Diplomacy: डोनाल्ड ट्रंप की वापसी से दिल्ली में बेचैनी क्यों है? 20 जनवरी को शपथ ग्रहण के बाद ऐसा क्या होगा?
Donald Trump Diplomacy: अमेरिका में 20 जनवरी से डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन एक्टिव हो जाएगा, लेकिन व्हाइट हाउस में सत्ता परिवर्तन से ठीक पहले दिल्ली में बेचैनी देखी जा रही है। हालांकि, उससे पहले निवर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडेन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) जेक सुलिवन वरिष्ठ अमेरिकी सरकारी अधिकारियों के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ इस हफ्ते दिल्ली में थे।
सुलिवन का दिल्ली दौरा भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर की 24-29 दिसंबर तक की छह दिवसीय अमेरिका यात्रा के ठीक एक सप्ताह बाद हुई, जब जयशंकर ने सुलिवन और अन्य अधिकारियों से मुलाकात की थी और अमेरिका में तैनात सभी भारतीय महावाणिज्य दूतों के साथ एक सम्मेलन भी किया था। सोमवार को सुलिवन ने भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर और एनएसए अजीत डोभाल के साथ बैठक की।

जाहिर है, राजनयिक यात्राओं की यह झड़ी ट्रंप के सत्ता में आने की तैयारी में है और नई दिल्ली में कुछ हद तक आशंका को बयां करती है।
एक तरह से, डोनाल्ड ट्रंप ने अलग अलग बयानों से पहले ही अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं, जिससे नई दिल्ली में बेचैनी है।
डोनाल्ड ट्रंप को लेकर किस बात का डर? (Donald Trump India-US Relation)
सबसे पहले- डोनाल्ड ट्रंप ने आर्थिक संरक्षणवाद पर कड़ा बयान दिया है, जिसमें उन्होंने चीन, ब्राजील और मैक्सिको के अलावा भारत का भी नाम लिया है। उनके हालिया बयान "अगर वे हम पर टैक्स लगाते हैं, तो हम उन पर टैक्स लगाएंगे" और "अगर भारत हमसे 100 प्रतिशत शुल्क लेता है, तो क्या हम उनसे इसके लिए कुछ भी नहीं लेंगे?" जैसे बयान साफ साफ बताते हैं, कि ट्रंप की वापसी के बाद भारत और अमेरिका के बीच 'व्यापार युद्ध' शुरू हो सकता है।
दूसरा- कुशल श्रमिकों के लिए H1B वीजा का MAGA कोर प्लैंक है, जो भारतीयों को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर सकता है क्योंकि H1B वीजा धारकों में से लगभग 72 प्रतिशत भारतीय हैं और उसके बाद लगभग 12 प्रतिशत चीनी हैं। ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के कई लोगों का मानना है, कि H1B वीजा अमेरिकियों से नौकरियां छीन लेता है।
तीसरा- ब्रिक्स के खिलाफ डोनाल्ड ट्रंप का आक्रामक रवैया, जो उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है, जिसमें भारत, रूस और ट्रंप का दुश्मन चीन शामिल है। ब्रिक्स 'डी-डॉलराइजेशन' यानि डॉलर की जगह एक नई मुद्रा में कारोबार करने के विकल्प तलाश रहा है, जिससे डोनाल्ड ट्रंप गर्म हैं।
हाल ही में ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा था, कि "हमें इन देशों से प्रतिबद्धता की आवश्यकता है, कि वे न तो नई ब्रिक्स मुद्रा बनाएंगे और न ही शक्तिशाली अमेरिकी डॉलर की जगह किसी अन्य मुद्रा का समर्थन करेंगे, अन्यथा उन्हें 100 प्रतिशत टैरिफ का सामना करना पड़ेगा और उन्हें शानदार अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सामान बेचने को अलविदा कहने की उम्मीद करनी चाहिए... वे किसी और बेवकूफ को ढूंढ सकते हैं।"
अमेरिकी सरकार की प्रणाली राष्ट्रपति-केंद्रित है, जिसमें एक शक्तिशाली राष्ट्रपति नीतिगत बदलाव करने में पूरी तरह सक्षम है। लिहाजा, सबकी नजरें 20 जनवरी के बाद बन रही व्यवस्था पर होगा, कि क्या वाकई डोनाल्ड ट्रंप ऐसा करेंगे, जैसा करने का वो वादा कर रहे हैं?
बाइडेन प्रशासन ने जाते-जाते किया बड़ा समझौता (India-US Nuclear Deal)
इस बीच, सोमवार को भारत और अमेरिका के एनएसए की बैठक में दोनों सरकारों की तरफ से जारी संयुक्त बयान में इसे शांत तरीके से एक्सप्लेन किया गया और कहा गया, कि "24 मई 2022 को टोक्यो में क्वाड शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति जोसेफ बाइडेन द्वारा महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों पर भारत-अमेरिका पहल (आईसीईटी) के शुभारंभ के बाद, दोनों एनएसए ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, दूरसंचार, रक्षा और अंतरिक्ष सहित कई क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच ठोस पहल की है।"
बयान में कहा गया, कि "वर्तमान यात्रा ने उन्हें डिफेंस, साइबर और समुद्री सुरक्षा जैसे विविध क्षेत्रों सहित अपने उच्च स्तरीय संवाद में चल रही प्रगति की समीक्षा करने का अवसर दिया।"
अमेरिकी एनएसए जेक सुलिवन ने भारतीय परमाणु संस्थाओं को प्रतिबंध सूची से हटाने के लिए आवश्यक कदमों को अंतिम रूप देने के अमेरिकी प्रयासों की भी घोषणा की, जो असैन्य परमाणु सहयोग और लचीली स्वच्छ ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं को बढ़ावा देगा।
हालांकि, भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को लेकर ज्यादातर मुद्दों पर अमेरिका की दोनों ही पार्टियां एकसमान ही रूख रखती हैं, लेकिन असल समस्या डोनाल्ड ट्रंप को लेकर है, कि वो कब क्या फैसला करेंगे, ये कोई नहीं सोच सकता। और इन्हीं सब बातों ने दिल्ली में बेचैनी पैदा कर रखी है, कि 20 जनवरी के बाद भारत और अमेरिका के संबंध क्या मोड़ लेगा!
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