चीन और श्रीलंका में बढ़ा तनाव, क्या भारत हिंद महासागर में खींच पाएगा ड्रैगन के खिलाफ 'लक्ष्मण रेखा'?

चीन के दबाव के आगे श्रीलंका ने झुकने से साफ इनकार कर दिया है, ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि, क्या भारत हिंद महासागर में चीन को रोक पाएगा?

कोलंबो/नई दिल्ली, नवंबर 14: श्रीलंका की कृषि अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने की कोशिश नाकाम होने के बाद चीन बौखलाया हुआ है और वो येन केन प्रकारेण श्रीलंका से बदला लेने की कोशिश में जुटा हुआ है। लिहाजा, पिछले कुछ महीनों से चीन और श्रीलंका के बीच की खाई ना सिर्फ बढ़ गई है, बल्कि दोनों देशों के बीच के डिप्लोमेटिक संबंधों में भी दरार पड़ती नजर आ रही है। हालांकि, इस मौके पर भारत पूरी तरह से श्रीलंका के साथ खड़ा हो गया है, लेकिन सवाल ये है, कि क्या भारत आने वाले वक्त में चीन को हिंद महासागर से दूर रखने में कामयाब हो पाएगा?

श्रीलंका और चीन आमने-सामने

श्रीलंका और चीन आमने-सामने

चीन और श्रीलंका जैविक खाद के एक शिपमेंट को लेकर एक दुर्लभ राजनयिक संघर्ष में शामिल हो गये हैं। दरअसल, श्रीलंकन सरकार ने पिछले साल अचानक फैसला लेते हुए देश में कैमिकल खाद के उत्पादन पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान कर दिया था और फिर चीन से जैविक उर्वरक खाद खरीदने का फैसला लिया गया। इसके लिए श्रीलंकन सरकार ने चीन की एक बड़ी खाद कंपनी से करार किया। लेकिन जब कंपनी की तरफ से खाद भेजा गया और श्रीलंका में बंदरगाह पर खाद की जांच की गई, तो पता चला कि खाद में काफी ज्यादा बैक्टीरिया मिले हुए हैं, जिससे खेत की उर्वरा शक्ति ही खत्म हो जाती है। श्रीलंका ने उस खाद को लेने से इनकार करते हुए शिपमेंट को वापस चीन भेज दिया और श्रीलंका की सरकार बैंक ने खाद का भुगतान रोक दिया, जिसके बाद चीन बौखलाया हुआ है और श्रीलंका के खिलाफ तमाम हथकंडे अपना रहा है।

चीन-श्रीलंका में कूटनीतिक तनाव

चीन-श्रीलंका में कूटनीतिक तनाव

चीन की कंपनी ने खाद की जो बड़ी शिपमेंट भेजी थी, श्रीलका की जांच एजेंसियों ने गुणवत्ता के मुद्दों का हवाला देते हुए उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। श्रीलंका को दुनिया के पहले पूरी तरह से जैविक खेती वाले देश में बदलने के प्रयास में, कोलंबो ने क़िंगदाओ सीविन बायो-टेक समूह के साथ एक समझौता किया था, जो एक चीनी कारोबारी कंपनी है, जो समुद्री शैवाल आधारित उर्वरक में बनाने में विशेषज्ञता रखता है। लेकिन 20,000 टन जैविक खाद की पहली खेप को ठुकराने के श्रीलंका के फैसले से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव पैदा हो गया है।

शिपमेंट को किया खारिज

शिपमेंट को किया खारिज

श्रीलंकाई सरकारी एजेंसी नेशनल प्लांट क्वारंटाइन सर्विस ने शिपमेंट को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि, कार्गो के एक नमूने में रोगजनक बैक्टीरिया थे, जो फसल को बर्बाद करने वाले हैं। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, श्रीलंका के कृषि विभाग के महानिदेशक डॉ अजंता डी सिल्वा ने कहा कि कार्गो नमूनों के परीक्षण से पता चला है कि उर्वरक "बाँझ" नहीं था। बीबीसी ने डी सिल्वा के हवाले से कहा कि, "हमने ऐसे बैक्टीरिया की पहचान की है जो गाजर और आलू जैसे पौधों के लिए हानिकारक हैं।"

श्रीलंका ने रोका चीन का भुगतान

श्रीलंका ने रोका चीन का भुगतान

चूंकि शिपमेंट को श्रीलंका में उतारने की अनुमति नहीं दी गई, इसलिए एक चीन द्वारा संचालित उर्वरक कंपनी को श्रीलंका के स्वामित्व वाले पीपुल्स बैंक को कार्गो के लिए 90 लाख डॉलर का भुगतान करने से रोकने का आदेश श्रीलंका की एक कोर्ट ने पास कर दिया। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि अनुबंध की शर्तों ने खरीदार को भुगतान रोकने की अनुमति दी थी या नहीं, लेकिन भुगतान रोके जाने से गुस्साए चीन ने श्रीलंका की सरकारी बैंक को ब्लैकलिस्ट कर दिया, जो श्रीलंका के लिए बहुत बड़ा झटका था। अक्टूबर के अंत में, चीनी दूतावास के आधिकारिक ट्विटर हैंडल ने सरकारी श्रीलंकाई बैंक को ब्लैकलिस्ट करने की घोषणा करते हुए घटनाओं की एक समयरेखा पोस्ट की। लेकिन, चीन की एंबेसी ने उर्वरक की गुणवत्ता और करार की शर्तों के बारे में कोई जानकारी नहीं दी। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन ने कहा कि, कार्गो पहले ही तीसरे पक्ष के परीक्षण से गुजर चुका है और "चीन ने हमेशा निर्यात की गुणवत्ता को बहुत महत्व दिया है।"

चीन को बदनाम करने का आरोप

चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता किंगदाओ सीविन ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि, श्रीलंका की मीडिया चीन की कारोबारी कंपनियों और चीन की सरकार की छवि बदनाम करने की कोशिश कर रही है और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल कर रही है। आपको बता दें कि, श्रीलंका की मीडिया में चीन के खिलाफ काफी कुछ बोला और लिखा जाता है और श्रीलंका की एक बड़ी आबादी भी चीन के खिलाफ अपने विचार रखती है। जिसको लेकन चीन ने श्रीलंका पर अपनी छवि को बदनाम करने का आरोप लगाते हुए 80 लाख डॉलर मुआवजे की मांग कर दी है। वहीं, चीन की कंपनी की तरफ से कहा गया है कि, ''श्रीलंका की तरफ से जैविक खाद का परीक्षण करने के लिए अवैज्ञानिक पद्धति का इस्तेमाल किया गया है और श्रीलंका की नेशनल प्लांट क्वारंटाइन सर्विस (एनपीक्यू) का निष्कर्ष स्पष्ट रूप से अंतरराष्ट्रीय पशु और पौधों के संगरोध सम्मेलन का अनुपालन नहीं करता है।"

चीन का कब तक विरोध कर पाएगा श्रीलंका?

चीन का कब तक विरोध कर पाएगा श्रीलंका?

एक तरह से देखा जाए तो चीन और श्रीलंका पूरी तरह से एक दूसरे के खिलाफ खड़े हो गये हैं और चीन लगातार श्रीलंका को झुकाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन, विश्लेषकों का कगहना है कि, श्रीलंका पहले से ही चीन के कर्ज के जाल में बुरी तरह फंसा हुआ है, लिहाजा वो आखिर कब तक चीन का सामना कर पाएगा। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, श्रीलंकाई अधिकारियों ने साफ कर दिया है कि, चीन अपनी ताकत का कितना भी क्यों ना इस्तेमाल कर ले, लेकिन "मौजूदा नियमों का उल्लंघन करने वाले किसी भी जैविक उर्वरक को देश में उतारने की इजाजत नहीं दी जाएगी"। यानि, श्रीलंका साफ तौर पर घोषणा कर रहा है कि, वो चीन के खिलाफ खड़ा होने की कूबत रखता है, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि, आखिर कब तक?

भारत के लिए बड़ा मौका

भारत के लिए बड़ा मौका

श्रीलंका ने चीन से उर्वरक खरीदने पर रोक लगा दी तो फिर सवाल ये पैदा हो गया कि, आखिर श्रीलंका में खेती अब कैसे की जाएगी, जिसके बाद खाद खरीदने के लिए श्रीलंका की सरकार ने भारत से संपर्क साधा और फिर भारत ने श्रीलंका को मदद करने का आश्वासन दिया है। इसके साथ ही पिछले हफ्ते भारत सरकार की तरफ से 100 टन नैनो उर्वरक की खेप श्रीलंका को पहुंचाई गई है। इसके साथ ही भारत की तरफ से उर्वरक की कई और बड़ी खेप श्रीलंका पहुंचाई जाएगी। वहीं, विश्लेषको का कहना है कि, कहीं ना कहीं श्रीलंका को देर से ही सही, मगर चीन की चाल के बारे में पता चलने लगा है, लिहाजा अब भारत सरकार को श्रीलंका के साथ अपने रिश्ते को ना सिर्फ नये सिरे से मजबूत करनी चाहिए, बल्कि हिंद महासागर में चीन के खिलाफ 'लक्ष्मण रेखा' भी खींचनी चाहिए।

चीन का विकल्प बने भारत

चीन का विकल्प बने भारत

विश्लेषकों का कहना है कि, अगर भारत को श्रीलंका का पूरा साथ मिल जाता है, तो फिर चीन की इससे बड़ी कोई और दूसरी हार नहीं हो सकती है, लिहाजा अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि, आने वाले वक्त में जब चीन श्रीलंका को आर्थिक आधार पर कुचलने की कोशिश करेगा, तो भारत को पड़ोसी देश की मदद करने के लिए तैयार रहना होगा। विश्लेषकों का कहना है कि, भारत सरकार को श्रीलंका की सरकार का तो विश्वास जीतना ही चाहिए, उससे ज्यादा ध्यान श्रीलंका की जनता के दिल में जगह बनाने पर देनी चाहिए। क्योंकि, पिछले दिनों भारत ने कोलंबो बंदरगाह के एक टर्मिनल पर चीन को हराते हुए श्रीलंकन सरकार से करार की थी और भारत को आगे भी उसी दिशा में बढ़नी चाहिए।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+