अफगानिस्तान में चीन का डर्टी गेम: खरबों डॉलर का खजाना लूटना ही मकसद नहीं, दुश्मन को भी करना चाहता है खात्मा
China in Afghanistan: अफगानिस्तान में लगातार पांव पसारते चीन को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है। पता चला है, कि अफगानिस्तान के अरबों-खरबों के खजाने को ही लूटना चीन का मकसद नहीं है, बल्कि उइगर स्वतंत्रता सेनानियों को भी जड़ से उखाड़ना चीन का मकसद है।
रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानिस्तान में भारी संख्या में उइगर मानवाधिकार कार्यकर्ता छिपे हुए हैं और काबुल उनके लिए एक तरह से स्वर्ग की तरह साबित हो रहा है, लिहाजा चीन, तालिबान और उइगर मुस्लिम कार्यकर्ताओं की इस दोस्ती को खत्म करना चाहता है। चीन सिर्फ पारस्परिक व्यापारिक माध्यम से अफगानिस्तान में सिर्फ प्राकृतिक संसाधनों का दोहन ही नहीं करना चाहता है, बल्कि वो चाहता है, कि उइगर मुस्लिमों को अफगानिस्तान से जड़ से खत्म किया जाए।

अफगानिस्तान में चीन का ग्रेट गेम
युद्धग्रस्त राष्ट्र अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी के बाद काबुल पर खूनी कब्जे के दो साल बाद भी, चीन ने अभी तक अफगानिस्तान में तालिबान शासन को औपचारिक रूप से मान्यता नहीं दी है।
हालांकि, राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन, काबुल में तालिबान शासन के साथ सक्रिय रूप से जुड़ रहा है, लेकिन उइगरों मुस्लिमों को लेकर बेचैनी ने, बीजिंग को अफगानिस्तान में सावधानी से चलने के लिए मजबूर कर रखा है।
काबुल से निक्केई एशिया की एक रिपोर्ट में विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया है, कि अफगानिस्तान में चीन का बढ़ता प्रभाव "काफी हद तक उइगर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर लगाम लगाने की इच्छा से प्रेरित" है जो बीजिंग के घरेलू और क्षेत्रीय हितों के लिए खतरा हैं।
हालांकि, उसके बाद भी चीनी कारोबारी, अफगानिस्तान में अवसरों की तलाश कर रहे हैं और तालिबान प्रशासन के साथ कॉन्ट्रैक्ट साइन कर रहे हैं। खासकर चीनी कंपनियां अफगानिस्तान में प्राकृतिक संसाधनों के खनन को लेकर कॉन्ट्रैक्ट हासिल कर रही हैं।
इसी साल जुलाई में, तालिबान प्रशासन ने घोषणा की है, कि चीनी कंपनी, फैन चाइना अफगान माइनिंग प्रोसेसिंग एंड ट्रेडिंग कंपनी, अफगानिस्तान में बिजली उत्पादन, सीमेंट मैन्यूफैक्चरिंग और स्वास्थ्य सेवा जैसे क्षेत्रों में लगभग 350 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश करेगी। काबुल की राज्य संचालित बख्तर समाचार एजेंसी ने ये जानकारी दी थी।
वहीं, इसी साल जनवरी में, तालिबान ने उत्तरी अफगानिस्तान में अमु दरिया बेसिन से तेल निष्कर्षण के लिए चीन की शिनजियांग प्रांत के मध्य एशिया पेट्रोलियम और गैस कंपनी के साथ एक समझौता किया था।
यह समझौता, अगस्त 2021 में अमेरिकी नेतृत्व वाली सेनाओं के हटने के बाद काबुल पर फिर से कब्ज़ा करने के बाद तालिबान का पहला समझौता है, जो 150 मिलियन अमेरिकी डॉलर के वार्षिक निवेश के साथ शुरू होता है, जो तीन वर्षों में 540 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक बढ़ जाता है।
ये शिनजियांग वही प्रांत है, जहां उइगर मुस्लिम रहते हैं और इस प्रांत को स्वायत्त प्रांत होने का दर्जा प्राप्त है, लेकिन चीन यहां के उइगर मु्स्लिमों पर अत्याचार कर रहा है।
अफगानिस्तान में चीन के लिए रास्ता साफ
अमेरिका के बाहर निकलने के बाद अब चीन के लिए अफगानिस्तान में रास्ता साफ है और अफगानिस्तान में चीन के राजदूत, वांग यू, उइघुर खदान क्षेत्र से गुजरने और अफगानिस्तान में व्यापार के अवसरों को आगे बढ़ाने के लिए, तालिबान के मंत्रियों और अधिकारियों के साथ लगातार बैठकें कर रहे हैं।
चीन के राजदूत तालिबान के गृहमंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी से भी नियमित बैठकें कर रहे हैं, जिनके सिर पर आतंकवाद के आरोपों के लिए 10 मिलियन अमेरिकी डॉलर का इनाम है।
एक्सपर्ट्स का कहना है, कि अफगानिस्तान में फिलहाल कोई और विदेशी शक्ति निवेश के मूड में नहीं है और चीन की कोशिश इस कदर विस्तार की है, ताकि भविष्य में किसी और देश की पहुंच अफगानिस्तान के खनिजों और प्राकृतिक संसधनों पर ना हो।
वहीं, तालिबान के लिए चीन का निवेश उसकी जीवन रेखा है, क्योंकि पश्चिमी देशों ने उसके खिलाफ प्रतिबंधों में कोई ढील नहीं दी है, हालांकि, अफगानिस्तान में खतरे अभी भी कम नहीं हैं और तालिबान ने चीन को सुरक्षा का आश्वासन भी दिया हुआ है, लेकिन एक हमला, चीन को वापसी की तरफ भी धकेल सकता है।
यूरो टाइम्स की एक रिपोर्ट में ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के मानद एसोसिएट प्रोफेसर क्लाउड राकिसिट्स ने कहा, कि "(परियोजनाओं पर काम कर रहे) चीनी नागरिकों की सुरक्षा के लिए कोई भी खतरा निश्चित रूप से अफगानिस्तान में चीन की भागीदारी को समाप्त कर देगा।" और तालिबान इसे जानता है।
चीन को है उइगर मुस्लिमों से डर
चीन उइगरों की तुर्किस्तान इस्लामिक पार्टी (टीआईपी), जिसे पहले ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट कहा जाता था, उसे शिनजियांग प्रांत को अस्थिर करने के लिए जिम्मेदार मानता है। शिनजिंयाग, जिसका मंदारिन में अर्थ न्यू फ्रंटियर है, उसपर चीन ने साल 1949 में कब्जा कर लिया था, जिसे पहले पूर्वी तुर्किस्तान कहा जाता था।
टीआईपी का लक्ष्य पूर्वी तुर्किस्तान और उइगरों को चीनी शासन से मुक्त कराना है, जो अक्सर क्षेत्र में चीनी संसाधनों को निशाना बनाते हैं।
मई में, अपदस्थ चीनी विदेश मंत्री किन गैंग ने अपने तालिबान समकक्ष से मुलाकात की थी और उन पर बीजिंग की सुरक्षा चिंताओं को दूर करने और अफगानिस्तान से संचालित होने वाले उइगर समूहों पर अधिक सीधी कार्रवाई के लिए दबाव डाला था।
तालिबान आधिकारिक तौर पर किसी भी उइगर सेना को अपनी धरती के भीतर से राजनीतिक और अन्य गतिविधियों को अंजाम देने की अनुमति नहीं देता है, लेकिन वास्तव में, तालिबान उइगर कार्यकर्ताओं पर सख्त भी नहीं है।
25 जुलाई को जारी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है, कि टीआईपी की ताकत 300 से 1,200 सदस्यों के बीच है, जिन्होंने कथित तौर पर शिनजियांग की सीमा से लगे अफगानिस्तान के पूर्वोत्तर प्रांतों में अपनी उपस्थिति बनाए रखते हुए हथियार प्राप्त करने के अलावा नए परिचालन अड्डे स्थापित किए हैं। लिहाजा, अब चीन की कोशिश ये है, कि अफगानिस्तान में निवेश के जरिए तालिबान को उइगर मुस्लिमों के खात्में का फाइनल प्लान बनाया जाए, ताकि वो शिनजियांग प्रांत को उइगर उग्रवाद से हमेशा के लिए मिटा सके।
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