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खतरे की डिग्री: नहीं संभले, तो बेमौत मरेंगे हम

वॉशिंगटन, 15 अक्टूबर। समय खत्म हो रहा है. हमें जलवायु की सुरक्षा के लिए बड़े पैमाने पर कार्रवाई करने की जरूरत है. इसे तेजी से पूरा किया जाना चाहिए. हालांकि इसके लिए लागू योजनाएं कम पड़ रही हैं.

वर्ष 2015 में दुनिया के लगभग सभी देशों ने तापमान में वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने और पेरिस समझौते के तहत 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा का लक्ष्य रखने पर सहमति व्यक्त की थी.

degrees of danger what will the world look like if we miss our climate targets

संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल में कटौती और वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के उपायों के लिए अब तक की गई प्रतिबद्धता के बावजूद इस सदी के अंत तक वॉर्मिंग 2.7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगी.

इस महीने के अंत में विश्व के नेता संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के 26वें संस्करण के लिए ग्लासगो में मिलेंगे. यहां उनके ऊपर पेरिस समझौते के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए और अधिक कठोर उपायों के साथ आगे आने का दबाव होगा.

सवाल ये है कि डिग्री के इस छोटे से अंतर से क्या कोई प्रभाव पड़ेगा? इसका जवाब है, 'बहुत बड़ा'. जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का आकलन करने के लिए विश्व स्तर पर किए जा रहे वैज्ञानिक अनुसंधान के मुताबिक इस छोटे से अंतर का बड़ा प्रभाव पड़ सकता है.

लंबे समय से दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन का असर दिखना शुरू हो गया है. जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाली आपदाएं अब लोगों को असहनीय लगने लगी हैं.

विज्ञान बताता है कि वॉर्मिंग को सीमित करने से कई लाख लोगों की जान बचाई जा सकती है. भूमि के एक बड़े हिस्से को क्षरण से बचाया जा सकता है. साथ ही कई प्रजातियां विलुप्त होने से बच सकती हैं और कई शहर इतिहास के पन्नों में सिमटने से बच जाएंगे.

अगस्त में जारी इंटर-गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की नई रिपोर्ट के अनुसार, औद्योगिक क्रांति के बाद से वैश्विक तापमान पहले ही 1.07 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है. हम पहले से ही देख सकते हैं कि सिर्फ 1 डिग्री वॉर्मिंग का कितना ज्यादा असर पड़ा है.

समुद्र के जल स्तर में वृद्धि

आईपीसीसी के अनुसार, हमने समुद्र के जल स्तर को 1901 के बाद से अब तक करीब 20 सेंटीमीटर (7.9 इंच) बढ़ा दिया है. सुनने में तो यह ज्यादा नहीं लग रहा है, लेकिन इसकी वजह से दुनिया भर में लोगों को अपने घरों से बेघर होना पड़ा. आंतरिक विस्थापन निगरानी केंद्र के अनुसार, बांग्लादेश के निचले इलाकों में बाढ़ से हर साल सैकड़ों हजारों लोग विस्थापित हो रहे हैं.

डेटा आधारित जलवायु वेबसाइट कार्बन ब्रीफ के अनुसार 1.5 डिग्री सेल्सियस वॉर्मिंग की वजह से इस सदी के अंत तक पूरी दुनिया में समुद्र का औसत जल स्तर 48 सेंटीमीटर बढ़ जाएगा. अगर वॉर्मिंग 2 डिग्री तक पहुंच जाती है तो यह स्तर 56 सेंटीमीटर तक पहुंच जाएगा.

देखने में तो यह महज 8 सेंटीमीटर का फर्क है पर आपको जानकर हैरानी होगी कि आईपीसीसी के मुताबिक, समुद्र के जल स्तर में हर 10 सेंटीमीटर की वृद्धि होने पर एक करोड़ लोग प्रभावित होते हैं.

भारी बारिश

आईपीसीसी की नई रिपोर्ट के मुताबिक, औद्योगिक क्रांति से पहले जिस तरह की अत्यधिक बारिश की घटना हर 10 साल में एक बार होती थी, अब वह लगभग 30% अधिक हो रही है. 1.5 डिग्री वार्मिंग पर, यह 50% तक पहुंच जाएगी. 2 डिग्री पर, "अत्यधिक बारिश की घटनाÓ 70 प्रतिशत अधिक हो जाएगी.

भारत जैसे देशों पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ेगा. बीमा फर्म म्यूनिख रे के अनुसार, 2018 और 2019 में बाढ़ और भूस्खलन के कारण 700 से अधिक मौतें हुईं और 11 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ.

कार्बन ब्रीफ के अनुसार 1.5 डिग्री सेल्सियस वॉर्मिंग के साथ देश में बाढ़ से होने वाली आर्थिक क्षति साढ़े तीन गुना से अधिक और 2 डिग्री पर लगभग साढ़े पांच गुना बढ़ जाएगी.

सूखा

वॉर्मिंग की वजह से दुनिया के कुछ इलाकों में भारी बारिश होगी तो कहीं भयानक सूखा पड़ेगा. 2018 में आईपीसीसी ने कहा था कि ग्लोबल वॉर्मिंग को 2 डिग्री के बजाय 1.5 डिग्री पर सीमित करने से दुनिया के आधे लोग पानी के संकट से बच जाएंगे.

वहीं नई रिपोर्ट में आईपीसीसी का कहना है कि औद्योगिक क्रांति से पहले 10 साल में एक बार सूखा पड़ने की घटना होती थी अब यह 70 प्रतिशत तक बढ़ने की संभावना है. 1.5 डिग्री पर ये घटनाएं दोगुनी हो जाएंगी और 2 डिग्री पर यह 2.4 गुना बढ़ जाएंगी.

कार्बन ब्रीफ के अनुसार 1.5 डिग्री वॉर्मिंग के साथ दुनिया भर में सूखे की औसत अवधि दो महीने बढ़ जाती है. वहीं 2 डिग्री पर चार महीने और 3 डिग्री पर 10 महीने बढ़ जाती है.

2019 में विश्व खाद्य कार्यक्रम ने कहा था कि मध्य अमेरिका के "ड्राई कॉरिडोर" में सूखे और लगातार पांच वर्षों तक अनिश्चित मौसम के कारण 22 लाख लोगों को फसल का नुकसान हुआ.

इस साल फरवरी महीने में यह आंकड़ा लगभग 80 लाख तक पहुंच गया. इसके पीछे की एक वजह महामारी से उत्पन्न हुई आर्थिक परिस्थिति भी थी. हालांकि हाल के वर्षों में 'तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन' की वजह से यह संख्या बढ़ रही है. 2020 के नवंबर महीने में मध्य अमेरिका में एटा और इओटा तूफान का कहर भी देखने को मिला था.

इस क्षेत्र में हालात कितने बदतर होंगे यह हमारे द्वारा की जाने वाली जलवायु कार्रवाई पर निर्भर करेगा. कार्बन ब्रीफ के अनुसार 1.5 डिग्री सेल्सियस वॉर्मिंग पर मध्य अमेरिका में सूखे का औसत समय पांच महीने, 2 डिग्री पर आठ महीने और 3 डिग्री 19 महीने तक बढ़ जाएगा.

छोटी संख्या लेकिन बड़ा खतरा

सूखे की स्थिति उत्पन्न होने की वजह से गर्म लहरें भी आती हैं. हाल के वर्षों में कैलिफॉर्निया से लेकर दक्षिणी यूरोप और इंडोनेशिया से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक हर जगह ऐसी स्थिति देखने को मिली.

आईपीसीसी का कहना है कि वॉर्मिंग को 2 डिग्री की तुलना में 1.5 डिग्री तक सीमित करने से अत्यधिक गर्म लहरों के संपर्क में आने वाले लोगों की संख्या में लगभग 42 करोड़ की कमी आ सकती है.

वॉर्मिंग की वजह से लोगों की जान जाएगी. गरीबों, भूखों और बेघरों की संख्या बढ़ेगी. और वे उन तरीकों से राजनीतिक तनाव को बढ़ाएंगे जिनकी हम भविष्यवाणी नहीं कर सकते हैं. इससे ऐसे संघर्ष हो सकते हैं जिनका हम अभी सिर्फ अनुमान लगा सकते हैं. ऐसे में एक चीज साफ है कि जलवायु परिवर्तन की जब बात आती है तो मामूली अंतर बड़ा खतरा पैदा कर सकती है.

Source: DW

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