रूस-चीन में कभी नहीं देखी गई है ऐसी दोस्ती, क्या शांतिदूत बनकर भारत से बड़ा मौका छीन लेंगे शी जिनपिंग?
चीन और रूस के बीच 1969 में युद्ध तक हो चुकी है, लेकिन जरूरतों ने दोनों देशों को दोस्ती को काफी मजबूत कर दिया है। दोनों देशों का कॉमन दुश्मन अमेरिका ही है।

Xi Jinping Russia Visit: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, कोरोना महामारी की शुरूआत के बाद चौथी बार अपने हाई-प्रोफाइल दौरे पर देश से बाहर निकले हैं। शी जिनपिंग, रूस की यात्रा करने से पहले उज्बेकिस्तान में SCO शिखर सम्मेलन, इंडोनेशिया के बाली में जी20 शिखर सम्मेलन और सऊदी अरब का दौरा कर चुके हैं, लेकिन शी जिनपिंग का रूस दौरा, इन सभी यात्राओं में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासकर, यूक्रेन युद्ध के नजरिए से, क्योंकि शी जिनपिंग ने रूस के सामने 12 सूत्रीय शांति प्रस्ताव रखा है। लेकिन, क्या शी जिनपिंग के इस दौरे से भारत के हाथ से बड़ा मौका चला जाएगा, क्योंकि अमेरिका समेत पश्चिमी देशों का मानना है, कि भारत ही वो शक्ति है, जो रूस और यूक्रेन के बीच मध्यस्थता करवा सकता है। आईये समझने की कोशिश करते हैं, कि आखिर चीन और रूस के बीच ऐसी दोस्ती क्यों पहले कभी नहीं देखी गई है?

मध्यस्थता करवाने की कितनी कोशिश करेगा चीन?
शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन के बीच होने वाली बैठक पर पश्चिमी देशों के अधिकारियों की सबसे ज्यादा नजर है, कि संघर्ष खत्म करवाने की कोशिश में बतौर मध्यस्थ के रूप में काम करने के लिए, चीन कितनी दूर जाने को तैयार हो सकता है। चीनी अधिकारियों ने बैठक को आंशिक रूप से रूस और यूक्रेन के बीच रचनात्मक वार्ता को बढ़ावा देने के लिए एक मिशन के रूप में तैयार किया है, भले ही अमेरिकी अधिकारियों को 'वैश्विक शांतिदूत' बनने के शी जिनपिंग के हालिया प्रयासों पर गंभीर शक है। क्योंकि, पश्चिमी देशों को चीन से ज्यादा भारत पर भरोसा रहा है, कि भारत अपनी कोशिशों के जरिए रूस को युद्ध खत्म करने के लिए मना सकता है। हालांकि, पिछले महीनों भारत के विदेश मंत्री ने एक भारतीय टीवी चैनल से बात करते हुए मध्यस्थता के सवाल पर कहा था, कि ये वक्त की बात है, कि भारत क्या कोशिश कर सकता है। लेकिन, पिछले साल समरकंद में हुए एससीओ शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी ने रूसी राष्ट्रपति को यह कहकर अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियां बटोरी थीं, कि 'आज का युग युद्ध का युग नहीं है।'

क्या चीन और रूस सहयोगी हैं?
चीन और रूस औपचारिक सहयोगी नहीं हैं, जिसका मतलब ये हुआ, कि उन्होंने सैन्य समर्थन से एक-दूसरे की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध नहीं किया है। लेकिन, दोनों देश करीबी रणनीतिक साझेदार हैं, एक रिश्ता जो यूक्रेन में युद्ध के दौरान काफी गहरा हुआ है, क्योंकि रूस कई अन्य देशों से तेजी से अलग-थलग हो गया। चीनी अधिकारियों ने कहा है कि वर्तमान संबंध "ऐतिहासिक ऊंचाई" पर हैं। इन दोनों देशों की साझेदारी, अमेरिका की शक्ति और प्रभाव को कमजोर करने की कोशिश के साझा लक्ष्य से प्रेरित है। हालांकि, चीन और रूस के बीच संबंध हमेशा इतने अच्छे नहीं रहे हैं और 1960 के दशक में दोनों पक्ष एक दूसरे के भयंकर विरोधी थे और 1969 में तो दोनों देशों के बीच लड़ाई भी हो चुकी है, जिससे दोनों देशों के बीच परमाणु युद्ध की आशंका भी बढ़ गई थी। हालांकि, अभी भी दोनों देश मध्य एशिया में अपना प्रभाव जमाने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, एक ऐसा क्षेत्र जिसे क्रेमलिन ने लंबे समय से अपने मैदान के रूप में देखा है, लेकिन चीन की जियो- पॉलिटिक्स और आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के लिए ये क्षेत्र काफी महत्वपूर्ण होता जा रहा है। चीन कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे पूर्व सोवियत गणराज्यों में तेजी से रेलमार्गों, राजमार्गों और ऊर्जा पाइपलाइनों का निर्माण कर रहा है, जो अभी भी एक महत्वपूर्ण सुरक्षा भागीदार के रूप में रूस पर भरोसा करते हैं।

शी जिनपिंग और पुतिन कितने करीबी हैं?
फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने से ठीक पहले, शी जिनपिंग और पुतिन ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी, कि उनके देशों के संबंधों की "कोई सीमा नहीं" है। शी जिनपिंग, कई बार पुतिन को अपना सबसे अच्छा दोस्त बताते रहे हैं। 2018 में रूस में एक इकोनॉमिक फोरम के दौरान दोनों ने साथ में रूसी पैनकेक तला था और साथ में वोडका पी थी। वहीं, साल 2019 में शी जिनपिंग के 66वें जन्मदिन पर पुतिन ने उन्हें केक और आइसक्रीम का बड़ा डिब्बा भेंट किया था। वहीं, रविवार को एक चीनी अखबार में प्रकाशित एक लेख में, पुतिन ने कहा था, कि उनके बीच काफी 'गर्म रिश्ता' है और हाल के सालों में दोनों ने करीब 40 बार मिल चुके हैं और सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान, जब फ्री टाइम होता है, तो दोनों नेता आपस में काफी बातें करते हैं।

रूस और चीन के बीच आर्थिक संबंध क्या है?
साल 2014 में यूक्रेन पर रूस के पहले आक्रमण के बाद से चीन और रूस के बीच आर्थिक संबंध काफी मजबूत हुए हैं, जब रूस ने क्रीमिया पर कब्जा कर लिया था। उस समय, चीन ने रूस को ओबामा प्रशासन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों से बचने में मदद की थी, जो रूस की वैश्विक बाजारों तक पहुंच को कम करने वाले थे। वहीं, पिछले साल यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद रूस के खिलाफ कठोर प्रतिबंधों को देखते हुए, चीन ने कई ऐसे उत्पादों की आपूर्ति करने में मदद की है, जो रूस पहले पश्चिमी देशों से खरीदता था, जिसमें कंप्यूटर चिप्स, स्मार्टफोन और सैन्य उपकरणों के लिए आवश्यक कच्चा माल भी शामिल है। रूस और चीन के बीच कुल व्यापार पिछले साल काफी ज्यादा बढ़ा है।

चीन से क्या चाहते हैं व्लादिमीर पुतिन?
पुतिन को अपने देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में मदद के लिए चीन की जरूरत है, जो पश्चिमी प्रतिबंधों से पस्त हो गया है। रूसी नेता के लिए, चीन तेजी से निवेश और व्यापार के लिए जीवन रेखा बन गया है। पश्चिमी देशों ने पिछले साल रूसी कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस पर प्रतिबंध लगा दिए थे, और ऐसी स्थिति में चीन ने रूस से अधिक गैस और तेल खरीदकर, रूस की भारी मदद की है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, यूक्रेन युद्ध की शुरुआत में, रूस ने चीन से सैन्य उपकरण और आर्थिक सहायता मांगी थी। अमेरिकी अधिकारियों ने हाल ही में कहा है, कि चीन यूक्रेन में इस्तेमाल के लिए रूस को हथियार देने पर विचार कर रहा है, हालांकि इस दावे का चीन ने खंडन किया है। लेकिन, चीन ने यूक्रेन पर रूस के आक्रमण की निंदा करने से अभी तक परहेज किया है, भले ही चीन की विदेश नीति संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सिद्धांतों पर आधारित है। हालांकि चीन ने खुद को यूक्रेन युद्ध में एक तटस्थ पक्ष के रूप में सामने रखा है, लेकिन उसने संघर्ष शुरू करने के लिए अमेरिका और नाटो को दोषी ठहराते हुए रूस के बयानों की समर्थन की है। लेकिन, रूस के पीछे अपना पूरा समर्थन देने में भी चीन हिचकिचाता रहा है। युद्ध से उपजी उथल-पुथल और अस्थिरता चीन के विकास को खतरे में डाल सकती है और दुनिया भर में अपने आर्थिक संबंधों को मजबूत करने के अपने प्रयासों को जटिल बना सकती है। लिहाजा, चीन भी इस युद्ध को खत्म करवाना चाहता है और ऐसा करके वो अपनी वैश्विक शक्ति को साबित कर सकता है।

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रूस से क्या चाहते हैं शी जिनपिंग?
शी जिनपिंग चाहते हैं, कि पुतिन अमेरिका और पश्चिमी प्रभुत्व का सामना करने में समान विचारधारा वाले सहयोगी के रूप में उनके साथ शामिल हों। मॉस्को की यात्रा से पहले सोमवार को एक रूसी समाचार पत्र में प्रकाशित एक लेख में, शी जिनपिंग ने कहा था, कि चीन और रूस को अपनी सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए सहयोग करने की आवश्यकता है, जिसमें "आधिपत्य, प्रभुत्व और धमकाने के हानिकारक कार्य" शामिल हैं। शी जिनपिंह ने हमेशा से चीन को एक पीड़ित देश के तौर पर दिखाने की कोशिश की है, जिसके खिलाफ अमेरिका साजिश करता है और घेरने की कोशिश करता है। पुतिन की भी भाषा कमोबेश यही रही है। लिहाजा, शी जिनपिंग ने चीनी उद्योगों से पश्चिमी प्रौद्योगिकी पर अपनी निर्भरता कम करने को कहा है और साफ कहा है, कि उसे अपने विकास के लिए पश्चिमी राजनीतिक मूल्यों को अपनाने की आवश्यकता नहीं है। चीन अपनी सेना के आधुनिकीकरण के लिए रूस से अधिक उन्नत हथियार खरीद रहा है और दोनों देशों ने अपने संयुक्त सैन्य अभ्यास बढ़ा दिए हैं। लिहाजा, भारत के लिए ये चिंता की बात है। और अगर शी जिनपिंग आने वाले वक्त में मध्यस्थ बन जाते हैं, तो निश्चित तौर पर ये चीन और रूस की 'अटूट' दोस्ती की शुरूआत मानी जाएगी, जो भारत के लिए शुभ नहीं होगा।












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