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IAF Jaguars: अदृश्य रहने की क्षमता, परमाणु बम बरसाने की ताकत; जगुआर को रिटायर करना कितना सही फैसला?

IAF Jaguars: भारतीय वायु सेना (Indian Air Force) 2027 से 2040 के बीच अपने जगुआर (Jaguar Fighter Jet) स्ट्राइक विमान को रिटायर करने जा रही है। नए विमान प्राप्त करने में देरी की वजह से यह कदम इंडियन एयरफोर्स की ऑपरेशनल शक्ति को प्रभावित कर सकता है।

डिफेंस एक्सपर्ट्स का मानना है, कि मल्टी-रोल फाइटर जेट के अधिग्रहणों में देरी और तेजस Mk-1A कार्यक्रम में लेट होने की वजह से IAF लड़ाकू विमानों की कमी से जूझ रही है और ऐसे में जगुआर लड़ाकू विमानों को चरणबद्ध तरीके से हटाने से वायुसेना की ऑपरेशनल क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

why IAF Jaguars Retiring Nuke-Capable Jets Is Not Great Move

शानदार क्षमता वाला जेट है जगुआर

जगुआर एक शानदार और बेहतरीन क्षमता वाला विमान है, और यह लंबी दूरी तक कम ऊंचाई पर उड़ान भरने की अपनी अद्वितीय क्षमता के लिए जाना जाता है। AWACS कवरेज से 200 फीट बाहर, जगुआर ज्यादा ऊंचाई पर F-22 रैप्टर की तुलना में काफी चुपके से उड़ान भर सकता है।

यूरेशियन टाइम्स की एक रिपोर्ट में रिटायर्ड इंडियन एयरफोर्स जगुआर पायलट विजयेंद्र के ठाकुर सैन्य उपकरण खरीदते समय लागत और ऑपरेशनल क्षमता के बीच संतुलन बनाने के महत्व पर जोर देते हैं। उनका मानना ​​है, कि विमानों की लागत महत्वपूर्ण है, लेकिन उपकरणों के ऑपरेशनल लाभ संघर्ष के परिणामों को बहुत प्रभावित कर सकते हैं।

काफी कम ऊंचाई पर उड़ान भरने की क्षमता का फायदा

यूक्रेन में चल रहे युद्ध से सबसे अहम बात ये पता चली है, कि कम ऊंचाई पर उड़ान भरने वाले लड़ाकू विमान युद्ध के मैदान में काफी असरदार साबित हुए हैं और ये रडार को भी चकमा देने में कामयाब हुए हैं। इसीलिए आज की तारीख में उच्च ऊंचाई वाले युद्ध में प्रगति के बावजूद, जगुआर की कम ऊंचाई पर उड़ान भरने की क्षमता महत्वपूर्ण बनी हुई है। भारतीय वायुसेना ने अपनी लड़ाकू प्रभावशीलता को बनाए रखने के लिए जगुआर को लगातार एडवांस किया है।

यूक्रेनी MiG-29s, Su-24, Su-25 और Su-27 लड़ाकू विमान हमेशा दुश्मन के रडार क्षमता से नीचे, बहुत कम ऊंचाई पर अपने स्टैंडऑफ हथियार लॉन्च पॉइंट पर उड़ते हैं, ताकि वो दुश्मनों की नजर से बच सके। ये फाइटर जेट लॉन्च पॉइंट के पास पहुंचकर ऊपर की ओर बढ़ते हैं और अपने हथियार लॉन्च करते हैं और फिर वापस लौट आते हैं।

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DARIN अपग्रेडेशन

1980 के दशक की शुरूआत से ही भारतीय वायुसेना में इसके शामिल होने के बाद से ही भारतीय वायुसेना ने HAL और DRDO के साथ साझेदारी में जगुआर को लगातार एडवांस किया है, ताकि इसके सीधे हमले, मारक क्षमता और लक्ष्य को निशाना बनाने की क्षमताओं में सुधार हो सके।

DARIN (डिस्प्ले अटैक रेंजिंग इनर्शियल नेविगेशन) अपग्रेड को तीन चरणों में किया गया है- DARIN-1, DARIN-2 और DARIN-3।

DARIN-3 अपग्रेड ने जगुआर की क्षमताओं को काफी हद तक बढ़ा दिया है। इस अपग्रेड में एडवांस एवियोनिक्स और हथियार प्रणालियों का एकीकरण शामिल है, जिससे यह IAF के नेटवर्क-केंद्रित युद्ध ढांचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। इस अपग्रेडेशन में नए मिशन कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर, कॉकपिट डिस्प्ले (एसएमडी, इंजन और फ्लाइट इंस्ट्रूमेंटेशन सिस्टम), एक फायर कंट्रोल रडार, एक हाइब्रिड नेविगेशन सिस्टम और एडवांस मोड के साथ एक ऑटोपायलट को एकीकृत करना शामिल था।

एयरफोर्स के सामने चुनौतियां और समाधान क्या हैं?

जगुआर की सेवा अवधि बढ़ाने के लिए हर महीने उड़ान के घंटों को कम करना होगा और एयरफ्रेम थकान और इंजन के घिसाव जैसे मुद्दों को हल करना होगा। जगुआर का निर्माण करने वाली कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के पास कठोर परीक्षण और उपकरणों को बदलने के लिए आवश्यक कुछ तकनीकी उपकरणों की कमी हो सकती है।

हालांकि, एडोर 811 इंजन को उसी परिवार के अन्य इंजन से बदलने के विकल्प मौजूद हैं। लिहाजा लगातार आधुनिकीकरण और एयरफ्रेम और इंजन के संभावित अपग्रेडेशन के साथ, जगुआर 2035 के बाद भी ऑपरेशन में रह सकता है।

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स्वदेशी क्षमताएं और आधुनिकीकरण

डारिन-3 अपग्रेड एवियोनिक्स और हथियार प्रणालियों में भारत की स्वदेशी क्षमताओं को दर्शाता है। डिफेंस एक्सपर्ट ठाकुर, आयात पर निर्भर रहने के बजाय रक्षा जरूरतों के लिए घरेलू समाधान बनाने के लिए रिसर्च एंड डेवलपमेंट में निवेश करने की वकालत करते हैं।

इस नजरिए से न सिर्फ भारत का रक्षा उद्योग मजबूत होगा, बल्कि विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर देश की निर्भरता भी कम हो जाएगी। ठाकुर इस बात पर भी जोर देते हैं, कि अच्छी तरह से प्रशिक्षित पायलट और सैनिक अपने उपकरणों की क्षमताओं को मैक्सिमम तक ले जा सकते हैं, भले ही वे तकनीकी रूप से विरोधियों के उपकरणों से कमतर क्यों न हों।

ऑपरेशन लाभ बनाम लागत

ठाकुर का तर्क है, कि खरीद संबंधी फैसला लेते समय लागत के साथ-साथ ऑपरेशनल संबंधी लाभ भी एक महत्वपूर्ण विचार होना चाहिए। उनका मानना ​​है, कि ये लाभ संघर्ष के परिणामों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए संभावित विरोधियों पर तकनीकी बढ़त बनाए रखना काफी महत्वपूर्ण है।

उन्होंने निष्कर्ष निकालते हुए कहा, कि लागत महत्वपूर्ण है, लेकिन सैन्य खरीद के फैसलों में इसे एकमात्र फैक्टर नहीं होना चाहिए। मजबूत और प्रभावी रक्षा क्षमताओं को सुनिश्चित करने के लिए लागत और ऑपरेशनल लाभ दोनों पर विचार करना आवश्यक है।

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