China Nepal Deal: चीन ने नेपाल को लगाया अरबों का चूना! हवाई जहाज के नाम पर बेचा कबाड़, बालेन की हुई किरकिरी!
China Nepal Deal: नेपाल ने कभी चीन को अपना सबसे करीबी रणनीतिक साझेदार मानकर बड़े भरोसे के साथ चीनी विमान खरीदे थे। लेकिन चीन तो चीन है, उसने चूना लगाने में नेपाल को भी नहीं छोड़ा। दरअसल नेपाल से खबर आई है कि चीन नेपाल को एयरक्राफ्ट डील के नाम पर अरबों का चूना लगा दिया है। हालत यह है कि जिन विमानों से नेपाल के पहाड़ी इलाकों में हवाई सेवाएं बेहतर होने की उम्मीद थी, वे सालों से एयरपोर्ट पर धूल खा रहे हैं।
नेपाल सरकार पर भड़का सुप्रीम कोर्ट
अब इस पूरे मामले पर नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है और सरकार से पूछा है कि आखिर इतने बड़े नुकसान की जांच अब तक क्यों नहीं हुई। न्यायाधीश बाल कृष्ण ढकाल की बेंच ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार और कई मंत्रालयों को 'कारण बताओ' नोटिस जारी किया है। अदालत ने इस मामले को 'कानूनी प्राथमिकता' की कैटेगरी में रखा है, यानी अब इस पर तेजी से सुनवाई होगी।

चीन ने दिखाए सपने, नेपाल को मिला कबाड़
यह मामला तब शुरू हुआ जब चार्टर्ड अकाउंटेंट और जनहित कार्यकर्ता भेष राज लुइंटेल ने 25 जून को सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की। उनका आरोप है कि चीन से विमान खरीदने के नाम पर नेपाल के टैक्सपेयर्स के अरबों रुपये बर्बाद कर दिए गए और आज तक किसी की जवाबदेही तय नहीं हुई।
उड़ने लायक नहीं निकले विमान
नेपाल एयरलाइंस ने 2014 से 2018 के बीच चीन से कुल 6 विमान खरीदे थे। इनमें चार Y12E विमान, जिनमें 17-17 सीटें थीं, और दो MA60 टर्बोप्रॉप विमान, जिनमें 56-56 सीटें थीं। चीन ने इन्हें दान और रियायती कर्ज के नाम पर दिया था। दावा किया गया था कि ये विमान नेपाल के दूर-दराज और पहाड़ी इलाकों में हवाई संपर्क बढ़ाएंगे। लेकिन हकीकत बिल्कुल उलटी निकली। जिन विमानों को चीन ने आधुनिक और भरोसेमंद बताया था, वे उड़ान भरने से ज्यादा समय काठमांडू के त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर खड़े रहे। लगातार तकनीकी समस्याएं, ज्यादा ईंधन खर्च, महंगे स्पेयर पार्ट्स और रखरखाव की दिक्कतों के चलते नेपाल एयरलाइंस ने जुलाई 2020 में सभी विमानों को हमेशा के लिए ग्राउंड कर दिया।
सवालों के घेरे में सरकार, लेकिन किसी पर कार्रवाई नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने अब प्रधानमंत्री कार्यालय, वित्त मंत्रालय, संस्कृति, पर्यटन और नागरिक उड्डयन मंत्रालय और भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसी CIAA से जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता का कहना है कि खरीद से पहले किए गए तकनीकी और आर्थिक मूल्यांकन पूरी तरह गलत साबित हुए। जब दुनिया में बेहतर और भरोसेमंद विमान उपलब्ध थे, तब आखिर चीन के इन विवादित विमानों को ही क्यों चुना गया? सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि इतने बड़े नुकसान के बावजूद आज तक किसी अधिकारी पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
चीन का पैकेज बना नेपाल के लिए बोझ
इस सौदे की शुरुआत 2011 में हुई थी, जब नेपाल एयरलाइंस ने चीन से आठ विमान लेने का प्रस्ताव रखा। इसके बाद 2012 में चीन की सरकारी कंपनी AVIC International Holdings के साथ समझौता हुआ। चीन ने नेपाल को करीब 6.67 अरब नेपाली रुपये का पैकेज दिया। इसमें करीब 2.94 अरब रुपये अनुदान और 3.72 अरब रुपये रियायती कर्ज के रूप में थे। सुनने में यह सौदा काफी आकर्षक लग रहा था, लेकिन बाद में यही "सस्ता सौदा" नेपाल के लिए सबसे महंगी गलती साबित हुआ। विमान आने के बाद पायलटों की कमी, प्रशिक्षकों की कमी और स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता जैसी समस्याओं ने पूरे प्रोजेक्ट को ठप कर दिया।
अरबों में खरीदे, अब कौड़ी के भाव में भी नहीं बिक रहे
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिन विमानों पर नेपाल ने अरबों रुपये खर्च किए, उनकी कीमत अब कबाड़ से ज्यादा नहीं बची। 2023 में नेपाल एयरलाइंस ने अमेरिकी कंपनी Aviation Asset Management Inc. से इन विमानों का मूल्यांकन कराया। रिपोर्ट में बताया गया कि पूरे बेड़े की कुल कीमत अब सिर्फ 22 करोड़ नेपाली रुपये रह गई है। यानी जिस प्रोजेक्ट पर अरबों रुपये खर्च हुए, वह अब अपनी मूल कीमत का बेहद छोटा हिस्सा भी नहीं बचा पाया।
बेचना भी मुश्किल, रखना भी नुकसान
नेपाल एयरलाइंस चाहकर भी इन विमानों को नहीं बेच पा रही है। वजह है भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसी की संभावित जांच और कानूनी विवाद का डर। अगर सरकार इन्हें बहुत कम कीमत पर बेचती है तो नए सवाल उठ सकते हैं। इसलिए विमान एयरपोर्ट पर खड़े-खड़े ही सरकारी खजाने पर बोझ बन चुके हैं। इनके रखरखाव, सुरक्षा और पार्किंग पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं।
क्या चीन ने नेपाल को गलत सौदा बेचा?
इस पूरे मामले ने चीन के रक्षा और विमानन उत्पादों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। नेपाली एक्सपर्ट्स का कहना है कि चीन अक्सर विकासशील देशों को आकर्षक कर्ज और अनुदान का लालच देकर अपने उत्पाद बेचता है, लेकिन बाद में वही प्रोजेक्ट कई देशों के लिए आर्थिक बोझ बन जाते हैं। नेपाल के मामले में भी कई विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन ने दोस्ती के नाम पर ऐसा सौदा किया, जिसने नेपाल एयरलाइंस को फायदा पहुंचाने के बजाय भारी नुकसान दिया। हालांकि, यह भी सच है कि अंतिम खरीद का फैसला नेपाल की सरकार और संबंधित अधिकारियों ने ही लिया था। इसलिए जवाबदेही सिर्फ चीन पर नहीं, बल्कि नेपाल के फैसला लेने वाले लोगों पर भी बनती है।
अब सुप्रीम कोर्ट की नजर, क्या सामने आएगी पूरी सच्चाई?
अब सबकी नजर नेपाल के सुप्रीम कोर्ट पर है। अदालत यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि इस पूरे सौदे में आखिर गलती कहां हुई, किसकी जिम्मेदारी बनती है और क्या जनता के अरबों रुपये बर्बाद करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होगी। यह मामला सिर्फ छह बेकार विमानों का नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि बिना पर्याप्त जांच-पड़ताल के किए गए बड़े अंतरराष्ट्रीय सौदे किसी देश की अर्थव्यवस्था पर कितना भारी पड़ सकते हैं। अब देखना होगा कि नेपाल इस "चीनी सौदे" से कोई सबक सीखता है या नहीं।
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