Domestic Workers: भारत, US और UK में मेड्स की सैलरी में इतना फर्क क्यों? विदेशों में मिलती है लग्जरी लाइफ
Domestic Workers: बीते दिनों नोएडा में हुए लेबर और नॉन स्किल्ड, सेमी स्किल्ड और स्किल्ड वर्कर्स के प्रदर्शनों ने भारत में इनकी आर्थिक स्थिति पर कई चिंताएं खड़ी कर दीं। कुछ लोगों को तो कंपनियां इतना तक पैसा नहीं देतीं कि वे दो वक्त की रोटी ठीक से खा सकें। ऐसे में ये जानना जरूरी हो जाता है कि दूसरे देशों में हाउस हेल्प्स, ऑफिस स्टाफ और दूसरे कर्मचारियों को कितनी तन्ख्वाह मिलती है और उनका लाइफ स्टाइल कैसा रहता है। भारत, यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका में हाउस हेल्प या घरेलू कामगारों या फिर आम भाषा में कहें तो काम वाली बाई की कमाई, सुविधाएं और काम करने का तरीका काफी अलग है। यह अंतर सिर्फ पैसे का नहीं, बल्कि पूरे वर्किंग कल्चर और लाइफस्टाइल का भी है।
सैलरी में जमीन-आसमान का अंतर
भारत में घरेलू कामगारों की कमाई अपेक्षाकृत कम है। औसतन एक हाउस हेल्प की सालाना आय करीब ₹3.18 लाख (लगभग ₹26,000 प्रति महीना) होती है, जबकि शहरों में पार्ट-टाइम काम के लिए ₹3,000 से ₹12,000 तक भी मिल सकता है। यूनाइटेड किंगडम में यही काम करने वाले घरेलू कर्मचारी औसतन £23,231 (लगभग ₹24-25 लाख सालाना) कमाते हैं, यानी करीब £11 (1393 रुपए) प्रति घंटा। अमेरिका में घरेलू कामगारों की सैलरी और ज्यादा है। वहां पर औसतन $51,769 (लगभग ₹43 लाख सालाना) कमाई होती है, यानी करीब $24.89 (2324 रुपए) प्रति घंटा। साफ है कि अमेरिका और यूके में मजदूरी भारत की तुलना में कई गुना ज्यादा है।

किस देश में क्या एक्स्ट्रा बेनिफिट्स?
भारत में हाउस हेल्प को आमतौर पर खाना, कपड़े या रहने की जगह (लाइव-इन केस में लेकिन यह रेयर है), त्योहारों पर बोनस (जैसे दिवाली बख्शीश) और कभी-कभी छुट्टी या मेडिकल मदद (अगर काम लेने वाला अच्छा इंसान हुआ तो) मिलती है। वहीं यूके और अमेरिका में न्यूनतम वेतन कानून लागू होता है, साप्ताहिक एक या दो छुट्टी और घंटे के हिसाब से ओवरटाइम पे मिलता है, कुछ मामलों में हेल्थ इंश्योरेंस और पेड लीव भी दी जाती है। यानी विकसित देशों में यह काम प्रोफेशनल की तरह ट्रीट किया जाता है।
लाइफस्टाइल में अंतर
भारत में घरेलू कामगार अक्सर एक दिन में कई घरों में काम करते हैं, लंबी दूरी तय करते हैं और सामाजिक सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होती है। इसके उलट, अमेरिका और यूके में अधिकतर लोग एक ही घर या एजेंसी के तहत काम करते हैं, तय टाइम शिफ्ट होती है और काम करने की स्थिति बेहतर होती है। इसका मतलब है कि वहां यह काम एक नियमित नौकरी की तरह होता है, जबकि भारत में इसे अक्सर सेवा के नाम पर गरीब वर्ग को चूना लगाते हुए देखा जाता है।
वर्किंग कल्चर का फर्क
भारत में यह काम ज्यादातर अनौपचारिक है, कॉन्ट्रैक्ट (रेयर) या लिखित एग्रीमेंट (एक्स्ट्रीम रेयर) कम होते हैं और सैलरी बातचीत पर निर्भर करती है। साथ ही, भारत में हाउस हेल्प या ऑफिस स्टाफ को दोयम दर्जे का ट्रीटमेंट मिलना, उनसे बदतमीजी से पेश आना बेहद आम बात हो चुकी है। जबकि अमेरिका और यूके में लिखित कॉन्ट्रैक्ट, तय काम और घंटे होते हैं और श्रम कानूनों का सख्त पालन किया जाता है। इससे कामगारों के अधिकार ज्यादा सुरक्षित रहते हैं साथ ही उन्हें किसी किस्म के दुर्व्यवहार का भी सामना नहीं करना पड़ता।
क्या है तीनों जगह स्थिति आसानी से समझें
तीनों देशों की तुलना से साफ है कि कमाई के मामले में अमेरिका सबसे आगे है, उसके बाद यूनाइटेड किंगडम और फिर भारत आता है। सुविधाएं भी विकसित देशों में ज्यादा हैं और वर्क कल्चर ज्यादा प्रोफेशनल है। भारत में घरेलू कामगारों की भूमिका बहुत अहम है, लेकिन यह सेक्टर अभी भी पूरी तरह संगठित नहीं है। वहीं अमेरिका और यूके में यह काम एक सम्मानजनक और संरक्षित पेशे के रूप में विकसित हो चुका है।
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