Defence Update: जिस चीनी ड्रोन से पाक ने किया था हमला, DRDO ने बनाया उससे बेहतर 'कामिकेज ड्रोन'
Defence Update: पाकिस्तान में भारतीय सेनाओं द्वारा चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने तुर्किए निर्मित कामिकेज ड्रोन से हमला किया, हालांकि भारत ने पाकिस्तान के सभी हमलों को हवा में ही मार गिराया। लेकिन इसके बाद भारत में कामिकेज ड्रोन के इस्तेमाल को लेकर बहस तेज हो गई कि आखिर भारत कब ऐसे ड्रोन खुद बनाएगा ताकि भविष्य आने वाले खतरों से चुनौतीपूर्ण ढंग से निपटा जा सके।
DRDO ने बनाया HQ-9 का तोड़
बेंगलुरु में डिफेंस रिसर्च एंड डिवेलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) की लैब, एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट (ADE) भारत का पहला कामिकेज़ ड्रोन, SWIFT-K बना रही है। यह ड्रोन 0.6 मैक, लगभग 735 किमी/घंटा की स्पीड से दुश्मन पर हमला कर सकता है, और इसमें ऑटो पायलट और स्टील्थ टेक्नोलॉजी भी शामिल है। SWIFT-K एक कामिकेज़ ड्रोन है जिसे दुश्मन के सेंसटिव टारगेट्स पर हमला करने के बाद खुद को नष्ट करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह स्टील्थ विंग फ्लाइंग टेस्टबेड (SWIFT) कार्यक्रम का हिस्सा है, इसमें एक विस्फोटक वॉरहेड है जो पाकिस्तान की चीनी HQ-9 सिस्टम जैसे दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को निशाना बनाने में सक्षम है। भारत ने हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन के एयर डिफेंस सिस्टम को भी काफी नुकसान पहुंचाया था।

कामिकेज ड्रोन की खासियत
इस ड्रोन में कई खासियत हैं। यह 0.6 मैक की स्पीड पर उड़ता है, जिससे इसे रोकना मुश्किल हो जाता है। इसका स्टील्थ डिज़ाइन रडार डिटेक्शन इसे दुश्मन के रडार से बचने में मदद करता है। इसका पूरी तरह से ऑटो पायलट होना भी एक बड़ी कामयाबी है क्योंकि इससे इसकी स्पीड में और भी तेजी आएगी। साथ ही संचालन के लिए किसी पायलट की आवश्यकता नहीं है। वर्तमान में रनवे से लॉन्च किया जाता है, भविष्य में यह किसी भी जगह से लॉन्च हो पाएगा।
9 महीने में पूरा हुआ स्ट्रक्चर
एडीई ने SWIFT-K की टेक्नोलॉजी की टेस्टिंग करने के लिए दो प्रोटोटाइप विकसित किए हैं। भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बैंगलोर ने इसके स्ट्रक्चर को बनाने में मदद की है। इसका शुरुआती डिजाइन और प्रोटोटाइप नौ महीने में पूरा किया गया, जिसकी तैयारी पहलगाम हमले के काफी पहले से चल रही थी। शायद तभी भारत को अपनी रक्षा जरूरतों का ऐहसास हो चुका था।
डिवेलपमेंट और टेस्टिंग
SWIFT-K की टेस्टिंग कर्नाटक के चित्रदुर्ग के पास एयरोनॉटिकल टेस्ट रेंज में किया गया, जहां इसने हाई-स्पीड टैक्सी ट्रायल (HSTT) को सफलतापूर्वक पूरा किया। इस टेस्टिंग में ड्रोन की स्थिरता और लैंडिंग गियर का मूल्यांकन किया गया। भविष्य के सुधारों में गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (GTRE) से स्वदेशी स्मॉल टर्बो फैन इंजन (STFE) को शामिल किया जाएगा।
क्षमता
SWIFT-K परियोजना घातक ऑटो पायलट लड़ाकू वायुयान (यूसीएवी) कार्यक्रम का हिस्सा है। जबकि SWIFT-K घातक के लिए टेक्नोलॉजीस की टेस्टिंग करता है, बाद वाला मिसाइलों और बमों को ले जाने में सक्षम एक बड़ा ड्रोन होगा। SWIFT-K का फ्लाइंग-विंग डिज़ाइन इसकी स्टेल्थ क्षमताओं को बढ़ाता है।
200 किलोमीटर से ले सकता है कमांड
SWIFT-K भारत की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाले दुश्मन के ठिकानों को बेअसर करने के लिए एक किफायती और प्रभावी समाधान प्रदान करता है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा करने वाली वायु रक्षा प्रणालियों को भी नष्ट कर सकता है। लगभग 1,050 किलोग्राम वजन के साथ, यह एक घंटे तक ऊंची ऊंचाई पर उड़ सकता है और 200 किलोमीटर दूर से कमांड प्राप्त कर सकता है। आधुनिक युद्ध में मानव रहित हवाई वाहन (यूएवी) बहुत महत्वपूर्ण हैं, जैसा कि आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच नागोर्नो-करबाख जैसे हालिया संघर्षों में देखा गया है, जहां ड्रोन युद्धों पर हावी रहे। हालांकि, यूएवी विकास में भारत पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसियों से पीछे है।
इस्लामाबाद तक ड्रोन की पहुंच
भारतीय नौसेना में इंटिग्रेशन के लिए डेक-आधारित लड़ाकू यूएवी वेरिएंट की खोज कर रहा है। घातक यूसीएवी 15 टन से कम वजन के साथ 30,000 फीट की ऊंचाई तक पहुंच सकता है। मिसाइलों, बमों और सटीक निर्देशित हथियारों से लैस, इसमें 52 किलोन्यूटन की शक्ति प्रदान करने वाला स्वदेशी कावेरी इंजन इस्तेमाल किया गया है। वर्तमान प्रोटोटाइप की लंबाई चार मीटर और पंखों का फैलाव पांच मीटर है। यह 200 किलोमीटर की सीमा में ज़मीनी से आसानी से कमांड ले कर काम कर सकता है और वर्तमान में एक घंटे तक उड़ान भर सकता है। जो यहां से इस्लामाबाद पहुंचने के लिए काफी है।
SWIFT-K पर तेजी से डिवेलपमेंट के बावजूद, फॉर्मेलिटीज और फंड अटके हुए हैं। ऑपरेशन सिंदूर में युद्ध में ड्रोन के महत्व के प्रदर्शन के बाद एडीई और भारतीय उद्योग इस प्रोग्राम में स्पीड दिखा सकते हैं।
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