तालिबान के लिए बड़ी खुशखबरी, चीन, रूस और पाकिस्तान कर रहे हैं मान्यता देने की तैयारी

चीन, पाकिस्तान, रूस समेत सभी पड़ोसी देश तालिबान राज को मान्यता दे सकते हैं। तुर्की ने भी पहली बार तालिबान के पक्ष में पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाया है। हालांकि, ईरान ने अपने सभी राजनयिकों को वापस बुला लिया है।

काबुल, अगस्त 16: काबुल पर तालिबान का कब्जा हो चुका है और इसके साथ ही चीन, रूस और पाकिस्तान ने सबसे बड़ा यू-टर्न ले लिया है। चीन, रूस और पाकिस्तान से जो खबरें मिल रही हैं, उससे यही लगता है कि मानो ये तीनों देश तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जा होने का ही इंतजार कर रहे थे। चीन, रूस, पाकिस्तान और तुर्की समेत सभी पड़ोसी अफगानिस्तान में तालिबान शासन को औपचारिक रूप से मान्यता देने के लिए तैयार हो गये हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, जल्द ही ये सभी देश आतंकी संगठन तालिबान को मान्यता देने का ऐलान कर सकते हैं।

तालिबान को मान्यता देने की तैयारी

तालिबान को मान्यता देने की तैयारी

रविवार को इस्लामिक आतंकवादी समूह तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया है और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी अपनी जान बचाकर ताजिकिस्तान भाग गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत समेत तमाम पश्चमी देश, यूरोपियन संघ भी तालिबान को मान्यता देने के खिलाफ है। भारत ने साफ कर दिया है कि काबुल में बंदूक के दम पर बनाई गई सत्ता को वो मान्यता नहीं देगा। कतर में हुई एक बैठक में भारत के साथ साथ पाकिस्तान, चीन, रूस ने भी वादा किया था कि वो तालिबान को मान्यता नहीं देंगे। लेकिन इन तीनों देश ने यू-टर्न ले लिया है। वहीं, ब्रिटिश प्रधान मंत्री बोरिस जॉनसन ने चेतावनी दी है, कि अफगानिस्तान को फिर से 'आतंक के लिए प्रजनन स्थल' बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। लेकिन बीजिंग और इस्लामाबाद संभावित नई सरकार के साथ घनिष्ठ संबंध बनाने के लिए तालिबान को मान्यता देने के लिए तैयार हो गये हैं।

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    तालिबान पर चीन के मन में क्या है?

    तालिबान पर चीन के मन में क्या है?

    चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी की मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने चीन के लोगों को कहा है कि तालिबान एक असलियत और उसे स्वीकार करने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए। ग्लोबल टाइम्स ने कहा है कि ''चीन की कम्यूनिस्टा पार्टी को इस्लामिक चरमपंथी संगठन को मान्यता देने में हिचकिचाना नहीं चाहिए''। चीन की सरकारी मीडिया ने पिछले दिनों एक के बाद एक कई आर्टिकिल अफगानिस्तान को लेकर प्रकाशित की है, जिसमें कहा गया है कि तालिबान को मान्यता नहीं देना चीन की विदेश नीति के लिए अच्छा नहीं होगा। इसके साथ ही ग्लोबल टाइम्स में चीन के विदेश मंत्री वांग यी को तालिबान के साथ कंधा से कंधा मिलाकर खड़ा दिखाया गया था।

    तालिबान पर रूस के मन में क्या है?

    तालिबान पर रूस के मन में क्या है?

    चीन ने साफ कर दिया है कि उसे तालिबान को मान्यता देने में कोई दिक्कत नहीं है, तो अभी तक अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति पर रूसी राष्ट्रपति भवन क्रेमलिन ने चुप्पी साध रखी है। एक तरफ जहां भारत, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्रिटेन और ईरान समेत कई देश अपने राजनयिको को काबुल से निकालने में लगे हैं, वहीं रूस ने साफ कर दिया है कि वो काबुल का दूतावास बंद नहीं करेगा और रूसी अधिकारी काबुल में ही रहेंगे। पाकिस्तान ने भी ऐसा ही किया है। वहीं, रूसी राज्य मीडिया ने कहा है कि, तालिबान का निर्माण तब हुआ था, जब अफगानिस्तान से रूस की सेना वापस आ गई थी और तालिबान ने वादा किया है कि वो राजनयिकों को नुकसान नहीं पहुंचाएगा और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। समाचार एजेंसी एपी ने तालिबान के राजनीतिक कार्यालय के प्रवक्ता सुहैल शाहीन के हवाले से रूसी समाचार एजेंसी तास को बताया कि, 'तालिबान के 'रूस के साथ अच्छे संबंध' हैं और 'रूसी और अन्य दूतावासों के कामकाज के लिए सुरक्षित स्थिति सुनिश्चित करना तालिबान की सामान्य नीति' है।

    तालिबानी नेता गये थे चीन

    तालिबानी नेता गये थे चीन

    पिछले महीने, तालिबान के प्रतिनिधियों ने चीन का दौरा किया था। जहां इस आतंकवादी संगठन के साथ चीनी अधिकारियों ने तियानजिन में फोटो खिंचवाई थी और ग्लोबल टाइम्स ने कहा था कि ''ये चीन के हक में है कि इस्लामिक सुन्नी आतंकी संगठन को मान्यता दी जाए, चाहे वो जैसे भी अफगानिस्तान की सत्ता में आए''। चीन की राजनीति में अहम स्थान रखने वाले और चीन की विदेश नीति पर नजर रखने वाले चीन के राजनीतिक विशेषज्ञ प्लेइंग काउ ने गुरुवार को लिखा था कि ''अगर तालिबान पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा नहीं भी कर पाता है, तब भी वो अफगानिस्तान में एक महत्वपूर्ण ताकत होगा''। प्लेइंग काउ के ट्वीट से साफ हो गया था कि तालिबान को स्वीकार करने में चीन को कोई दिक्कत नहीं है।

    तालिबान को क्यों मान्यता देगा चीन?

    तालिबान को क्यों मान्यता देगा चीन?

    तालिबान को मान्यता देकर चीन उसे खुश करना चाहता है, ताकि शिनजियांग प्रांत में मौजूद आतंकी संगठनों को चीन खामोश रख सके। चीन-अफगानिस्तान सीमा पर कई ऐसे आतंकी संगठन हैं, जो तालिबान समर्थक होने के साथ साथ वो चीन के शिनजियांग प्रांत को मुस्लिमों के लिए अलग देश बनाना चाहते हैं और उन्हें रोकने के लिए ही चीन में शिनजियांग में 'यातना शिविर' बनाया हुआ है, जहां करीब 10 लाख मुस्लिमों को बंद करके रखा गया है। चीन सीमा पर मौजूद मुस्लिम आतंकी संगठनों में इस बात को लेकर काफी गुस्सा है और वो शिनजियांग प्रांत की आजादी के लिए लड़ रहे हैं। लिहाजा, चीन को डर है कि अगर उसने तालिबान को मान्यता नहीं दी, तो शिनजियांग में मजहबी आतंकवाद काफी बढ़ सकता है। लिहाजा, माना जा रहा है कि चीन और तालिबान के बीच समझौता हो चुका है। इस समझौते के तहत चीन तालिबान तो मान्यता देगा तो तालिबान, शिनजियांग में मुस्लिमों के खिलाफ अत्याचार पर खामोश रहेगा।

    पीछे-पीछे पाकिस्तान

    पीछे-पीछे पाकिस्तान

    तालिबान को काबुल तक पहुंचाने में सबसे बड़ा योगदान पाकिस्तान का ही है और पाकिस्तान की सरकार के साथ साथ पाकिस्तान की जनता पूरी ताकत के साथ तालिबान के साथ खड़ी है। लेकिन, पाकिस्तान अकेले तालिबान को मान्यता देने से डर रहा है, क्योंकि उसे पाबंदियों का डर है। लिहाजा पाकिस्तान को लेकर कहा जा रहा है कि जैसे ही चीन और रूस तालिबान को मान्यता दे देंगे, ठीक वैसे ही पाकिस्तान भी तालिबान को मान्यता दे देगा। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने तो तालिबान द्वारा किए गये हमलों की निंदा करने से भी इनकार कर दिया था। लेकिन, पाकिस्तान का तालिबान को समर्थन देना, भारत के साथ पाकिस्तान के संबंधों को और खराब कर सकता है। लेकिन, पाकिस्तान तालिबान को कश्मीर के लिए एक मौका मानता है।

    तालिबान का साथ देगा तुर्की ?

    तालिबान का साथ देगा तुर्की ?

    तालिबान और तुर्की के संबंध अभी तक अच्छे नहीं रहे हैं। तुर्की के राष्ट्रपति लगातार तालिबान की आलोचना करते रहे हैं और तालिबान तुर्की को काबुल एयरपोर्ट से अपनी सेना जल्द हटाने के लिए धमकाता रहा है। लेकिन, अब तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोगन ने कहा है कि, तालिबान के देशव्यापी हमले के बीच शरणार्थी संकट को रोकने के लिए उनका देश पाकिस्तान के साथ अफगानिस्तान में स्थिरता के लिए काम करेगा। यानि, तुर्की भी तालिबान को मान्यता देने के पक्ष में दिख रहा है। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता लाने के लिए पाकिस्तान के पास एक 'महत्वपूर्ण कार्य' है, और अफगानिस्तान में शांति स्थापना के लिए तुर्की-पाकिस्तानी सहयोग की आवश्यकता होगी। वहीं, ईरान ने अपने सभी राजनयिकों को अफगानिस्तान से बाहर निकाल लिया है। ईरानी विदेश मंत्रालय ने रविवार को कहा है कि काबुल दूतावास में उसके एक भी कर्मचारी नहीं है।

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