पाकिस्तान में डॉलर की क़िल्लत, अर्थव्यवस्था पर क्या पडे़गा इसका असर

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पाकिस्तान में इस समय डॉलर की भयंकर कमी है और आयात कार्गो की क्लीयरेंस तक के लिए डॉलर उपलब्ध नहीं. देश में डॉलर की आमद के स्रोत सिकुड़ते जा रहे हैं और विदेशी क़र्ज़ की अदायगी की वजह से मुद्रा विनिमय के कोष कम होकर चार साल के निचले स्तर पर आ चुके हैं.

आयात कर मंगाए गए माल की क्लीयरेंस में कठिनाइयों के कारण दवा बनाने वाली एक कंपनी के मालिक क़ैसर वहीद के पिछले कुछ हफ़्ते बहुत मुश्किल से बीते हैं. वो इस कंसाइनमेंट के बारे में बताते हुए कहते हैं कि वह एंटीबायोटिक दवा की तैयारी में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल था जो बंदरगाह पर 15 से 20 दिन तक पड़ा रहा और उसकी क्लीयरेंस नहीं हो रही थी.

"इस आयातित माल की एलसी (लेटर ऑफ़ क्रेडिट) तो खुल चुकी थी लेकिन इस एलसी की अदायगी के लिए बैंक की ओर से डॉलर उपलब्ध नहीं कराए जा रहे थे. विदेश से इस कच्चे माल का विक्रेता बार-बार अपनी रक़म मांग रहा था. मैंने उस कच्चे माल की रक़म बैंक में जमा करा दी थी और अब बैंक को उस रक़म को डॉलर की शक्ल में विदेश भिजवाना था लेकिन बैंक की ओर से यह डॉलर नहीं भेजे जा रहे थे."

वो कहते हैं, "इसके कारण उस कच्चे माल की क्लीयरेंस भी नहीं हो रही थी. मैंने इसके लिए भाग दौड़ शुरू कर दी ताकि किसी भी तरह क्लीयरेंस करवा सकूं."

"दवाइयों की तैयारी में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल को, जो अधिकतर नमक की शक्ल में होता है, सुरक्षित रखने के लिए विशेष तापमान की ज़रूरत होती है और उसे क्वारंटीन करना पड़ता है ताकि वह ख़राब न हो. लेकिन पंद्रह से बीस दिन के बाद मैं डॉलर विदेश भिजवाने में क़ामयाब हुआ और इसके बाद मेरे माल की क्लीयरेंस हुई. इस दौरान कुछ माल ख़राब भी हुआ और मुझे डैमेज चार्जेज़ भी देने पड़े."

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क़ैसर वहीद उन कठिनाइयों के बारे में बताते हुए कहते हैं "इस समय डॉलर हासिल करना बहुत मुश्किल हो चुका है और अधिकतर बैंक डॉलर देने को तैयार ही नहीं."

ये सिर्फ़ फ़ार्मास्यूटिकल क्षेत्र में क़ैसर वहीद के साथ ही नहीं हुआ बल्कि प्याज़, अदरक और लहसुन के चार से अधिक कंटेनर काफ़ी दिनों तक क्लीयरेंस के इंतज़ार में रहे क्योंकि उनके लिए खोली गई एलसी का बैंकों की ओर से डॉलर के रूप में विदेश में भुगतान नहीं हो रहा था.

फलों और सब्ज़ियों के व्यापारियों के प्रतिनिधि संगठन की ओर से व्यापार मंत्रालय को पत्र लिखने के बाद सरकार की ओर से उनकी क्लीयरेंस हो सकी.

खाद्य तेल के क्षेत्र में काम करने वाले शेख़ उमर रेहान के अनुसार हालांकि खाना पकाने के तेल के आयात करने वाले कार्गो की एलसी का भुगतान सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है ताकि देश में उसकी कमी पैदा न हो लेकिन इसके बावजूद उनकी क्लीयरेंस में देरी हो रही है.

इसी तरह कच्चे तेल के लिए जब एक स्थानीय रिफ़ाइनरी ने विदेश में अपना टैंकर भेजा तो बैंक की ओर से आधे टैंकर की एलसी खोली गई. रिफ़ाइनरी को टैंकर का किराया पूरा देना पड़ा लेकिन कच्चा तेल आधे टैंकर का मिला क्योंकि बैंक की ओर से पूरे टैंकर की एलसी नहीं खोली गई थी.

पाकिस्तान में आयात के कार्गो के लिए एलसी न खोलने या उनकी अदायगी में देरी की ये कुछ घटनाएं इस लंबे सिलसिले की एक कड़ी हैं जिसमें डॉलर की कमी की वजह से पाकिस्तान में आयात के लिए इस्तेमाल होने वाले कार्गो की क्लीयरेंस नहीं हो रही.

डॉलर रेट पर इसहाक़ डार क्या दावा था?

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पाकिस्तान में डॉलर, इसकी क़ीमत और इसकी उपलब्धता इस समय सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है.

पाकिस्तान के वित्त मंत्री इसहाक़ डार जो डॉलर के मूल्य को नियंत्रित रखने के दावेदार थे, इस स्थिति में विफल नज़र आते हैं. क्योंकि एक ओर डॉलर की सरकारी दर 224 से 225 रुपये तक पहुंच चुकी है तो दूसरी ओर जब आयात करने वाले डॉलर के लिए बैंकों से संपर्क करते हैं तो उन्हें डॉलर उपलब्ध नहीं कराए जाते. जबकि ग्रे मार्केट में एक डॉलर का मूल्य 240 रुपये से ऊपर जा चुका है.

वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद जब मिफ़ताह इस्माइल वित्त मंत्री बने तो डॉलर के रेट में इज़ाफ़ा देखा गया और 29 जुलाई 2022 को रुपए के मुक़ाबले में डॉलर इंटरबैंक में 240 तक चला गया था, जिस पर मिफ़ताह इस्माइल आलोचना का शिकार बने तो उसके बाद इसहाक़ डार की देश वापसी की ख़बरें आनी शुरू हो गईं.

सितंबर के अंत में केंद्रीय वित्त मंत्री का क़लमदान संभालने से पहले इसहाक़ डार ने बीबीसी से बात करते हुए अपनी प्राथमिकताएं बयान की थीं जिसमें स्थानीय मुद्रा को सुदृढ़ करना भी शामिल था.

पाकिस्तान वापसी और वित्त मंत्री बनने के बाद इसहाक़ डार ने अक्टूबर के महीने में दावा किया था कि वह डॉलर के मूल्य को 200 रुपये से नीचे ले आएंगे.

इसहाक़ डार की ओर से किए जाने वाले उस दावे के दो महीने बीतने के बाद डॉलर की क़ीमत 200 रुपये से नीचे नहीं आ सकी है. बल्कि इस समय डॉलर की क़ीमत 224 रुपए तक पहुंच चुकी है जबकि खुले मार्केट में डॉलर की क़ीमत 230 से ऊपर तक जा चुकी है.

लेकिन इससे बड़ी समस्या डॉलर की अनुपलब्धता है जिसके कारण देश का आयातित माल जिसमें कच्चा तेल, खाद्य तेल, दवाइयां, निर्यात के क्षेत्र का कच्चा माल, मशीनरी व प्लांट्स और दूसरे क्षेत्रों के लिए मंगवाए जाने वाले आयात कार्गो बैंकों की ओर से एलसी के लिए अदायगी न करने की वजह से बंदरगाह पर फंसे हुए हैं.

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इसहाक़ डार के पिछले कार्यकाल में डॉलर क़ाबू में कैसे रहा?

इसहाक़ डार ने अपने पिछले मंत्रित्व काल में डॉलर को एक ख़ास स्तर पर रखा जिसे उनके राजनैतिक विरोधी और निष्पक्ष वित्त विशेषज्ञ की ओर से कृत्रिम ढंग से डॉलर रेट कंट्रोल करने का उपाय बताया गया था.

आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ पत्रकार ख़ुर्रम हुसैन ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि वह यह तो नहीं कहेंगे कि इसहाक़ डार ने डॉलर रेट को 'मैनुप्लेट' किया लेकिन उन्होंने उसे पिछले दौर में 'मैनेज' ज़रूर किया और वह उसे स्वीकार कर चुके हैं.

वित्त विशेषज्ञ और सिटी बैंक से जुड़े पूर्व बैंकर युसूफ़ नज़र ने बीबीसी से बात करते हुए कह, "यह बात ग़लत है कि इसहाक़ डार ने पिछले कार्यकाल में डॉलर को क़ाबू किया, उनकी ख़ुशकिस्मती थी कि उस दौर में वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के मूल्य काफ़ी गिर गए थे और उसका लाभ पाकिस्तान को तेल ख़रीदने पर कम डॉलर ख़र्च करने के रूप में मिला."

उन्होंने कहा कि इसके अलावा उस समय आईएमएफ़ का रवैया भी नरम था जिसका फ़ायदा पाकिस्तान को हुआ और देश में डॉलर का रेट नहीं बढ़ा.

अब डॉलर का रेट नीचे क्यों नहीं आ रहा?

ख़ुर्रम हुसैन ने इस बारे में कहा कि डॉलर रेट के न गिरने की वजह यह है कि पाकिस्तान के पास फ़ॉरेन एक्सचेंज इतना नहीं कि वह डॉलर के रेट को नीचे ला सके. उन्होंने कहा कि "अगर इसहाक़ डार ने अपने पिछले कार्यकाल में डॉलर को 'मैनेज' किया तो उसका कारण पाकिस्तानियों के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा होना था.

हुसैन ये भी कहते हैं कि अब डॉलर रेट कम होने का एक ही उपाय है कि देश में डॉलर आएं जो इस समय कहीं से नहीं आ रहे. "अब सऊदी अरब से ये डॉलर आते हैं या चीन या आईएमएफ़ से, यह उन देशों और संस्थाओं की ओर से डॉलर मिलने के ऊपर निर्भर है."

उन्होंने इस राय को नकार दिया कि पाकिस्तान डिफ़ॉल्ट करने के क़रीब है. उन्होंने कहा, "बॉन्ड्स की अदायगी एक चीज़ है जो पाकिस्तान ने पिछले दिनों की, जबकि फ़ॉरेन ट्रेड के लिए डॉलर की ज़रूरत एक अलग बात है और आयात कार्गो के लिए डॉलर की अनुपलब्धता की वजह बैलेंस ऑफ़ पेमेंट (भुगतान संतुलन) का संकट है जो देश में डॉलर की कमी की वजह से है.

ध्यान रहे कि इस समय स्टेट बैंक के आंकड़े के अनुसार पाकिस्तान के पास 6.7 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा कोष है जबकि देश में कुल मिलाकर 12.6 अरब डॉलर का कोष है.

पाकिस्तान को इस वित्तीय वर्ष में 30 अरब डॉलर से अधिक का विदेशी भुगतान भी करना है. इस बीच देश में डॉलर लाने वाले तीन महत्वपूर्ण स्रोत निर्यात, विदेशों से भेजी गयी मुद्रा और विदेशी पूंजी निवेश पिछले कुछ महीनों में नकारात्मक वृद्धि दर्ज कर रहे हैं.

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डॉलर रेट कम करने का दावा क्या सियासी नारा था?

वित्त मंत्री इसहाक़ डार की ओर से डॉलर के रेट को नीचे लाने के दावे के बारे में वित्त विशेषज्ञ कहते हैं कि वह एक सियासी नारा था जिसका ज़मीनी हक़ीक़त से कोई संबंध नहीं था.

यूसुफ़ नज़र ने इस बारे में कहा कि जब इसहाक़ डार ने दावा किया था कि वह डॉलर रेट को नीचे ले आएंगे तो उस समय वह अपनी पाकिस्तान वापसी चाहते थे और अपनी पुरानी हैसियत को दोबारा पाना चाहते थे.

उन्होंने कहा कि इसका सबसे अधिक नकारात्मक प्रभाव आम आदमी पर पड़ेगा जो और महंगाई सहने पर मजबूर होगा.

युसूफ़ नज़र ने यह भी कहा ऐसी स्थिति में अर्थव्यवस्था का पहिया और धीमा घूमेगा और औद्योगिक क्षेत्र में गतिविधियों में सुस्ती आने की वजह से कर्मचारियों की छंटनी हो सकती है जो बेरोज़गारी को बढ़ाएगी.

"बहुत सारी मल्टीनेशनल कंपनियां तो इस समय कर्मचारियों को हटाने और कुछ तो पाकिस्तान से निकलने के बारे में भी सोच रही हैं क्योंकि एक तो डॉलर की अनुपलब्धता के कारण उनकी गतिविधियां प्रभावित हुई हैं और उनके मुनाफ़े को डॉलर की शक्ल में बाहर ले जाना भी समस्या बनी हुई है."

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