चीन ने 20,000 सालों तक की बिजली का कर लिया इंतजाम, थोरियम से चलने वाले परमाणु रिएक्‍टर को मिली मंजूरी

इस रिएक्टर को बनने में 6 साल लगने की उम्मीद थी, लेकिन वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने उम्मीद से बेहतर दिया और महज तीन साल में काम पूरा कर लिया। पर्यावरण संबंधी परमिट लेने की वजह से इसमें 2 साल का अतिरिक्त वक्त लग गया।

चीन में परमाणु सुरक्षा निगरानी संस्था ने थोरियम से चलने वाले परमाणु संयंत्र को मंजूरी दे दी है। ये परमाणु संयंत्र गोबी रेगिस्थान स्थित वुवेई नामक जगह पर बना है। इसे चीन की उन्नत परमाणु प्रौद्योगिकियों की खोज में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बताया जा रहा है।

यदि चीन का ये प्रयोग सफल होता है तो थोरियम से व्यापारिक मकसद के लिए परमाणु संयंत्र संचालित करने वाला चीन पहला देश होगा। यह परमाणु संयंत्र चीनी विज्ञान अकादमी के एप्लाइड फिजिक्स के शंघाई संस्थान द्वारा संचालित है।

nuclear reactor in China

इस रिएक्टर से महज दो मेगावट बिजली पैदा होगी, जो 1000 घरों की जरूरत को पूरी करने लायक होगी। इसे 10 साल तक चलाने के लिए मंजूरी मिली है। आपको बता दें कि थोरियम एमएसआर एक प्रकार की उन्नत परमाणु तकनीक है जो ईंधन और शीतलक दोनों के रूप में तरल ईंधन, आमतौर पर पिघला हुआ नमक का उपयोग करती है।

चीन का ये प्रयोग सफल होता है तो चीन ऐसा परमाणु संयंत्र बनाने में सफल हो जाएगा, जिससे लंबी अवधि तक रेडियो एक्टिव रहने वाला कचरा परंपरागत रिएक्टरों की तुलना में कम मात्रा में पैदा होगा।

थोरियम सिल्वर कलर का रेडियो एक्टिव धातु है, जो चट्टानों के बीच पाया जाता है। अभी इसका औद्योगिक स्तर पर बहुत कम उपयोग होता है। चीन के पास दुनिया के सबसे बड़े थोरियम भंडारों में से एक है।

उन भंडारों के सटीक आकार का सार्वजनिक रूप से खुलासा नहीं किया गया है, लेकिन अनुमान है कि यह 20,000 से अधिक सालों तक चीन की उर्जा जरुरतों को पूरा कर सकता है।

चीन के परमाणु उद्योग के विशेषज्ञों के अनुसार ये रिएक्टर चीन के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि यह एडवांस न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी के विकास में चीन की प्रगति को दर्शाता है।

थोरियम रिएक्टर प्रौद्योगिकी के बड़े पैमाने पर उपयोग से ऊर्जा क्षेत्र में चीन की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने की क्षमता है। यह चीन की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर सकता है, देश को उन्नत परमाणु प्रौद्योगिकियों में अग्रणी बना सकता है और पर्यावरणीय स्थिरता में योगदान दे सकता है।

हालांकि, उद्योग के विशेषज्ञों के अनुसार, अगर रिएक्टरों को बड़े पैमाने पर सफलतापूर्वक तैनात किया जाना है, तो कई तकनीकी, नियामक और आर्थिक चुनौतियों से पार पाना होगा।

इस परियोजना की शुरुआत 2011 में हुई थी, लेकिन इसका निर्माण 2018 तक शुरू नहीं हुआ था। इसके शिलान्यास समारोह ने राष्ट्रीय सुर्खियां बटोरीं थीं क्योंकि उस समय निर्माण ठेकेदार ने इसकी शुरुआत के लिए मंत्र पढ़ने के लिए ताओवादी भिक्षुओं को बुलाया था।

इस रिएक्टर को बनने में 6 साल लगने की उम्मीद थी, लेकिन वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने उम्मीद से बेहतर दिया और महज तीन साल में काम पूरा कर लिया। पर्यावरण संबंधी परमिट लेने की वजह से इसमें 2 साल का अतिरिक्त वक्त लग गया।

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