है, कि अगर उसने ऐसा किया, तो यूरोपीय देश काफी तेजी के साथ अक्षय ऊर्जा की तरफ बढ़ेंगे और अगर ऐसा होता है, तो उसका तेल व्यापार ही खतरे में आ सकता है। वहीं, सऊदी अरब पहले से ही पोलैंड को तेल की आपूर्ति करता रहा है, वहीं, पिछले जनवरी में सऊदी अरब की दिग्गज तेल कंपनी अरामको ने कहा था, कि वह पोलैंड की दूसरी सबसे बड़ी रिफाइनरी में 30 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने और तेल की आपूर्ति बढ़ाने के लिए सहमत हो गई है। जाहिर है, यूरोपीय देशों को अगर रूस पर नकेल कसना है, तो उसे मध्यपूर्व की तरफ आना ही होगा। वहीं, यूरोपीय देश इजरायल से भी गैस की आपूर्ति बढ़ाना चाहते हैं, जो अभी 10 प्रतिशत गैस की आपूर्ति करता है। लेकिन, अगर सऊदी अरब ने फिर भी यूरोपीय देशों को भाव नहीं दिया, तो यूरोपीय देशों की रूस की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ने की इच्छा अधूरी रह सकती है।












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