नहीं संभल पाएगा चीन, बार-बार दोहरा रहा एक ही गलती, अब दुनिया को तबाह करके ही दम लेगा यह देश
चीन एक नहीं कई तरह के संकटों से जूझ रहा है। चीन में जो सबसे बड़ा संकट बताया जा रहा है वह रियल एस्टेट का संकट है। रियल स्टेट सेक्टर कर्ज में डूबा हुआ है।
बीजिंग, 29 जुलाईः चीनी अर्थव्यवस्था में दूसरी तिमाही में 0.4 फीसदी की मामूली वृद्धि के बाद देश को एक और झटका लगा है। पोलित ब्यूरो के सदस्यों के बीच एक त्रैमासिक आर्थिक बैठक के बाद एक बयान जारी किया गया जहां नेताओं ने कहा कि वे 'सर्वोत्तम परिणाम संभव' प्राप्त करने का प्रयास करेंगे। इससे पहले चीन ने अपने लिए विकास दर 5.5 फीसदी का लक्ष्य रखा था। हालांकि, बैठक के बाद एक बार भी इस आंकड़े का उल्लेख नहीं किया गया, जिससे पता चलता है कि अधिकारी लक्ष्य हासिल करने के बारे में पोलित ब्यूरो के सदस्य आशावादी नहीं थे।

शी जिनपिंग ने की बैठक
गौरतलब है कि बैठक की अध्यक्षता राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने की थी और इस प्रकार यह दुर्लभ है कि 25 सदस्यीय मजबूत कोर समूह एक आम सहमति पर नहीं आ सका और एक निश्चित संख्या नहीं दे सका। हालांकि, पोलित ब्यूरो द्वारा कोई विशेष जीडीपी संख्या जारी नहीं करना कोई नई घटना नहीं है। 2020 में, चीन ने अपने सकल घरेलू उत्पाद के लक्ष्यों को पूरी तरह से खत्म कर दिया था और किसी भी तरह के आंकड़े देने से इनकार कर दिया था।

एक साल की तुलना में हुई मामूली वृद्धि
चीनी अर्थव्यवस्था के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल-जून तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में मामूली वृद्धि हुई है। एक साल पहले की तुलना में इसमें 0.4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए यह एक बेहद निराश करने वाला आंकड़ा है। जानकारों के मुताबिक चीन की अर्थव्यवस्था ढहने के कगार पर खड़ी है। मुद्रास्फीति से उपजी हुई मंदी मई-जून में सबसे खराब स्थिति में देखी गई है। इसमें लगातार दो तिमाहियों के दौरान संकुचन देखा गया है। संभावना है कि चीन की सरकार इसके सुधार के लिए आर्थिक प्रोत्साहन उपायों को लागू करें। लेकिन ब्याज में कटौती की आशंकाएं जस की तस बनी हुई हैं

कई संकटों से गुजर रहा चीन
चीन एक नहीं कई तरह के संकटों से जूझ रहा है। चीन में जो सबसे बड़ा संकट बताया जा रहा है वह रियल एस्टेट का संकट है। रियल स्टेट सेक्टर कर्ज में डूबा हुआ है। इस वजह से बड़े-बड़े अरबपतियों की संपत्ति आधी हो गयी है। बैंकिंग सेक्टर का हाल भी रिएल स्टेट सेक्टर जैसा ही है। हालात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बैंकों की सुरक्षा के लिए सरकार को टैंकों की मदद लेनी पड़ रही है।

बिजली संकट से भी जूझ रहा देश
इसके अलावा चीन बिजली संकट का भी सामना कर रहा है। चीन कोयले की जबरदस्त कमी से जूझ रहा है। पर्याप्त बिजली नहीं होने से चीन के औद्योगिक क्षेत्रों में घंटों बिजली कटौती हो रही है। इससे चीन का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर प्रभावित हुआ है। चीन का कर्ज भी एक अलग संकट है। ड्रैगन का कुल कर्ज भी तेजी से बढ़ता ही जा रहा है। फिलहाल चीन का कुल कर्ज उसके जीडीपी का 264 फीसदी हो चुका है। ऐसे में यह लगभग तय हो चुका है चीन आने वाले वक्त में भयंकर मंदी की चपेट में आने वाला है।

चीन डूबा तो जद में आएंगे कई देश
अब अगर चीन का सामना आर्थिक मंदी से होता है तो यह श्रीलंका या जिम्बाव्वे जैसा नहीं होगा। अगर चीन में संकट आता है तो पूरी दुनिया इसकी जद में आ जाएगी। चीन, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और अगर इसकी अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचती है तो आशंका है कि यह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला देगी। दुनिया के कई देश इसकी जद में आ जाएंगे। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। तभी तो आईएमएफ ने भारत के विकास दर को चालू वित्त वर्ष के लिए आर्थिक विकास दर के अनुमान को 8.2% से घटाकर 7.4% कर दिया है। इसके लिए जो कारण बताए गए हैं उसमें से एक प्रमुख कारण चीन में मंदी की आशंका को भी बताया गया है।

सख्त नीतियों पर अड़ा हुआ है चीन
तमाम खतरों को जानने के बावजूद चीन की सरकार अपनी सख्त नीतियों पर अड़ी हुई है। एक तरफ जहां दुनिया भर के देश एक महामारी का मुकाबला करने के बाद अपनी सीमाओं और अर्थव्यवस्थाओं को खोल रहे हैं, वहीं चीन अपनी 'शून्य-कोविड सहिष्णुता' नीति को बनाए रखने के लिए कठोर उपाय कर रहा है। यह रणनीति उन प्राथमिक कारणों में से एक रही है जिसके कारण चीन अपने आर्थिक सुधार में पिछड़ गया है। महीनों तक, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा लगाए गए सख्त लॉकडाउन उपायों के कारण विनिर्माण में कमी आई क्योंकि कारखाने और कार्यालय लंबे समय तक बंद रहे। लंबे समय तक, चीन दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था था। लेकिन अब एक वैश्विक महामारी, जो चीन की ही मिट्टी से उत्पन्न हुई है, अपनी विकास कहानी पर एक डरावना हैंडब्रेक लगाने में कामयाब रही है।












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