कर्ज बांटने की आदत ने चीन को किया पस्त, IMF की मीटिंग में श्रीलंका का छोड़ा साथ, भारत बना आखिरी हमदर्द
चीन ने अमेरिकी वर्चस्व को कुंद करने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया और एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों में अरबों डॉलर के कर्ज बांटे। लेकिन, उन छोटे देशों के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स सफेद हाथी की तरह साबित हुए

Sri Lanka IMF China: दुनिया में अपना वर्चस्प स्थापित करने के लिए चीन ने दोनों हाथों से कर्ज बांटे हैं, लेकिन चीन अपनी इसी आदत की वजह से फंस गया है।
चीन ने दुनिया में इतने कर्ज बांट दिए हैं, कि अब वो नये कर्ज बांटने के नाम पर परेशान हो रहा है और इसी वजह से आईएमएफ की औपचारिक बैठक के दौरान चीन ने श्रीलंका को बीच मंझधार में छोड़ दिया।
दरअसल, श्रीलंका और प्रमुख प्रमुख लेनदारों के बीच कर्ज के रीस्ट्रक्चर को लेकर होने वाली बैठक के दौरान चीनी अधिकारी नहीं पहुंचे। ये बैठक आईएमएफ दफ्तर में हो रहा था, जिसमें भारत और जापान के प्रतिनिधि मौजूद थे।
चीन के नही पहुचने के बाद भारत और जापान के साथ श्रीलंकन अधिकारियों ने बैठक की, जिसमें पेरिस क्लब ऑफ सोवरेन क्रेडिटर्स के अधिकारी भी मौजूद थे। इस बैठक के दौरान भारत और जापान की तरफ से फाइनेंस चीफ्स मौजूद थे, लेकिन चीनी अधिकारी नहीं पहुंचे।
इस महत्वपूर्ण बैठक में नहीं पहुंचना, विकासशील दुनिया में ऋण संकट के प्रति बीजिंग के दृष्टिकोण की बढ़ती निराशा को दर्शाता है। माना जा रहा है, कि चीन ने जितने कर्ज बांटे हैं, वो अब वापस नहीं हो रहे हैं, लिहाजा इन स्थितियों ने चीन को फ्रस्टेट कर दिया है।
इस बैठक के दौरान श्रीलंका को दिए गये कर्ज के भुगतान की तारीख बढ़ाने पर बात होनी थी, क्योंकि श्रीलंका पिछले दो सालों से गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। लेकिन, चीनी अधिकारियों के नहीं पहुंचने की वजह से ये पेंच फंस गया है, कि चीन श्रीलंका को दिए गये कर्ज में लौटाने की समय सीमा में छूट देगा या नहीं।
बैठक से गायब रहे चीन के अधिकारी
वहीं, इस ब्रीफिंग में अन्य अधिकारियों ने भी चीन का नाम लिए बिना, सभी लेनदारों को भाग लेने के लिए कहा। जापान के वित्त अधिकारी ओकामुरा ने कहा, कि उनका लक्ष्य श्रीलंका के आईएमएफ कार्यक्रम की पहली समीक्षा के द्वारा ऋण पुनर्कार्य को पूरा करना है। यानि, जापान ने कहा है, कि आईएमएफ कार्यक्रम की पहली समीक्षा तक जापान ने श्रीलंका के कर्ज को रीस्ट्रक्चर करने का लक्ष्य रखा है और ये सितंबर महीने के आसपास होने वाली है।
आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक ने कम इनकम वाले देशों को कर्ज में राहत प्रदान करने के लिए एक गोलमेज बैठक का आयोजन किया है, जिसमें पहले चीन अपनी कुछ शर्तों में नरमी दिखाने के लिए सहमत हो गया था और उसके बाद ही इस बैठक का आयोजन किया गया।
वहीं, माना जा रहा है, कि ये चर्चाएं आने वाले महीनों में भी जारी रह सकती हैं, क्योंकि अभी कई मुद्दे अनसुलझे हुए हैं।
आपको बता दें, कि इस साल श्रीलंका आईएमएफ के प्रोग्राम में जा चुका है और देश को आर्थिक संकट से बाहर निकालने के लिए श्रीलंका की सरकार ने कई सख्त कदम उठाए हैं।
श्रीलंका पर चीन का भारी भरकम कर्ज
वहीं, आपको बता दें कि श्रीलंका ने चीन से भारी भरकम कर्ज ले रखा है। श्रीलंका के कुल कर्ज का करीब 52 प्रतिशत हिस्सा चीन का है। लिहाजा, चीन अकसर श्रीलंका को ब्लैकमेल करता रहता है।
हालांकि, चीन आईएमएफ प्रोग्राम में जाने के लिए श्रीलंका का समर्थन कर चुका है। चीन से पहले भारत और जापान ने श्रीलंका का समर्थन किया था। श्रीलंका को आईएमएफ से लोन दिलाने में भारत ने काफी अहम भूमिका निभाई है। वहीं, पिछले साल फरवरी के बाद से भारत ने श्रीलंका को 4 अरब डॉलर का क्रेडिट लाइन भी दिया है।
वहीं, श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने पिछले महीने कहा था, कि उन्हें पूरा विश्वास है, कि आईएमएफ से लोन मिलने के बाद वो अपने देश को गंभीर आर्थिक संकट से बाहर निकाल पाएंगे।
जबकि, आईएमएफ के उप प्रबंध निदेशक केंजी ओकामुरा ने कहा, कि श्रीलंका गहरे कर्ज संकट में है और श्रीलंका को अपने संकट से जल्द से जल्द उभरने के लिए शीघ्र कर्ज समाधान की जरूरत है। उन्होंने कहा, कि "हमें उम्मीद है, कि सभी आधिकारिक द्विपक्षीय लेनदार भाग बैठक में भाग लेंगे, ताकि वार्ता तेजी से आगे बढ़ सके।"\

कर्ज बांटकर फंस चुका है ड्रैगन
वहीं, पूरी दुनिया को इन्फ्रास्ट्रक्चर जाल में बांधकर विश्व पर वर्चस्व जमाने निकला चीन अब बुरी तरह से खुद उलझ गया है और पिछले महीने प्रकाशित एक स्टडी रिपोर्ट में कहा गया है, कि चीन ने 2008 से 2021 के बीच 22 विकासशील देशों को आर्थिक संकट से उबारने के लिए 240 अरब डॉलर खर्च किए हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है, कि 2021 के बाद से ये राशि और भी ज्यादा बढ़ गई है, क्योंकि जिन देशों को चीन ने कर्ज बांटे हैं, उनकी आर्थिक स्थिति इतनी ज्यादा खराब हो चुकी है, कि वो 'बेल्ट एंड रोड' का कर्ज चुकाने में तो सक्षम नहीं ही हैं, ये देश अपना खर्च संभालने में भी सक्षम नहीं हैं।
लिहाजा, इन देशों को डूबने से बचाने के लिए अब चीन को अरबों डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं, जिसका असर चीन की अर्थव्यवस्था पर हो रहा है।
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रिपोर्ट में कहा गया है, कि 'बेल्ट एंड रोड' इनिशिएटिव के जरिए चीन की मंशा छोटे देशों पर आर्थिक वर्चस्व कायम करने की थी, जिसमें चीन कामयाब भी रहा है, लेकिन अब स्थिति ये है, कि ये देश अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए भी चीन पर निर्भर हो रहे हैं। अगर चीन ने इन्हें पैसे नहीं दिए, तो ये डूब जाएंगे और चीन का सारा कर्ज अटक जाएगा, लिहाजा अब चीन किसी भी देश को और कर्ज नहीं देना चाहता है और इसीलिए चीनी अधिकारी आईएमएफ की इस बैठक में नहीं शामिल हुए।
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