भारतीय मूल के नेता क्या वाकई भारत को फायदा पहुंचाते हैं? पीएम मोदी और पुर्तगाल की दिलचस्प कहानी
जिस पुर्तगाल के साथ भारत के साथ सीमित संबंध रहे, वो अब भारत के दोस्त देशों में शुमार हो चुका था और जिस पुर्तगाली प्रधानमंत्री की पार्टी बीजेपी की आलोचक थी, उसके अब नरेन्द्र मोदी के साथ व्यक्तिगत संबंध बन गये।
Indian Origin Leader: जियो पॉलिटिक्स में काफी महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले दुनियाभर के दर्जनों ऐसे देश हैं, जहां की राजनीति में भारतीय मूल के नेता की काफी मजबूत पकड़ है। चाहे ब्रिटेन के नये नवेले प्रधानमंत्री ऋषि सुनक हों, या फिर अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस हों, या फिर पुर्तगाल के प्रधानमंत्री एंटोनियो कोस्टा हों या फिर मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद जुगनाथ हों, इनका मूल भारतीय है। लिहाजा, ऋषि सुनक के प्रधानमंत्री बनने के बाद जब भारत में खुशियां मनाई गई है, तो फिर इस बात को जानना जरूरी हो जाता है, कि क्या भारतीय मूल के नेता भारत को फायदा पहुंचाते हैं, या फिर जियो पॉलिटिक्स में भारत का साथ देकर भारत की स्थिति को मजबूत करते हैं। इसके साथ ही हम ये भी जानने की कोशिश करेंगे, कि आखिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारतीय मूल के नेताओं के साथ किस तरह से संबंध जोड़कर भारत के हित में उनका इस्तेमाल करते हैं।

पुर्तगाल का सबसे बेहतरीन उदाहरण
कुछ साल पहले तक भारत और पुर्तगाल के बीच सीमित राजनीतिक और आर्थिक संबंध हुआ करते थए और पुर्तगाल के प्रधानमंत्री एंटोनियो कोस्टा के भी भारत के साथ सीमित संबंध ही थे। अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम की राजनीति में में तो फिर भी नस्लीय पहचान काफी अहम भूमिका निभाती है, लेकिन पुर्तगाल के पॉलिटिकल सिस्टम में नस्लीय राजनीत ना के बराबर है और नस्लीय पहचान का चुनाव पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। नई दिल्ली स्थिति सीएसईपी के रिसर्च फेलो कॉन्स्टेन्टेनियो जेवियर ने अपने ट्वीटर पर लिखा है कि, पुर्तगाल के इलोक्ट्रेल सिस्टम में नस्लीय राजनीति नहीं हैं, इसीलिए वहां के नेता नस्लीय पहचान जाहिर भी नहीं करते हैं। उन्होंने कहा कि, ऋषि सुनक की तरह पुर्तगाल के प्रधानमंत्री एंटोनियो कोस्टा ने अपनी राजनीति में अपनी जातीय और नस्लीय बैकग्राउंड का इस्तेमाल भी नहीं किया, फिर भी वो सत्ता में आए। इसलिए यूएस/यूके सिस्टम में अधिकांश भारतीय मूल के राजनेताओं के विपरीत पुर्तगाली प्रधानमंत्री का सत्ता में बने रहना या बाहर हो जाना असल में भारत के लिए पहले कोई फर्क नहीं पड़ता था।

वामपंथी विचारधारा के हैं पुर्तगाली पीएम
पीएम मोदी ने पुर्तगाली प्रधानमंत्री के दिल में 'भारत प्रेम' कैसे जगाया, इसको लेकर रिसर्च फेलो कॉन्स्टेन्टेनियो जेवियर ने दिलचस्प जानकारी दी है। उन्होंने लिखा है कि, प्रधानमंत्री कोस्टा पुर्तगाल की राजनीति में केन्द्रीय-वामपंथी विचारधारा वाली सोशलिस्ट पार्टी के नेता हैं, जिसकी विचारधारा जाहिर तौर पर पीएम मोदी और उनकी भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक विचारधारा से मेल नहीं खाती है और पुर्तगाली प्रधानमंत्री की पार्टी, भारतीय जनता पार्टी के प्रति आलोचनात्मक रवैया भी रखती है। इसके साथ ही पुर्तगाल की विदेश नीति, जो आम सहमति से बनती है, उसमें राजनीतिक विचारधारा भी मायने रखती है और इसे एक अड़चन के तौर पर माना जाता है। इसके बावजूद भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत-पुर्तगाल संबंध को आगे बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री कोस्टा के साथ काम करने में 'जीत' का मौका देखा और मोदी सरकार ने विदेश नीति उसी हिसाब बनाई।

भारत से कैसे जुड़ने लगा पुर्तगाल
भारत की नई विदेश नीति ने धीरे धीरे अपना असर दिखाया और साल 2016 के बाद पुर्तगाल चीन के साथ अपने संबंधों में दूरी लाने लगा और पुर्तगाली कंपनियों ने चीन में निवेश करना कम करना शुरू कर दिया। और ऐसे में पुर्तगाल का प्राकृतिक विकल्प बना भारत। प्रधानमंत्री मोदी के लिए पुर्तगाल के प्रधानमंत्री कोस्टा 'ग्लोबल इंडिया' के एंबेसडर की तरफ उभरे और साल 2017 में पुर्तगाल के प्रधानमंत्री कोस्टा ने भारत का दौरा किया और ये दौरा एतिहासिक बन गया। इस दौरे के दौरान भारत और पुर्तगाल ने पारस्परिक हितों की भागीदारी को चिह्नित किया। पुर्तगाल के भारतीय मूल के प्रधानमंत्री ने भारतीय बाजार में निवेश और भारत के साथ संबंध को काफी गहरा बनाने की कोशिश शुरू कर दी और फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पुर्तगाल के वामपंथी पार्टी के वामपंथी विचारधारा वाले नेता को प्रवासी भारतीय सम्मेलन में सम्मानित करके उनका सिरा वापस भारत से जोड़ दिया। पीएम मोदी ने कार्यक्रम के दौरान पुर्तगाल के प्रधानमंत्री कोस्टा को दुनिया भर में "भारतीय प्रवासियों का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि" कहा। ये तस्वीर 2017 की भारत-पुर्तगाल संबंध की सबसे यादगार तस्वीर है, जब पीएम मोदी ने कोस्टा को भारत की अपनी ओवरसीज सिटिजनशिप ऑफ इंडिया का पासपोर्ट दिया। इस कार्ड का जियोपॉलिटिक्स में काफी गहरा महत्व है और अपने भारत के दौरे के दौरान पुर्तगाली प्रधानमंत्री कोस्टा अपने पुश्तैनी घर गोवा पहुंचे, जहां बीजेपी की सरकार में उनका भव्य स्वागत किया गया और उन्हें पुश्तैनी घर दिखाया गया।

हो गई भारत और पुर्तगाल की दोस्ती
यानि, जिस पुर्तगाल के साथ भारत के साथ सीमित संबंध रहे, वो अब भारत के दोस्त देशों में शुमार हो चुका था और जिस पुर्तगाली प्रधानमंत्री की पार्टी बीजेपी की आलोचक थी, उनके अब भारतीय प्रधामंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ व्यक्तिगत संबंध जुड़ गये। और उसके बाद से भारत और पुर्तगाल के संबंध लगातार विकसित हो रहे हैं और दोनों प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत संबंध कायम हैं, जिसका फायदा संबंधों को और मजबूत करने के लिए हो रहा है। इस दोस्ती का परिणाम यह निकला, कि जब पुर्तगाल के पास यूरोपीय संघ की अध्यक्षता थी, तो भारत- यूरोपीय संघ के नेताओं की बैठक के दौरान पुर्तगाल ने भारत की इंडो-पैसिफिक लाइन का भारी समर्थन किया था और इससे भारत को काफी फायदा पहुंचा।

ऋषि सुनक 'जीवित ब्रिज'
प्रधानमंत्री बनने के बाद ऋषि सुनक को दिए गये बधाई संदेश में पीएम मोदी ने जिन शब्दों का इस्तेमाल किया, उसे ध्यान से देखने की जरूरत है। पहला शब्द था दिवाली और दूसरा शब्द था "living bridges"। ऋषि सुनक हमेशा से खुद को एक प्राउड हिन्दू बताते रहे हैं, लिहाजा पीएम मोदी ने अपनी बधाई संदेश में दिवाली को शामिल कर उनके हिन्दू परिचय को भारत से जोड़ने की कोशिश की। वहीं, पीएम मोदी ने उन्हें भारत और ब्रिटेन के प्रवासियों के बीच संबंध को जोड़ने वाला 'जीवित पुल' के तौर पर संदर्भित किया। वहीं, 2000 के दशक की शुरुआत से भारत की नई प्रवासी नीति को दर्शाता है, जो सामरिक हितों के साथ सांस्कृतिक आख्यानों को संतुलित करता है। सांस्कृति संबंधों के आधार पर रिश्ते मजबूत करने का ये सिलसिला कोई नया नहीं है, लेकिन रिसर्च फेलो कॉन्स्टेन्टेनियो जेवियर के मुताबिक, साल 2014 के बाद पीएम मोदी के शासनकाल में यह काफी तेज हो चुका है। यह भारत की सांस्कृतिक कूटनीति का एक बढ़ता हुआ स्तंभ है, जो भारत को प्रवासी भारतीयों के लिए "जीवित पुलों" के साथ एक खुली, वैश्विक शक्ति के रूप में प्रदर्शित करता है।

कितना आसान है ये संबंध बनाना?
कॉन्स्टेन्टेनियो जेवियर की नजर में ये राजनयिक संतुलन बनाना आसान नहीं है। वो कहते हैं कि, बेशक पुर्तगाली राष्ट्रपति कोस्टा और ऋषि सुनक को वैश्विक भारत प्रतिनिध का दावा किया जाए, लेकिन फिर भी इस बात का सम्मान किया जाए, कि वो अब किसी और देश के नागरिक हैं। हालांकि, भारत के प्रति उनका इमोशनल अटैचमेंट होना पूर्वनिर्धारित है, फिर भी वो दूसरे देश और अपने लोगों के प्रति वफादार हैं, जिसका सम्मान होना जरूरी है। साल 1956 में भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था, कि "अगर उन्होंने उस देश की राष्ट्रीयता को अपनाया है, तो उन्हें नागरिकता के सभी अधिकारों के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए। और फिर उन्हें लेकर हमारे मन में और कोई चिंता नहीं रहेगी। हां, उनके साथ हमारे भावनात्मक संबंध फिर भी रहेंगे और निश्चित तौ पर हैं,लेकिन राजनीतिक रूप से उनकी भारतीय नागरिकता समाप्त हो जाती है।"
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