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चीन ने बनाया एडवांस फुजियान सुपर एयरक्राफ्ट कैरियर, ड्रैगन की इस खतरनाक ताकत का भारत कैसे करे मुकाबला?

China-India Aircraft Carrier: समंदर में बादशाहत हासिल करने के लिए चीन ने अपना पहला सुपर एयरक्राफ्ट कैरियर समंदर में उतार दिया है, जिसका नाम फुजियान एयरक्राफ्ट कैरियर है और सिर्फ अमेरिका ही दुनिया का इकलौता देश है, जिसके पास इस एयरक्राफ्ट कैरियर को चुनौती देने की ताकत है।

ऐसे में सवाल उठता है, कि आखिर भारत चीन की इस खतरनाक ताकत का कैसे मुकाबला कर सकता है, क्योंकि, भारतीय नौसेना के बेड़े में अभी दो ही एयरक्राफ्ट कैरियर हैं और तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर बने या ना बने, इसको लेकर अभी तक भारत सरकार की तरफ से कोई फैसला नहीं किया गया है।

China-India Aircraft Carrier

चीनी फुजियान का कैसे मुकाबला करे भारत?

चीन ने जो अपना तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर फुजियान समंदर में उतारा है, वो 80 हजार टन का है और अब उसकी टेस्टिंग शुरू हो हई है, जिसको लेकर भारतीय नौसेना के एक पूर्व प्रमुख ने प्रस्ताव दिया है, कि चीनी खतरे का मुकाबला करने करे लिए भारत को फ्रांस के साथ मिलकर परमाणु ऊर्जा से संचालित होने वाले नेक्स्ट जेनरेशन एयरक्राफ्ट कैरियर के निर्माण पर फोकस करना चाहिए।

फुजियान, चीन का सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर है, जिसे सुपरकैरियर कहा जा रहा है, जो विद्युत चुम्बकीय कैटापुल्ट उपकरणों से लैस पहला घरेलू स्तर पर विकसित एयरक्राफ्ट कैरियर है।

इंडियन नेवी के पूर्व प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश (सेवानिवृत्त) ने यूरेशियन टाइम्स से बात करते हुए सुझाव दिया है, कि भारत और फ्रांस, पहले से ही लड़ाकू विमानों के लिए इंजन निर्माण को लेकर सहयोग कर रहे हैं और भारत ने इंडियन एयरफोर्स के लिए राफेल फाइटर जेट भी फ्रांस से ही खरीदा है, जबकि इंडियन नेवी के लिए भी मरीन राफेल खरीदने की योजना है, लिहाजा नेक्स्ट जेनरेशन एयरक्राफ्ट कैरियर के निर्माण के लिए भारत को फ्रांस की मदद लेनी चाहिए।

फ्रांस ने अपनी नौसेना के लिए पहले से ही नेक्स्ट जेनरेशन न्यूक्लियर एनर्जी से चलने वाले एयरक्राफ्ट कैरियर पर काम शुरू कर दिया है, जिसका नाम पोर्टे-एवियन्स नोवेल जेनरेशन (पीए-एनजी) है। पोर्टे-एवियन्स नोवेल जेनरेशन (पीए-एनजी) एयरक्राफ्ट कैरियर, चार्ल्स डी गॉल की जगह लेगा और माना जा रहा है, कि नये एयरक्राफ्ट कैरियर के निर्माण का काम अगले साल शुरू हो जाएगा और साल 2038 तक ये फ्रांसीसी नेवी में शामिल कर दिया जाएगा।

नेवल ग्रुप और चैंटियर्स डी एल अटलांटिक, संयुक्त रूप से पीए-एनजी का निर्माण कर रहे हैं, और टेक्निकएटोम जहाज को पावर देने वाले दो परमाणु रिएक्टर लगाए जाएंगे।

China-India Aircraft Carrier

एडमिरल प्रकाश का मानना है, कि अगर भारत इस प्रोजेक्ट में शामिल होना चाहता है, तो यही वो समय है, जब फ्रांस भारत के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए तैयार है। उनका मानना है, कि भारत का अगला एयरक्राफ्ट कैरियर (IAC) तकनीकी रूप से INS विक्रांत से आगे होना चाहिए।

उन्होंने कहा, कि "फ्रांसीसी कंपनियों ने काम शुरू कर दिया है और अभी भारत के लिए फ्रांस के साथ करार करना संभव है।"

उनका मानना है, कि "INS विक्रांत के लिए दोबारा ऑर्डर देना कोई अच्छा कदम नहीं होगा। इसमें स्की जंप (विमान के टेक-ऑफ के लिए) है और यह गैस टरबाइन से ऑपरेटन होता है। लिजाजा, अगले एयरक्राफ्ट कैरियर के पास बेहतर प्रदर्शन के लिए एक गुलेल और अंतहीन सहनशक्ति के लिए परमाणु प्रणोदन होना चाहिए।"

आईएनएस विक्रांत की क्षमता क्या है?

आईएनएस विक्रांत भारत का 44,000 टन का एयरक्राफ्ट कैरियर है, जिसे 2 सितंबर 2022 को भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था।

अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर्स की तरह INF विक्रांत ज्यादा संख्या में लड़ाकू विमानों का संचालन नहीं कर सकता है। ये अभी 18 फाइटर जेट्स को ऑपरेट कर सकता है। इसके अलावा, इसकी रेंज और शक्ति भी सीमित है। जबकि, पारंपरिक प्रणोदन के विपरीत, न्यूक्लियर प्रणोदन एयरक्राफ्ट कैरियर्स को असीमित शक्ति प्रदान करता है। परमाणु-संचालित फ्लोटिंग बेस अधिक चुस्त हो जाते हैं और इन्हें काफी लंबे समय के लिए तैनात किया जा सकता है।

भारतीय नौसेना के अनुभवी और भारतीय समुद्री फाउंडेशन के उपाध्यक्ष कमोडोर अनिल जय सिंह ने यूरेशियन टाइम्स को बताया, कि "एक एयरक्राफ्ट कैरियर करीब 40 सालों तक किसी नौसेना की सेवा में रहता है और भारत अगर अपना तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर बनाने का फैसला करता है, तो इसमें 7 से 9 सालों का वक्त लग सकता है और मौजूदा एयरक्राफ्ट कैरियर साल 2057 तक भारतीय नौसेना की सेवा में रह सकता है। लिहाजा, 45,000 टन वजनी एयरक्राफ्ट कैरियर चीन का मुकाबला करने के लिए भारत की जरूरत को पूरा नहीं कर पाएगा और अगले 5-7 वर्षों में, चीनी एयरक्राफ्ट कैरियर की हिंद महासागर क्षेत्र में जबरदस्त उपस्थिति होने जा रही है।"

लिहाजा, कमोडोर सिंह ने कहा कि भविष्य में हमें जिस तरह की क्षमता की जरूरत है, उसे देखते हुए हमें भविष्य में बड़े विमान वाहक की जरूरत है।

भारत को क्यों है तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर की जरूरत?

भारत के पास फिलहाल दो एयरक्राफ्ट कैरियर है, जिनमें से आईएनएस विक्रांत को भारत ने स्वदेश में तैयार किया है और भारतीय नौसेना दूसरे स्वदेशी विमानवाहक पोत का भी निर्माण करना चाहती है, क्योंकि रूस में बना पहला एयरक्राफ्ट कैरियर एडमिरल गोर्शकोव, जिसे आईएनएस विक्रमादित्य नाम दिया गया है, उसका जीवन भी समाप्त होने वाला है।

भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल हरि आर. कुमार ने 6 अक्टूबर 2023 को खुलासा किया था, कि नौसेना तीसरे विमान वाहक के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रही है, जो स्वदेशी आईएनएस विक्रांत की तरह का ही होगा। वहीं, बड़े एयरक्राफ्ट कैरियर को हासिल करने के लिए सरकार की ओर से कोई प्रोत्साहन नहीं मिला है।

दूसरी तरफ, फ्रांस जिस न्यूक्लियर एयरक्राफ्ट कैरियर पीए-एनजी को बनाने जा रहा है, वो अपने पूर्ववर्ती चार्ल्स डी गॉल से बड़ा और ज्यादा शक्तिशाली होगा। यह 75,000 टन का युद्धपोत होगा और भविष्य के लड़ाकू वायु प्रणाली (एफसीएएस) के 30 नई पीढ़ी के समुद्री वेरिएंट को ले जा सकता है, जिसमें नई पीढ़ी के लड़ाकू विमान और रिमोट वाहक वाहन शामिल होंगे।

रूस की मदद से भारत परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों का निर्माण करने में सक्षम हो गया है। लेकिन, कम से कम 60,000 टन के युद्धपोत के निर्माण के लिए रिएक्टर बनाना एक अलग खेल है।

वहीं, INS विक्रमादित्य और INS विक्रांत, दोनों डेक-आधारित लड़ाकू विमानों को उड़ान भरने में मदद करने के लिए पुरानी 'स्की-जंप' तकनीक का उपयोग करते हैं। नए विमान वाहक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एयरक्राफ्ट लॉन्च सिस्टम (EMALS) के साथ आ रहे हैं। ये जटिल टेक्नोलॉजी, प्रक्षेपण गति पर सटीक नियंत्रण जैसे लाभ प्रदान करती हैं और भारी विमानों के लिए परफेक्ट होते हैं, लिहाजा अगर भारत को चीनी आक्रामकता भविष्य में मुकाबला करना है, तो भारत को न्यूक्लियर एयरक्राफ्ट कैरियर के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

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