टूटे दांतों वाला 'निर्दयी' दैत्याकार जीव, जो करोड़ों साल पहले समुद्र पर करता था राज, मिले उस 'राक्षस' के अवशेष
वैज्ञानिकों का मानना है कि, ये खतरनाक प्रजाति अपने शिकार पर इतना हिंसक होकर वार करता होगा और उन्हें काटता होगा, कि इसके दांत धीरे धीरे कमजोर होने लगे होंगे...
वॉशिंगटन, अगस्त 28: हमारी दुनिया ऐसे रहस्यों से भरी पड़ी है, जिसका खुलासा करोड़ों साल तक होता रहेगा, फिर भी रहस्य कम नहीं होंगे। समुद्र में रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों ने एक ऐसे दैत्याकार जीव की खोज की है, जिसका एकछत्र राज्य समुद्र में चलता है। उस वक्त एक तरफ जहां धरती पर डायनासोर अपना शासन करते थे, तो समुद्र में टूटे दांतों वाला ये दानव बाकी जीवों के लिए यमराज था।

समुद्र का खतरनाक 'यमराज'
एक नए अध्ययन में पाया गया है कि, क्रिटेशियस काल के अंत में एक हत्यारे व्हेल जैसे दांतों वाला एक विशाल दैत्याकार जीव मसासौर मोरक्को के आसपास के महासागरों पर शासन करता था। रिसर्च में पता चला है कि, ये जीव समु्द्र का सबसे बेरहम शिकारी था और ये काफी रफ्तार के साथ अपने शिकार पर वार करता था। समुद्र में खौफ का दूसरा नाम बन गये इस खौफनाक जीव का नाम था, थैलासोटिटन एट्रोक्स, जो अब विलुप्त हो चुका है। ये जीव डायनासोर के काल के समय ही मौजूद था और ये विलुप्त भी डायनासोर के साथ ही हुआ। यानि, एक तरह जहां जमीन पर डायनासोर बाकी जीवों के लिए काल बने हुए थे, वहीं समुद्र में ये जीव बाकी जीवों के लिए यमराज बना हुआ था।

करीब 30 फीट थी लंबाई
थैलासोटिटन एट्रोक्स नाम का विलुप्त शिकारी करीब 30 से 33 फीट (9 से 10 मीटर) लंबा होता था और ये अपने सामने आने वाले हर समुद्री जीव को अपना शिकार बनाता था। इतना ही नहीं, जब इस शिकार को भूख लगती थी, तो ये अपने समु्द्री दोस्त मसासौर को भी नहीं छोड़ता था और उसे भी खा जाता था। थैलासोटिटन नाम ग्रीक शब्द "थलासा" और "टाइटन" से आया है, जिसका अर्थ है "समुद्री विशालकाय", और इस प्रजाति का नाम एट्रोक्स है, जिसका मतलब "क्रूर" या "निर्दयी" होता है। रिसर्चर्स को इस निर्दयी जीव के जीवाश्म मिले हैं, जिसमें उसके जबड़े और अन्य अवशेष शामिल हैं। ये खोज पश्चिमी मोरक्को में कैसाब्लांका के पास की गई है। रिसर्च के मुताबिक, ये एक ऐसा क्षेत्र है, जो क्रेटेशियस काल के दौरान पानी के नीचे था।

टूट गये थे इस जीव के दांत
शोधकर्ताओं ने पाया है कि टी. एट्रोक्स के दांत काफी छिल गए थे और वो खराब होकर टूट गए थे। वैज्ञानिकों का मानना है कि, ये खतरनाक प्रजाति अपने शिकार पर इतना हिंसक होकर वार करता होगा और उन्हें काटता होगा, कि इसके दांत धीरे धीरे कमजोर होने लगे होंगे और फिर टूट जाते होंगे। ये जीव अपने शिकार की हड्डियों को भी नहीं छोड़ता था और उन्हें भी काट देता था। वैज्ञानिकों के मुताबिक, आज से करीब 6.6 करोड़ साल पहले जब धरती से एक ऐस्टेरॉयड टकराया था, उसमें धरती पर मौजूद डायनासोर विलुप्त हो गये थे और उसी समय ये दैत्याकार जीव भी विलुप्त हो गया। इस जीव के मिले अवशेष मोरक्को में एक जीवाश्म रिकॉर्ड में जोड़ती है जो दिखाती है कि क्षुद्रग्रह के हिट होने से पहले समुद्र काफी समृद्ध और विविध जीवन से भरा हुआ था।

मेगाप्रिडेटर था थैलासोटिटन
इस रिसर्च के सह-लेखक र-एडिन जलील ने कहा कि, 'इस रिसर्च से हमें पता चलता है कि, डायनासोर युग के अंत से पहले समुद्र विविध और समृद्ध जीवनों से भरा हुआ था और उस वक्त जानवरों को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए लगातार पारिस्थितिक तंत्र के मुताबिक ढलना पड़ता था।' उन्होंने कहा कि, "थैलासोटिटन खाद्य श्रृंखला के शीर्ष पर मेगाप्रिडेटर की भूमिका निभाते हुए खाद्य श्रृंखला के उस चित्र को पूरा करता था।" मोसासौर समुद्री सरीसृपों का एक विविध समूह था, जो दूर से आधुनिक छिपकलियों और सांपों से संबंधित था। उन्होंने दुनिया के महासागरों पर लाखों वर्षों तक शासन किया, जब डायनासोर भूमि पर हावी थे। जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ द जूलॉजिकल इंस्टीट्यूट आरएएस में प्रकाशित 2014 के एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि, रूस में मोसासॉरस हॉफमैनी नामक एक अलग प्रजाति से एक मोसासौर नमूना लगभग 56 फीट (17 मीटर) लंबा था।

किलर व्हेल और शार्क की निभाते थे भूमिका
रिसर्च में पता चला है कि, समुद्र में मौजूदा खाद्य श्रृंखला में जो भूमिका अभी किलर व्हेल और ग्रेट व्हाइट शार्क निभाते हैं, वही भूमिका उस वक्त थैलासोटिटन भी निभाता होगा और पारिस्थितिक तंत्र को बनाए रखने में मदद करता होगा। अध्ययन के अनुसार, अधिकांश मोसासौरों के लंबे जबड़े और पतले दांत थे, लेकिन टी. एट्रोक्स ने एक छोटा, चौड़ा थूथन भी विकसित किया था, जिससे उसके काटने की शक्ति और छोटे, शंक्वाकार हत्यारे व्हेल जैसे दांत बढ़ गए थे, जो बड़े शिकार को काटते समय बढ़ी हुई ताकतों को बर्दाश्त कर सकते थे। शोधकर्ताओं ने टी. एट्रोक्स के समान रॉक बेड में कम से कम तीन अन्य मोसासौरों की जीवाश्म हड्डियों को पाया है, जो एसिड क्षति के संकेत दिखाते हैं। वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि, इन मोसासौरों को टी. एट्रोक्स के पेट में पचाया गया था और फिर से थूक दिया गया था।












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