Donald Trump: 'कहा दुनियाँ जानती है लेकिन', नोबल प्राइज को लेकर छलका ट्रंप का दर्द!
Donald Trump: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से चौंकाने वाला दावा किया है। पाकिस्तान द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति को नोबल शांति पुरस्कार के लिए कथित रूप से नामित करने के बाद ट्रंप का दर्द एक बार फिर छलक गया। ट्रंप ने शोसल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर शेयर किए गए पोस्ट में अपनी निराशा ज़ाहिर की है। आपको बता दें कि ट्रूथ सोशल वही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है जिसे ट्रंप ने ही पूर्व में ट्विटर द्वारा बैन किए जाने के बाद लांच किया था।

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर शुक्रवार को एक विस्तृत पोस्ट में खुद को वैश्विक स्तर पर शांति लाने वाला नेता बताया। उन्होने लिखा, "मुझे इसके लिए नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा, मुझे भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध को रोकने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा, मुझे सर्बिया और कोसोवो के बीच युद्ध को रोकने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा, मुझे मिस्र और इथियोपिया के बीच शांति बनाए रखने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा।" उन्होंने आगे कहा, "नहीं, मुझे कोई नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा, चाहे मैं कुछ भी करूं, जिसमें रूस-यूक्रेन और इजरायल-ईरान शामिल हों, लेकिन लोगों को पता है, और मेरे लिए यही मायने रखता है।"
ट्रंप ने दावा किया कि हाल ही में अफ्रीका के दो देशों-कांगो और रवांडा-के बीच जो "शानदार संधि" हुई, उसमें भी उनकी भूमिका थी। उन्होंने कहा कि वे बार-बार वैश्विक संघर्षों को टालने और शांति स्थापित करने का काम कर चुके हैं, लेकिन नोबेल शांति पुरस्कार जैसे सम्मान उन्हें नहीं दिए जाते क्योंकि "वह उन्हें कभी मिलना ही नहीं है"।
ये टिप्पणियां ट्रंप के उस दावे के बाद आईं, जिसमें उन्होंने डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और रिपब्लिक ऑफ रवांडा के बीच एक "शानदार संधि" का उल्लेख किया। ट्रंप के इस बयान में एक बार फिर भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता का राग अलापा गया है जिसे भारत ने स्पष्ट और कड़े शब्दों में सिरे से खारिज कर चुका है। भारत का कहना है कि ऐसे किसी भी बाहरी हस्तक्षेप की न तो ज़रूरत थी, न है और न ही भारत ने उसे कभी स्वीकार करेगा। ट्रंप ने भी कभी भारत के कथन का खंडन नहीं किया और यही कारण है कि ट्रंप के दावों की सत्यता और प्रभाव पर सवाल उठते रहे हैं।
भारत का सख्त रुख: "कोई मध्यस्थता नहीं"
भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव, विशेष रूप से कश्मी र जैसे मुद्दों पर, लंबे समय से चला आ रहा है। भारत ने हमेशा द्विपक्षीय मुद्दों को आपसी बातचीत से सुलझाने पर जोर दिया है और किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को खारिज किया है। केंद्र में मोदी के सत्तासीन होने के बाद अब भारत ईंट का जवाब पत्थर से देने लगा है। इससे पहले 2016 में भारत ने जम्मू कश्मीर के उरी में सेना के शिवर पर हमले के बाद पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक किया था और साल 2019 में पुलवामा की घटना के बाद पाकिस्तान के बालाकोट में एयर-स्ट्राइक भी किया था। यहाँ तक कि भारतीय जांबाज अभिनंदन की वापसी के लिए भी भारत ने किसी भी देश से हस्तक्षेप की मांग नहीं किया था। भारत का स्टैंड इस मामले में एकदम साफ है, "जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। शिमला समझौता के अंतर्गत इस द्विपक्षीय मुद्दे पर किसी तीसरे देश या यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्रसंघ का हस्तक्षेप भी स्वीकार्य नहीं है।
कूटनीतिक निश्चय या नोबेल की लालसा?
ट्रंप के समर्थक जहाँ उनके ऐसे कदमों को वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए यूएस की प्रतिबद्धता और राष्ट्रपति ट्रंप की कूटनीतिक दूरदर्शिता बताते हैं वहीं आलोचक इसे महज अपने मुंह मिया मिट्ठू करार देते हैं। हालांकि नोबेल शांति पुरस्कार के लिए ट्रंप की लालसा कोई नई बात नहीं है। साल 2020 के फरवरी महीने में ट्रंप ने जब अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज को वापस बुलाने का निर्णय लिया था तब अंतरराष्ट्रीय मामलों के कई जानकारों को आश्चर्य हुआ था। लेकिन उन के इस कदम को नोबेल की उत्कट महत्त्वाकांक्षा के तौर पर देखा जाने लगा। इसी प्रयास में ट्रंप बेगानी शादी में अबदुल्ला दीवाना की तरह किसी भी अंतरराष्ट्रीय और द्विपक्षीय मामलों में अचानक कूद पड़ते हैं। एक बार तो उन्होने यह भी कह दिया था कि वे उत्तर और दक्षीण कोरिया में समझौता करवा सकते हैं।
डोनाल्ड ट्रंप के दावे भले ही चर्चा में हों, लेकिन भारत का रुख साफ है-भारत-पाक रिश्तों में किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं है। ट्रंप की यह टिप्पणी उनके प्रचार का हिस्सा हो सकती है, लेकिन भारत में इसे गंभीरता से नहीं लिया गया है। भारत की विदेश नीति आत्मनिर्भर और संप्रभुता पर आधारित है, और कोई भी बाहरी दावा उसकी दिशा तय नहीं कर सकता।
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