कहां गई विदेशों से मिली 300 टन मेडिकल मदद, अस्पतालों में हाहाकार, राज्यों को इंतजार, जिंदगी लेने वाली लापरवाही
विदेशों से पिछले 5 दिनों में भारत को 300 टन मेडिकल मदद मिली है लेकिन ना तो राज्यों को मेडिकल सामान भेजा गया है और ना ही अस्पतालों को।
नई दिल्ली, मई 04: पिछले पांच दिनों में 25 फ्लाइट से भारत में विश्व के अलग अलग देशों से 300 टन से ज्यादा इमरजेंसी मेडिकल मदद कोविड-19 से पीड़ितों की जान बचाने के लिए नई दिल्ली पहुंचाई गई है। दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड के प्रवक्ता के मुताबिक विदेशों से अब तक 5500 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर्स, 3200 ऑक्सीजन सिलेंडर और एक लाख 36 हजार रेमडेसिविर इंजेक्शन भारत को मिल चुकी है, जिससे हजारों कोविड-10 पीड़ितों की जिंदगी बचाई जा सकती है लेकिन सवाल ये है कि विदेशों से मिलने वाला ये मदद अभी है कहां? क्या राज्यों में ऑक्सीजन सिलेंडर्स पहुंचाए गये हैं? क्या अस्पतालों को इमरजेंसी मेडिकल सामान मिले हैं? शायद नहीं। जिन जगहों पर सबसे ज्यादा ऑक्सीजन सप्लाई की जरूरत है, वहां पर भी अभी तक विदेशों से आए ऑक्सीजन की सप्लाई नहीं की गई है, ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या कहीं कोई बड़ी लापरवाही हो रही है?
विदेशी मदद कहां है ?
स्क्रॉल की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग के डायरेक्टर जनरल डॉ. नूतन मुंडेजा ने कहा कि 'जहां तक मुझे मालूम है, अभी तक हमें कुछ भी नहीं मिला है'। दिल्ली में इस वक्त कोरोना वायरस के एक लाख से ज्यादा एक्टिव मरीज हैं, जिनमें से 20 हजार मरीज अस्पताल में भर्ती हैं और उन्हें किसी भी वक्त ऑक्सीजन की जरूरत पड़ सकती है। दिल्ली के अस्पतालों में ऑक्सीजन की भारी किल्लत है, जिसको लेकर दिल्ली हाईकोर्ट केन्द्र सरकार और दिल्ली सरकार को कई बार फटकार लगा चुकी है, लेकिन अब तक दिल्ली के अस्पतालों को ऑक्सीजन की सप्लाई सही तरीके से नहीं की गई है। इसी एक मई को दिल्ली के बत्रा अस्पताल में ऑक्सीजन की किल्लत से 12 मरीज और एक डॉक्टर की मौत हुई है और सवाल उठ रहे हैं कि विदेशों से जो मदद मिल रही है भला उसे अस्पतालों तक कब पहुंचाया जाएगा।
भारत को विदेशी मदद
दिल्ली एयरपोर्ट अथॉरिटी के मुताबिक 30 अप्रैल को ब्रिटेन से 500 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर्स, आयरलैंड से 700 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर्स, 2 मई को अमेरिका से एक हजार ऑक्सीजन सिलेंडर की दूसरी खेप और उजबेकिस्तान से 150 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर्स पहुंचे हैं, लेकिन उसके बाद भी दिल्ली के अस्पतालों में ऑक्सीजन गैस नहीं पहुंचाया गया है। दिल्ली के अस्पताल बार बार ऑक्सीजन के लिए गुहार लगा रहे हैं और विदेशों से आया ऑक्सीजन दिल्ली एयरपोर्ट के गोदाम में पड़ा है। विदेशों से मिली इमरजेंसी सप्लाई कहां है और उसका स्टेटस क्या है, इसको लेकर अभी तक कुछ भी रिपोर्ट नहीं है। वहीं, फ्रांस से मिले ऑक्सीजन जेनरेशन यूनिट को दिल्ली के 6 अस्पतालों में डिप्लॉय किया गया है।
अंधेरे में राज्य सरकारें !
स्क्रॉल की रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ दिल्ली ही नहीं, देश कई और राज्यों को भी इमरजेंसी मेडिकल सामानों की सप्लाई नहीं की गई है। दिल्ली एयरपोर्ट के प्रवक्ता के मुताबिक 'अभी तक हमारे पास ऐसा रिकॉर्ड नहीं है कि राज्यों को यहां से मेडिकल सामानों को भेजा गया है'। वहीं, द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक 'अधिकृत मंत्रियों का समूह अभी राज्यों से मिले रिक्वेस्ट के आधार पर सूची तैयार कर रहे हैं'। वहीं, 6 राज्यों के अधिकारियों ने सोमवार को स्क्रॉल को बताया है कि 'अभी तक हमें केन्द्र सरकार से कोई जानकारी नहीं मिली है कि उन्हें विदेशों से मिली मदद का हिस्सा मिल रहा है।' पंजाब के स्वास्थ्य विभाग के सेक्रेटरी कुमार राहुल ने स्क्रॉल को बताया है कि 'हमें मेडिकल सामानों की सख्त जरूरत है, लेकिन अभी तक हमें ये नहीं पता है कि वो कहां पहुंचे हैं।' वहीं तामिलनाडु हेल्थ डिपार्टमेंट को भी विदेशी मदद मिलने को लेकर कोई जानकारी नहीं है। तामिलनाडु स्वास्थ्य विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी राधाकृष्णन का कहना है कि 'अभी तक हमें कोई जानकारी नहीं है कि विदेश मदद राज्यों को मिल रहा है'। उन्होंने कहा कि 'अभी तक हमें नहीं पता है कि केन्द्र सरकार को क्या मिला है और वो मदद किसे मिलने वाला है'।
बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल भी बेखबर
स्क्रॉल की रिपोर्ट के मुताबिक अभी तक बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा को भी विदेशी मदद को लेकर कोई जानकारी नहीं है। बिहार में पिछले कुछ हफ्तों के दौरान कोरोना वायरस संक्रमितों के मामले में काफी ज्यादा इजाफा हुआ है, लेकिन, अभी तक बिहार सरकार को भी नहीं पता है कि उन्हें विदेशी मदद का कुछ हिस्सा मिलने वाला है या नहीं। बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग के सीनियर अधिकारी का कहना है कि 'अगर हमें इमरजेंसी मेडिकल सामान, ऑक्सीजन सिलेंडर और ऑक्सीजन कंसंट्रेटर्स मिलता है तो इस वक्त बिहार को काफी फायदा होगा'। वहीं, झारखंड के नेशनल हेल्थ मिशन के डायरेक्टर रवि कुमार शुक्ला ने कहा है कि राज्य सरकार को अभी तक इमरजेंसी मदद को लेकर कोई जानकारी नहीं है। वहीं पश्चिम बंगाल, जहां ऑक्सीजन की काफी ज्यादा जरूरत है और पिछले दिनों ऑक्सीजन की कमी की वजह से मरीजों को काफी परेशानी हुई है, उसे भी विदेशी मदद को लेकर कोई जानकारी नहीं है। पश्चिम बंगाल के हेल्थ सर्विस के डायरेक्टर अजय चक्रवर्ती के मुताबिक 'पश्चिम बंगाल को ऑक्सीजन सिलेंडर और ऑक्सीजन कंसंट्रेटर्स की काफी ज्यादा जरूरत है लेकिन हमें केन्द्र सरकार से विदेशी मदद मिल रही है, इसकी हमें कोई जानकारी नहीं है'। वहीं, उड़ीसा सरकार ने भी कहा है कि उन्हें अभी तक केन्द्र सरकार से कोई जानकारी नहीं मिली है। उड़ीसा स्वास्थ्य विभाग के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी प्रदीप्त कुमार महापात्रा के मुताबिक 'उड़ीसा को अभी रेमडेसिविर इंजेक्शन की सख्त जरूरत है लेकिन हमें विदेशी मदद की कोई जानकारी नहीं है। मैं केन्द्र सरकार के स्वास्थ्य सचिव से रेमडेसिविर इंजेक्शन सप्लाई को लेकर हर दिन बात कर रहा हूं, लेकिन अभी तक हमें आश्वासन भी नहीं मिला है'।

पारदर्शिता का अभाव !
स्क्रॉल की रिपोर्ट के मुताबिक जो भी विदेशी मदद दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुंच रहा है, उसे इंडियन रेस क्रॉस सोसाइटी के माध्यम से भारत सरकार के हवाले किया जा रहा है। रेड क्रॉस सोसाइटी एक एनजीओ है, जो भारत सरकार के काफी करीब है। भारत सरकार विदेशों से आर्थिक मदद भी रेड क्रॉस सोसाइटी के जरिए ही ले रही है। दिल्ली एयरपोर्ट के प्रवक्ता के मुताबिक जो भी विदेशी मदद पहुंचता है, उसे दिल्ली एयरपोर्ट प्रशासन इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी के हवाले कर देता है और फिर भारत सरकार के निर्देशों के मुताबिक रेड क्रॉस सोसाइटी को मेडिकल सामानों को बांटना है। दिल्ली एयरपोर्ट के प्रवक्ता के मुताबिक '3500 स्क्वायर मीटर के दायरे में एक जीवोदय वीयर हाउस बनाया गया है, जहां पर विदेशों से आए मेडिकल सप्लाई को रखा जा रहा है'

रेडक्रॉस सोसाइटी ने क्या कहा ?
इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी के सेक्रेटरी जनरल आरके जैन ने स्क्रॉल को बताया है कि रेड क्रॉस सोसाइटी का काम बस इतना भर है कि विदेशों से आए मेडिकल मदद को प्राप्त करना और कस्टम से क्लियर करवाने के बाद उसे एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड के हवाले कर देना। एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड केन्द्र सरकार की कंपनी है, जो विदेशों से मिली मेडिकल मदद की देखरेख कर रही है। उन्होंने कहा कि 'मेडिकल मदद कहां भेजना है, इसका फैसला केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को करना है।' वहीं, इंडियर रेड क्रॉस सोसाइटी के एक और अधिकारी ने स्क्रॉल को नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि 'विदेशों से आया कुछ सामान अभी ट्रांजिट के अंदर है'। हालांकि, इससे ज्यादा कुछी भी जानकारी देने से उन्होंने इनकार कर दिया। उन्होंने आगे सिर्फ इतना कहा कि 'आपको चाहे स्वास्थ्य मंत्रालय या फिर एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड से बात करनी चाहिए'।

एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड की चुप्पी
स्क्रॉल की रिपोर्ट के मुताबिक जब एचएचएल लाइफकेयर लिमिटेड के चेयरपर्सन बेजी जॉर्ज से सवाल पूछा गया तो उन्होंने किसी भी सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया। जब उनसे पूछा गया कि क्या अभी तक किसी राज्य को कुछ मेडिकल मदद की सप्लाई की गई है तो उन्होंने कहा कि 'सामान आ रहे हैं और जा रहे हैं और आपको स्वास्थ्य मंत्रालय से पूछना चाहिए'। वहीं स्क्रॉल ने केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के ज्वाइंट सेक्रेटरी मनदीप भंडारी से इमेल के जरिए सवाल पूछा लेकिन उनकी तरफ से किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया गया। उन्होंने फोन कॉल पर भी कोई जवाब नहीं दिया।

लापरवाही की हद!
मानवीय आधार पर अस्पतालों को मेडिकल सामान मुहैया करवाने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता ने नाम ना छापने की शर्त पर स्क्रॉल को बताया है कि 'रेड क्रॉस सोसाइटी के पास इतने लोग ही नहीं हैं कि वो राहत कार्य को संभाल सके। वहीं दूसरी दिक्कत है कस्टम से क्लियरेंस मिलने की। प्रधानमंत्री मोदी कह चुके हैं कि कस्टम अधिकारी देर ना करें और इमरजेंसी मेडिकल सामानों से कस्टम ड्यूटी को भी अभी हटा लिया गया है, लेकिन फिर भी वहां से क्लियरेंस नहीं मिल रहा है। कई प्राइवेट अस्पतालों के भी मेडिकल सामान अभी भी एयरपोर्ट पर ही अटके पड़े हैं, उन्हें क्लियरेंस नहीं मिली है, जबकि इन्हें फौरन क्लियरेंस मिल जाना चाहिए'। सबसे ज्यादा लापरवाही अभी भी ऑक्सीजन को लेकर बरती जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली के कई प्राइवेट अस्पतालों ने भी अलग अलग जगहों से ऑक्सीजन सिलेंडर और ऑक्सीजन कंसंट्रेटर्स मंगवाए हैं, लेकिन उन्हें भी अभी तक कस्टम से क्लियरेंस नहीं मिल पाई है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर इतनी बड़ी लापरवाही के लिए किसे दोष दें?
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