अफगानिस्तान के अकूत 'खजाने' पर ड्रैगन की नजर, हड़पने के लिए तालिबान को चीन ने दिया ललचाने वाला ऑफर
चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने कहा है कि अफगानिस्तान के पुननिर्माण में चीन अपना योगदान देने के लिए तैयार है।
बीजिंग/काबुल, अगस्त 16: अफगानिस्तान की सत्ता पर तालिबान के काबिज होते ही ड्रैगन ने अफगानिस्तान के अकूत खजाने पर कब्जा करने के लिए अपनी चालें चलनी शुरू कर दी हैं। रविवार को तालिबान ने काबुल पर कब्जा जमाया है और सोमवार को चीन ने तालिबान को अपने खेमे में शामिल करने के लिए बहुत बड़ा ललचाने वाला ऑफर दे दिया है। चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने साफ कर दिया है कि तालिबान को मान्यता देना चीन के पक्ष में है, इसके साथ ही ग्लोबल टाइम्स के जरिए चीन ने तालिबान को अगला जो ऑफर दिया है, उस ऑफर से इनकार करना तालिबान के लिए नामुमकिन के बराबर है।

तालिबान को चीन का समर्थन !
ग्लोबल टाइम्स ने चीन की सरकार की तरफ से अपने देश के लोगों को कहा है कि ''इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन तालिबान को मान्यता देने में कोई खराबी नहीं है और चीन के लोगों को तालिबान को मान्यता देने के लिए तैयार हो जाना चाहिए''। इसके साथ ही ग्लोबल टाइम्स ने चीन के उन लोगों को धमकाते हुए अपनी रिपोर्ट में कहा है कि ''जो लोग तालिबान को मान्यता देने के खिलाफ हैं, वो अपना मुंह बंद करके बैठें, क्योंकि उन्हें विदेश नीति की समझ नहीं है''। ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि ''पश्चिम देशों से कुछ आवाजें आ रही हैं कि अमेरिका के अफगानिस्तान से पीछे हटनमे के बाद चीन बड़ी भूमिका निभाएगा और चीन अपनी सेना को अफगानिस्तान में भेज सकता है, तो चीन ये साफ कर चाहता है कि ये तमाम बातें पूरी तरह से अफवाह और निराधार हैं''।
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तालिबान को ऑफर
ग्लोबल टाइम्स ने साफ कर दिया है कि अफगानिस्तान में सेना भेजने का कोई इरादा चीन का नहीं है। हां, ग्लोबल टाइम्स ने आगे तालिबान को बड़ा ऑफर देते हुए कहा है कि वो अफगानिस्तान के पुननिर्माण में एक बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार है। चीन ने कहा है कि ''यनि अफगानिस्तान में बड़े पैमाने पर मानवीय संकट पैदा होता है, या युद्ध के बाद के पुनर्निर्माण और विकास में योगदान की जरूरत पड़ती है, तो चीन अपने प्रस्तावित बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई प्रोजेक्ट) के तहत अफगानिस्तान में अपनी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के तैयार है''। यानि, चीन ने साफ कर दिया है कि वो अफगानिस्तान में आने के लिए तैयार है और पुननिर्माण के लिए तालिबान को मान्यता देने के लिए तैयार है। जाहिर है, चीन ने बीआरआई प्रोजेक्ट का नाम सबसे पहले लिया है, यानि साफ है कि चीन को अफगानिस्तान से नहीं, बल्कि अपने प्रोजेक्ट से मतलब है और वो तालिबान से दोस्ती कर अपने प्रोजेक्ट को फाइनल करना चाहता है।

अमेरिका निभाए जिम्मेदारी
चीन ने इसके साथ ही अमेरिका पर निशाना साधते हुए कहा है कि अमेरिका अफगानिस्तान में अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकता है और अमेरिका को ही अफगानिस्तान में उपजे गंभीर मानवीय संकट के समय मदद के लिए सामने आना चाहिए। शरणार्थी संकट से भी अमेरिका को ही निपटना चाहिए और अफगानिस्तान को आर्थिक मदद देनी चाहिए, क्योंकि चीन मानता है कि अफगानिस्तान में तमाम गड़बड़ी अमेरिका ने पैदा की हैं। चीन ने कहा कि, यदि तालिबान पूर्ण नियंत्रण के बाद एक नए देश का निर्माण करता है, तो उसे इस क्षेत्र में आतंकवादियों, चरमपंथियों और अलगाववादियों के साथ सभी संबंधों को खत्म करने के अपने वादे को निभाना चाहिए।

अफगानिस्तान में क्या चाहता है चीन?
चीन ने तालिबान को अफगानिस्तान में पुननिर्माण करने का लालच दिया है। तालिबान जानता है कि वो बंदूक के दम पर सत्ता ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रख सकता है, लिहाजा वो चाहेगा कि अफगानिस्तान में विकास के प्रोजेक्ट लॉंच कर वो लोगों के दिलों में जगह बनाए और चीन से बड़ा साथी उसे कोई और मिल नहीं सकता है। और चीन इसी मौके की ताक में है। दरअसल, अमेरिकन जियोलॉजिकल सोसायटी के सर्वेक्षण ने अफगानिस्तान के अंदर एक सर्वेक्षण शुरू किया था। 2006 में अमेरिकी शोधकर्ताओं ने चुंबकीय गुरुत्वाकर्षण और हाइपरस्पेक्ट्रल सर्वेक्षणों के लिए हवाई मिशन भी किए थे। जिसमें पता चला था कि अफगानिस्तान में अकूत मात्रा में लोहा, तांबा, कोबाल्ट, सोना के अलावा औद्योगिक रूप से महत्वपूर्ण लिथियम और नाइओबियम के विशालकाय खनिज मौजूद है। ये ऐसे खनिज हैं, जो रातों रात किसी भी देश की तकदीर को हमेशा के लिए बदल सकते हैं।

अफगानिस्तान में मौजूद है दुर्लभ खनिज
इन सब खनिजों में से लिथियम को काफी दुर्लभ माना जाता है। लिथियम की मांग के कारण अफगानिस्तान को 'सऊदी अरब' भी कहा जाता है। दरअसल, लैपटॉप और मोबाइल की बैटरी में लिथियम का इस्तेमाल होता है। अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन ने ही कहा था कि अफगानिस्तान का लिथियम सऊदी अरब के तेल के भंडार की तरह है। जलवायु परिवर्तन को देखते हुए यह तय है कि आने वाले वक्त में जीवाश्म ईंधन की जगह इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मांग काफी ज्यादा बढ़ने वाली है। ऐसे में लिथियम जैसे खनिजों की भारी मौजूदगी अफगानिस्तान की किस्मत हमेशा हमेशा के लिए बदल सकती है, बशर्ते उसका सही तरीके से इस्तेमाल हो और वो इस्तेमाल अफगानिस्तान के अंदर बनने वाली सरकार करे। उसपर किसी बाहरी शक्ति का नियंत्रण ना हो। चीन इस बात जो जानता है और वो तालिबान को समर्थन देकर लीथियम के खजाने को लूटना चाहता है।

जीभ लपलपा रहा है ड्रैगन
इसके साथ ही अफगानिस्तान में नरम धातु नाइओबियम भी पाया जाता है, जिसका उपयोग सुपरकंडक्टर स्टील बनाने के लिए किया जाता है। और आपको बता दें कि सुपरकंडक्टर कितना जरूरी है, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि इस साल फरहरी महीने में 2 महीने के लिए एक नामी कार कंपनी को सुपरकंडक्टर के अभाव की वजह से अपना प्रोडक्शन बंद करना पड़ा था। इतने दुर्लभ खनिजों की मौजूदगी के कारण यह माना जाता है कि आने वाले समय में दुनिया तेजी से खनन के लिए अफगानिस्तान की तरफ रुख करेगी। अब तक अमेरिका यहीं बना हुआ था और उसने एक तरह से अफगानिस्तान की खनिज संपदा की रक्षा ही की है, लेकिन अब चीन ने अफगानिस्तान की तरफ देखना शुरू कर दिया है।

चीन का बीआरआई प्रोजेक्ट
चीन अफगानिस्तान में मौजूद दुर्लभ खजाने को हासिल करने के लिए करीब 62 अरब डॉलर की बेल्ट एंड रोड परियोजना के तहत अफगानिस्तान तक सीपीसी यानि चीन पाकिस्तान कॉरिडोर का विस्तार करने की कोशिश काफी तेज कर दी है। एक बार अगर बेल्ट एंड रोड परियोजना बन जाता है, तो फिर अफगानिस्तान की खनिज संपदा को चीन के हाथ में जाने से कोई नहीं रोक सकता है। क्योंकि, सब जानते हैं कि अफगानिस्तान के अंदर मची लड़ाई का फायदा उठाने में चीन कोई कमी नहीं करेगा।

अब तक गरीब क्यों है अफगानिस्तान?
एक रिपोर्ट के अनुसार अफगानिस्तान में एक ट्रिलियन डॉलर के संसाधन हैं, लेकिन हर साल सरकार को खनन से 30 करोड़ डॉलर के राजस्व का नुकसान ही होता है। अफगानिस्तान खराब सुरक्षा, कानूनों की कमी और भ्रष्टाचार के कारण अपने खनिज क्षेत्र को ना विकसित कर पाया है और ना ही उसकी पुरक्षा करने में समर्थ नजर आ रहा है। बिगड़ते बुनियादी ढांचे के कारण अफगानिस्तान में परिवहन व्यवस्था भी बेहद खराब है साथ ही सरकार के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वो खनिजों का खनन कर सके। इन सब वजहों से खनन ने देश के सकल घरेलू उत्पाद में केवल 7-10% का योगदान दिया। ऐसे में अगर चीन अफगानिस्तान में अपनी जड़ें जमाता है तो जाहिर तौर पर अफनागिस्तान को फायदा से ज्यादा नुकसान होगा।












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