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‘अमेरिका का रवैया दोमुंहा, भारत ने किया बेनकाब’, चीन के सरकारी अखबार में भारतीय विदेश नीति की तारीफ

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि, जब तक एक प्रमुख देश सामरिक स्वायत्तता का पालन करता है, वह सभी मुद्दों पर वाशिंगटन के साथ एक ही पृष्ठ पर नहीं रहेगा, और ऐसे में मतभेद भी होंगे।

बीजिंग, अप्रैल 12: भारत और अमेरिका के बीच सोमवार 11 अप्रैल को ऐतिहासिक बैठक का आयोजन किया गया और ऐसा पहली बार हुआ, कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन, रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन और विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन बैठक में शामिल थे। इस बैठक में अंतरिक्ष को लेकर दोनों देशों के बीच जो समझौता किया गया है, वो चीन को परेशान करने वाला है, बावजूद इसके चीन के सरकारी अखबार ने अपने संपादकीय में भारत की जमकर तारीफ की है। आईये जानते हैं, ग्लोबल टाइम्स ने भारत और अमेरिका के बीच हुई बैठक को लेकर क्या लिखा है?

भारत-अमेरिका के बीच बैठक

भारत-अमेरिका के बीच बैठक

ग्लोबल टाइम्स ने अपने संपादकीय की शुरूआत इस बात से की है, कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रति जो बाइडेन की मौजूदगी में भारत और अमेरिका के विदेश और रक्षामंत्रियों के बीच एक बैठक हुई, जिसे 2+2 डायलॉग के नाम से जाना जाता है। ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि, बैठक से पहले अमेरिका बार बार इस बात को रेखांकित कर रहा था, कि अमेरिका और भारत 'सामान्य मूल्यों और लचीले लोकतांत्रिक संस्थानों' को साझा करते हैं, और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपने साझा हितों और प्रतिबद्धताओं की पुष्टि करते हैं। लेकिन, इस बैठक के दौरान दोनों देशों के बीच रूस-यूक्रेन संघर्ष पर ही चर्चा करने में काफी वक्त बिताया गया और नई दिल्ली ने जो रूख दिखाया है, वो साफ जाहिर करता है, कि नई दिल्ली की प्रतिक्रिया स्पष्ट रूप से वाशिंगटन से अलग है।

‘भारत-अमेरिका की सोच में अंतर’

‘भारत-अमेरिका की सोच में अंतर’

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि, इस बैठक में हर कोई यह देख सकता है, कि अमेरिका, भारत के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी पर कितना भी जोर दे, चाहे वह कितना भी मनोरंजक क्यों न लगे, लेकिन वह रूस-यूक्रेन संघर्ष पर दोनों देशों के बीच बड़े अंतर को नहीं छिपा सकता और न ही इस तथ्य को बदलेगा, कि यू.एस. ने इस बैठक का विषय ही ये रखा था, कि भारत पर रूस की निंदा करने का दबाव बनाया जा सके, लेकिन भारत अमेरिका के इस पक्ष से पूरी तरह वाकिफ था। ग्लोबल टाइम्स ने आगे लिखा है, कि अमेरिका के उप विदेश मंत्री वेंडी शेरमेन ने हाल ही में स्पष्ट रूप से कहा था, कि "हम स्पष्ट रूप से पसंद करेंगे कि भारत रूस के साथ गुटनिरपेक्ष जी77 साझेदारी के अपने दीर्घकालिक इतिहास से दूर हो जाए।" लेकिन, अमेरिकी अधिकारी के इस बयान ने भारतीय जनता को गुस्से में भर दिया और भारतीय जनता ने साफ तौर पर कहा, कि 'भारत संयुक्त राज्य से संबंधित नहीं है।" भारतीय लोगों ने कहा, कि 'भारत चाहता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका किसी भी देश के साथ गठबंधन करना बंद कर दे। क्या संयुक्त राज्य अमेरिका सुनेगा?'

‘नई दिल्ली का प्रवक्ता बना अमेरिका’

‘नई दिल्ली का प्रवक्ता बना अमेरिका’

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि, पिछले दो वर्षों में अमेरिका और भारत के बीच घनिष्ठ संपर्क रहा है। विशेष रूप से भारत को लुभाने और चीन को नियंत्रित करने के लिए वाशिंगटन अंतरराष्ट्रीय जनमत के क्षेत्र में नई दिल्ली का प्रवक्ता बन गया है, जिसने अमेरिका-भारत संबंधों पर गुलाब के रंग की छाया डाली है। हालाँकि, "उनकी दोस्ती की नाव" यूक्रेन संकट के तूफान का सामना नहीं कर सकी, और उनके रुख और हितों में उनके मतभेद सामने आ गए। ग्लोबल टाइम्स ने सख्त अल्फाज का इस्तेमाल करते हुए लिखा है, स्वतंक्ष कूटनीतिक सिद्धांतों के अनुसार, भारत अपनी राष्ट्रीय हितों को देख रहा है और उस रास्ते पर नहीं चलना चाहता, जो अमेरिका बता रहा है, जिससे गुस्साए अमेरिका ने भारत को 'गंभीर परिणाम' भुगतने की धमकी के साथ साथ 'हत्यारे इरादों' के संकेक दे दिए, लेकिन भारत ने बेशक इसे बर्दाश्त नहीं किया।

‘भारत सामरिक स्वायत्तता का करता है पालन’

‘भारत सामरिक स्वायत्तता का करता है पालन’

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि, जब तक एक प्रमुख देश सामरिक स्वायत्तता का पालन करता है, वह सभी मुद्दों पर वाशिंगटन के साथ एक ही पृष्ठ पर नहीं रहेगा, और ऐसे में मतभेद भी होंगे। हालांकि, वाशिंगटन ने कभी भी अन्य प्रमुख देशों की रणनीतिक स्वायत्तता को स्वीकार नहीं किया है और उनके अस्वीकार करते हुए उनका अनादर किया है, और उन देशों के विकास की प्रक्रिया को दबाने की कोशिश की है और उन्हें प्रलोभन देने के साथ साथ उने खिलाफ कठोर कार्रवाइयां भी की हैं।

‘प्रतिबंध में शामिल नहीं भारत’

‘प्रतिबंध में शामिल नहीं भारत’

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि, भारत सहित ब्रिक्स देशों ने रूस के खिलाफ प्रतिबंधों में भाग लेने से इनकार कर दिया है। भारत ने रूस के साथ व्यापार को निलंबित तो नहीं ही किया, बल्कि भारत ने रूस से ऊर्जा आयात में वृद्धि ही कर दी है। ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि, क्वाड का सदस्य देश होते हुए भी भारत मे अमेरिका की नीति का अनुसरण नहीं किया है, जिससे अमेरिका को शर्मिंदगी उठानी पड़ी है। इससे यह भी पता चलता है कि वाशिंगटन रणनीतिक महत्वाकांक्षाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं, जिसके दायरे में वो देशों को नियंत्रित करना चाहता है, लेकिन अब अमेरिका के पास कुछ ही 'उपग्रह राज्य' हैं।

‘अजीब स्थिति में फंसा अमेरिका’

‘अजीब स्थिति में फंसा अमेरिका’

ग्लोबल टाइम्स ने अपने संपादकीय में लिखा है कि, अमेरिका ने खुद को अजीब स्थिति में डाल दिया है। हालांकि, इतनी शिकायतों के बाद भी अमेरिका का लहजा चीन को लेकर जो है, वो भारत को लेकर नरम है, क्योंकि भारत क्वाड का सदस्य है और भारत को नाराज कर अमेरिका 'इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटेजी' तंत्र की संभावनाओं को कम नहीं करना चाहता है, जिसे उसने चीन को नियंत्रित करने के लिए व्यवस्थित किया है। ग्लोबल टाइम्स ने आगे लिखा है कि, भारत के खिलाफ "जबरदस्ती" की रणनीति का उपयोग करना उचित नहीं है, जबकि अमेरिका के पास भारत को लुभाने के लिए कुछ भी नहीं है। हालांकि, वाशिंगटन को जो शर्मिंदगी होती है, वह यह है कि अगर वह भारत को खुद से दूर जाने देता है, तो उसकी तथाकथित "लोकतंत्र बनाम निरंकुशता की लड़ाई" वाली बयानबाजी उसकी हार ही होगी और रूस के खिलाफ अमेरिका और पश्चिम का व्यापक प्रतिबंध नेटवर्क नहीं बन पाएगा।

‘अमेरिका का दोमुंहा रवैया’

‘अमेरिका का दोमुंहा रवैया’

चीन की सरकारी अखबार ने अपने संपादकीय में अमेरिका के भू-राजनीतिक रवैये को दोमुंहा कहा है और लिखा है, टू-फेस गेम खेलना अमेरिका की नियमित रणनीति है। ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, पिछले कुछ सालों में अमेरिका की रणनीति इस तरह की देखने को मिल ही, कि जब अमेरिका को भारत की जरूरत होती है, तो भारत 'विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश' बन जाता है और जब अमेरिका पश्चिमी देशों की श्रेष्ठता को दिखाने की कोशिश करता है, तो इसी भारत को वो 'उभरते कट्टर राष्ट्रवादियों' का देश बता देता है। ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि, अमेरिका अपनी विदेश नीति पाखंडियों की तरह हेरफेर के जरिए खेलता है, लेकिन अमेरिका का ये रवैया हमेशा काम नहीं करेगा और यूक्रेन संकट के बीच, नई दिल्ली वाशिंगटन के साथ खड़ी नहीं हुई, जब अमेरिका ने दुनिया को "लोकतंत्र" और "निरंकुशता" के दो शिविरों में जबरन विभाजित करने की अपनी उसी पुरानी चाल को दोहराने की कोशिश की।

‘भारत के रूख से अमेरिका चिंतित’

‘भारत के रूख से अमेरिका चिंतित’

ग्लोबल टाइम्स ने अमेरिका की तीखी आलोचना करते हुए लिखा है कि,भारत के रूख ने अमेरिका को काफी चिंतित कर दिया है, क्योंकि भारत, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और अमेरिका ने काफी सावधानीपूर्वक जिन प्रतिबंधों को तैयार किया है, उस 'लोकतांत्रिक शिविर' से भारत गायब है। ग्लोबल टाइम्स लिखता है, कि अमेरिकी पाखंड, बदमाशी और अहंकार को ज्यादा से ज्यादा देशों द्वारा अब खारिज कर दिया गया है, जबकि अमेरिकी अभिजात्य वर्ग इसे पहचाने बिना अभी भी अपने अहंकार में लिप्त है। लेकिन, इस तरह की पृष्ठभूमि में, जो उसके खिलाफ है, अमेरिका के लिए अपने आधिपत्य को बनाए रखना असंभव होगा।

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