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तीसरी बार ताजपोशी से पहले शी जिनपिंग का दुनिया को संदेश! हाइपरसोनिक परमाणु बमों की होगी तैनाती

YJ-12 मिसाइल बाहरी तौर पर जैसे दिखता है, उससे पता चलता है कि, चीन की CM-401 उच्च-ऊंचाई वाली एंटी-शिप मिसाइल जैसा दिखता है, जो रूस की इस्कंदर मोबाइल शॉर्ट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइल पर आधारित है।

China hypersonic nukes: चीन में आज से कम्युनिस्ट पार्टी कांग्रेस का 20वां अधिवेशन शुरू हो रहा है, जिसमें शी जिनपिंग के हाथों में तीसरी बार चीन की सत्ता सौंपी जाएगी। माना जा रहा है, कि शी जिनपिंग का तीसरा कार्यकाल दुनिया के लिए काफी तनावपूर्ण होने वाला है, क्योंकि शी जिनपिंग अपने तीसरे कार्यकाल में ताइवान का चीन की मुख्य भूमि से पुर्नमिलन के मिशन को पूरा करने की कोशिश करेंगे और इसके लिए उन्हें अपनी सैन्य शक्ति का इस्तेमाल करना होगा। इसके साथ ही भारत के साथ भी चीन का रिश्ता और भी गर्म होगा, क्योंकि तीसरी बार सत्ता मिलने के बाद अब शी जिनपिंग को अपनी पार्टी में चुनौती देने वाला भी कोई नहीं होगा। इस बीच खबर है कि, चीन अपने एयरक्राफ्ट कैरियर्स पर हाइपरसनिक परमाणु मिसाइलों की तैनाती कर सकता है और ये खबर पूरी दुनिया के लिए चिंताजनक है।

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    कैरियर्स पर हाइपरसोनिक मिसाइलों की तैनाती

    कैरियर्स पर हाइपरसोनिक मिसाइलों की तैनाती

    एशिया टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के एयरक्राफ्ट कैरियर्स पर जिन फाइटर जेट्स की तैनाती होती है, उन विमानों में अब हाइपरसोनिक परमाणु मिसाइलों की तैनाती की जाएगा। हालांकि, एयरक्राफ्ट कैरियर्स पर हाइपरसोनिक परमाणु मिसाइलों की तैनाती करना काफी मुश्किल माना जाता है, लेकिन चीन ने सीलेंट टेक्नोलॉजी डेवलप कर ली है, जिसने दुनिया की पेशानी पर चिंता की लकीरें खींच दी है और चीन के डिफेंस को अभेद्य कर दिया है। हाइपरसोनिक न्यूक्लियर मिसाइलों की तैनाती के लिए चीन ने नये सीलेंड टेक्नोलॉजी का विकास किया है, जो समुद्र में चीन की भंडारण क्षमता, हथियारों की मरम्मत और रखरखाव की रक्षा को और तेज करेगा। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने इस हफ्ते अपनी रिपोर्ट में बताया है कि, चीन के कैरियर-आधारित हाइपरसोनिक हथियार रूसी किंजल एयर-लॉन्च हाइपरसोनिक मिसाइल की तरह हैं, जिसका पहली बार यूक्रेन युद्ध में इस्तेमाल किया गया है। इस मिसाइल का इस्तेमाल हवा, सतह और सैटेलाइट लक्ष्यों के खिलाफ किया जा सकता है और 1,000 किलोमीटर की दूरी तक ये मिसाइल आवाजा की स्पीड से 10 गुना ज्यादा स्पीड के साथ हमला कर सकता है। इस महीने चीनी घरेलू समीक्षा पत्रिका एयरो वेपनरी में भी इसका उल्लेख किया गया है।

    चीनी नौसेना कितनी मजबूत होगी?

    चीनी नौसेना कितनी मजबूत होगी?

    हाइपरसोनिक मिसाइलों की तैनाती के बाद चीन के कैरियर फ्लीट की स्ट्राइक रेंज 2,500 किलोमीटर से ज्यादा बढ़ जाएगी और इसकी पहुंच ताइवान से गुआम तक की हो जाएगी, जो प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक लेकिन तेजी से कमजोर अमेरिकी चौकी पर एक अति-तेज चीनी मिसाइल हमले के खतरे को बढ़ाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब तक विमान वाहक पोतों पर हाइपरसोनिक हथियारों को तैनात नहीं किया गया है। चाइना एयरबोर्न मिसाइल एकेडमी के प्रमुख शोधकर्ता जिओ जून और उनकी टीम ने साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के लेख में बताया कि, हाइपरसोनिक हथियारों को पारंपरिक मिसाइलों की तुलना में समुद्र में मरम्मत करना काफी कठिन है। उन्होंने कहा कि, हाइपरसोनिक हथियारों का क्रिटिकल एरिया शिल्ड किया हुआ रहता है, जिसके लिए अत्यधिक एडवांस मैटेरियल्स का इस्तेमाल किया जाता है, जो हाइपरसोनिक मिसाइल को अत्यधिक ऊंचाई तक जाने और अत्यधिक तापमान में भी काम करने की इजाजत देता है, लिहाजा बीच समुद्र में इसे मरम्मत करना काफी मुश्किल होता है और इन्हें मरम्मत के लिए कंपनी ही लाना पड़ता है।

    एयरक्राफ्ट से काम करना काफी मुश्किल

    एयरक्राफ्ट से काम करना काफी मुश्किल

    विशेषज्ञों का कहना है कि, एयरक्राफ्ट कैरियर पर हाइपरसोनिक हथियारों का परिवहन, उसका भंडारन और उसका रखरखाव काफी संवेदनशील माना जाता है। इसके अलावा, चीनी रिसर्च टीम ने बताया कि, जब क्षतिग्रस्त हिस्सा समुद्र की नमी, नमक और मोल्ड के संपर्क में आता है, तो नमी अवशोषण, विस्तार, विरूपण, ब्लिस्टरिंग, डिबॉन्डिंग या छीलने से गर्मी प्रतिरोधी कोटिंग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। लिहाजा, एयरक्राफ्ट कैरियर पर हाइपरसोनिक मिसाइलों की तैनाती के लिए अत्यधित सावधानी बरती जाती है और इस हथियार को रखने के लिए ग्राउंड बेस्ट कमरे की जरूरत होती है और इसे संभालने के लिए अनुभवि क्रू मेंबर्स की जरूरत होती है, जिनके पास सोफिस्टिकेटेड उपकरणों का होना जरूरी है, जो इस बात को सुनिश्चित करे, कि हाइपरसोनिक मिसाइल में कोई समस्या नहीं आई है। ऐसे में अब रिसर्च टीम ने नई सीलिंग सामग्री विकसित की है, जिसमें क्षतिग्रस्त हिस्से को हटाने के लिए सिर्फ एक कार्यकर्ता की आवश्यकता होती है। लेकिन, अब सीलिंग जेल विकसित होने के बाद खराब हिस्से को हटाकर खाली स्थान में सीलिंग जेल भरकर उसे खुरचनी से तैयार कर एक चिकने सतह को तैयार किया जा सकता है।

    हथियारों की तैनाती होती है काफी मुश्किल

    हथियारों की तैनाती होती है काफी मुश्किल

    चाइना एयरबोर्न मिसाइल अकेडमी के रिसर्चर्स का कहना है कि, फिल्ड टेस्टिंग के दौरान एयरक्राफ्ट कैरियर्स को काफी नुकसान पहुंचता है और एयरक्राफ्ट कैरियर्स को अपने मिशन के दौरान काफी खराब परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है, लिहाजा हाइपरसोनिक मिसाइलों को एयरक्राफ्ट कैरियर पर रखना काफी ज्यादा मुश्किल होता है। लेकिन, अब नई विधि ने पिछले दिनों के मुकाबले दसवें हिस्से तक समय की बर्बादी कम कर दी है। उन्होंने कहा कि, उनकी नई तकनीक हाइपरसोनिक हथियारों के भंडारण के जीवनकाल में सुधार करती है, जिसे चीनी सेना को कम से कम एक दशक तक चलने की आवश्यकता होती है। शोधकर्ताओं का दावा है, कि उनकी नई तकनीक हाइपरसोनिक हथियारों की सुविधाजनक मरम्मत की भी इजाजत देता है, क्योंकि, जब टेक्निशियन हथियारों का निरीक्षण करते हैं, और कभी-कभी उन्हें इन्फ्रारेड सेंसर जैसे महत्वपूर्ण घटकों को बढ़ाने के लिए खोलते हैं।

    चीन ने तैयार किया सीलेंट तकनीक

    चीन ने तैयार किया सीलेंट तकनीक

    इसके अलावा, उन्होंने साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट में उल्लेख किया है, कि सीलेंट टेक्नोलॉजी के जरिए समुद्र में हाइपरसोनिक हथियारों की अत्यधिक बॉडी हीट और समुद्र की प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच उन्हें कम से कम 10 साल कर सही रखता है और उनके रखरखाव को आसान बनाता है। सीलेंट तकनीक संभावित रूप से चीन को अपने सतही लड़ाकों की एक विस्तृत श्रृंखला पर हाइपरसोनिक हथियारों को तैनात करने की अनुमति देगी। जिससे उन्हें अपने प्रतिद्वंद्वियों, अर्थात् संयुक्त राज्य अमेरिका पर सतही युद्ध अभियानों में एक संभावित बढ़त मिलेगी। इस साल अप्रैल महीने में एशिया टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया था कि, चीन ने अपने टाइप-055 क्रूजर में से एक से अपने YJ-12 हाइपरसोनिक हथियार का परीक्षण किया था, जिससे यह वर्ग दुनिया के सबसे भारी सशस्त्र युद्धपोतों में से एक बन गया है। परीक्षण के वीडियो फुटेज में हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन से लैस एक कोल्ड-लॉन्च एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइल दिखाया गया था, जिसकी छोटी नियंत्रण सतहों से पता चलता है, कि यह सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल नहीं है।

    अमेरिका से मुकाबला करने की तैयारी

    अमेरिका से मुकाबला करने की तैयारी

    YJ-12 मिसाइल बाहरी तौर पर जैसे दिखता है, उससे पता चलता है कि, चीन की CM-401 उच्च-ऊंचाई वाली एंटी-शिप मिसाइल जैसा दिखता है, जो रूस की इस्कंदर मोबाइल शॉर्ट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइल पर आधारित है। हालांकि, चीन ने जहाज-आधारित YJ-12 का सफलतापूर्वक परीक्षण किया है और इसका इस्तेमाल चीन हवाई-लॉन्च वर्जन के तौर पर भी कर सकता है। इसके विपरीत, अमेरिका साल 2025 तक अपने सतही लड़ाकू विमानों पर हाइपरसोनिक हथियारों को तैनात करने के लिए तैयार नहीं हो सकेगा। इस साल मार्च में एशिया टाइम्स की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि, अमेरिका का लक्ष्य अपने ज़ूमवाल्ट श्रेणी के विध्वंसक पर एडवांस गन सिस्टम (AGS) को हाइपरसोनिक मिसाइल ट्यूबों से बदलना प्राथमिकता है। यानि, चीन ने अब हाइपरसोनिक परमाणु मिसाइलों को अपनी स्ट्रैटजिक लड़ाई का हिस्सा बनाना शुरू कर दिया है और अब वह अपने कैरियर-आधारित स्ट्राइक एयरक्राफ्ट को परमाणु-युक्त हाइपरसोनिक हथियारों से लैस करने का विकल्प भी चुन सकता है, जो अमेरिका के लिए सिरदर्द के समान होगा।

    समुद्र में परमाणु बमों की तैनाती खतरनाक क्यों?

    समुद्र में परमाणु बमों की तैनाती खतरनाक क्यों?

    एयरक्राफ्ट कैरियर्स या फिर समुद्री जहाजों में परमाणु मिसाइलों की तैनाती को लेकर अमेरिका में लगातार आलोचना होती रही है। द हेरिटेज फाउंडेशन थिंक टैंक के लिए मई के एक लेख में अमेरिका के वरिष्ठ नीति विश्लेषक पैटी-जेन गेलर ने उल्लेख किया था, कि शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने सतह के जहाजों और पनडुब्बियों पर परमाणु-सशस्त्र समुद्री लॉन्च क्रूज मिसाइलों (एसएलसीएम-एन) को तैनात किया था। उस वक्त अमेरिका का मकसद यूरोप को संभावित सोवियत संघ के परमाणु हमले से बचाना था, लेकिन बाद में अमेरिका ने अपनी इस क्षमता को खत्म कर दिया। फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स (एफएएस) की रिपोर्ट में कहा गया है कि, साल 1970 और 1980 के दशक के दौरान अमेरिका ने समुद्र में अपने परमाणु शस्त्रागार का एक चौथाई हिस्सा तैनात किया, जो 1975 में चरम पर पहुंच गया था, जब अमेरिकी युद्धपोतों पर 6,191 परमाणु हथियार तैनात थे।

    जहाजों से परमाणु क्षमता को किया खत्म

    जहाजों से परमाणु क्षमता को किया खत्म

    लेकिन 1990 के दशक में बुश प्रशासन ने अमेरिकी नौसैनिक बलों से सभी सामरिक परमाणु हथियारों को एकतरफा हटाने का फैसला किया और साल 1994 में क्लिंटन प्रशासन ने फैसला किया, कि सभी अमेरिकी सतह के जहाजों से परमाणु हथियार लॉन्च करने की क्षमता हटा दिया जाएगा। सोलह साल बाद ओबामा प्रशासन ने युद्धपोतों पर परमाणु हथियारों की तैनाती को पूरी तरह से खत्म कर दिया और अब केवल बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों (एसएसबीएन) में ही परमाणु हथियार तैनात होते हैं।

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