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Lalmonirhat Airbase: बांग्लादेश के अंदर पहला एयरबेस बनाने जा रहा चीन, भारत के पास क्या ऑप्शन है?

Lalmonirhat Airbase: 1941 में बर्मा रणभूमि बना हुआ था, जी हां तब ये बर्मा ही था बाद में 1989 में इसका नाम म्यांमार हुआ। यहां ब्रिटिश आर्मी और जापानी आर्मी के बीच घमासान युद्ध हो रहा था। इस जंग में जापान ब्रिटिश आर्मी पर बीस साबित हो रहा था। कारण, जापान के लड़ाकू विमान।

देखते ही देखते जापान ने रंगून पर कब्जा कर लिया और अपने नकाजिमा के 43 और मित्सुबिशी A6M जैसे लड़ाकू विमानों को बैंकॉक के डॉन मुआंग एयरबेस से हटाकर रंगून के मिंगलाडोन एयरबेस पर तैनात कर दिया था। इस एयरबेस से जापान के लड़ाकू विमान उड़ान भरते और चंद मिनटों में ब्रिटिश आर्मी पर बम बरसा कर बिना किसी नुकसान के वापस लौट जाते।

Lalmonirhat Airbase

जापानी आर्मी का ब्रिटिश ने ढूंढा तोड़

उस वक्त जापान के इस अटैक का ब्रिटिश आर्मी के पास कोई तोड़ नहीं था। एयर सपोर्ट से लबरेज जापानी आर्मी तेजी से अंदर आ रही थी। हालात ये थे कि इम्फॉल और कोहिमा किसी भी हफ्ते जापान के कब्जे में जा सकता था। ऐसे में ब्रिटिश आर्मी ने इसके काट के बारे में सोचा और एक ऐसी जगह खोजी गई जो जापानी आर्मी की पहुंच से दूर हो बॉर्डर के इतने पास हो कि यहां से लड़ाकू विमानों टैक ऑफ और लैंड कराया जा सके ताकि जापानी सेना को माकूल जवाब दे पाएं।

इसका तोड़ निकला, ईस्ट इंडिया के लालमोनिरहाट में। यहां 1931 में एक एयरस्ट्रिप बनाई गई थी जिसे अब एयरबेस में तब्दील करने का वक्त आ चुका था। सड़क से भी यहां पहुंचना बेहद आसान था। लिहाजा बिना देर किए ब्रिटिश रॉयल एयर फोर्स ने यहां अपना एयरबेस तैयार किया। डगलस डकोटा और ब्रिस्टल ब्लेनहाइम जैसे लड़ाकू विमान यहां तैनान किए गए और फिर जापान पर बमों की बारिश का सिलसिला शुरू हुआ।

1947 का बंटवारा और गोदाम बना लालमोनिरहाट

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों के लिए संजीवनी साबित हुआ ये लालमोनिरहाट एयरबेस 1947 के बंटवारे के बाद पूर्वी पाकिस्तान में चला गया। जो कि 1971 में बांग्लादेश के खाते में चढ़ गया। दशकों से इस एयरबेस का इस्तेमाल बांग्लादेश की वायुसेना एक गोदाम की तरह करती आई है। सालों-साल इस एयरबेस का कोई इस्तेमाल ना भारत ने किया ना बांग्लादेश कर पाया। लेकिन अब इस पर चीन की नजर पड़ गई है। चीन के अधिकारी इस एयरबेस का दौरा कर रहे हैं। खबर है कि चीन इस एयरबेस को दोबारा एक्टिव करना चाहता है। जिसमें खुद बांग्लादेश ने इसकी पेशकश की है।

चीन को लालमोनिरहाट में क्यों है दिलचस्पी?

साल 1942 में जब ब्रिटिशर्स ने इस एयरस्ट्रिप को एयरबेस में तब्दील किया, तब किसे पता था की इस एयरबेस से सिर्फ 12 किलोमीटर दूर एक इंटरनेशनल बॉउंड्री खिंच जाएगी। भारत के नक्शे में एक ऐसा हिस्सा आएगा। जिससे नॉर्थ ईस्ट के 7 राज्यों को जोड़ने के लिए सिर्फ 22 किलोमीटर चौड़ा कॉरिडोर बचेगा। जो चिकन नेक की तरह दिखेगा। इसी चिकन नेक के चलते इस लालमोनिरहाट एयरबेस भारत के लिए परेशानी का सबब बन सकता है।

कितना पतला है चिकन नेक प्वॉइंट?

भारत के नक्शे में नॉर्थ ईस्ट के सात राज्यों को बाकी के इलाके से जोड़ने वाली इस कड़ी को ही चिकन नेक या सिलिगुड़ी कॉरिडोर कहते हैं। ये हिस्सा कहीं 40 किलोमीटर चौड़ा है। तो कहीं 22 किलोमीटर। वैसे तो 22 किलोमीटर चौड़ी जमीन बहुत बड़ी होती है। लेकिन जब ये देश को दो हिस्सों को जोड़ती हो और इसके दोनों तरफ ऐसे देश आपके पड़ोसी हों जो आपके खिलाफ साजिश रच रहे हैं तो ये काफी छोटी हो जाती है। इसके पतले होने की कहानी भी दिलचस्प है।

आखिर बंटवारे में कैसे पतला हुआ चिकन नेक प्वॉइंट?

दरअसल 18वीं और 19वीं सदी में अंग्रेजो ने बंगाल के चारों ओर अपनी सीमाएं बढ़ानी शुरू कर दी थी। सिक्किम, नेपाल और भूटान तक ब्रिटिश आर्मी पहुंचने लगी। साल 1814 में अंग्रेजों और नेपाली राजाओं के बीच युद्ध की शुरुआत हुई। जिसका अंत 1816 में एक सुगौली में हुई संधि में हो सका। इस संधि में नेपाल के पहाड़ी राजाओं ने अपनी सीमाएं निर्धारित कर लीं। और सिक्किम को अपनी सीमा से बाहर कर दिया। इससे इतर ऊपर की तरफ बढ़े चले आ रहे अंग्रेजों ने साल 1835 में दार्जलिंग को अपने कब्जे में ले लिया।

चिकन नेक की इतिहास में जड़ें

कुछ सालों बाद अंग्रेजों और भूटान के राजाओं के बीच खींचातानी शुरू हो गई। 30 साल तक चली खींचतान का अंत 1865 में सिनचुला संधि में हुआ। भूटान ने अपनी सीमाएं तय कर लीं और बदले में अंग्रेजों ने भूटान को स्वतंत्रता दे दी। लेकिन इसकी कीमत भूटान ने अपनी विदेश नीति अंग्रेजों को सौंपकर चुकता की। वहीं जब 1947 में आजादी के वक्त पाकिस्तान का जन्म हुआ। जब राजाओं के बीच इस बात को लेकर फैसले होने लगे की वो भारत में रहेंगे या फिर पाकिस्तान में, तब जलपाईगुड़ी रियासत और कूचबिहार रियासत ने भारत में विलय करने का फैसला किया। लिहाजा इस रियासत के बाहर से सिरिल रैडक्लिफ ने पूर्वी पाकिस्तान की लकीर खींच दी। और यहीं से जन्म हुआ सिलिगुड़ी कॉरिडोर का जो कि नार्थ ईस्ट के राज्यों को भारत के दूसरे हिस्से से जोड़ने के लिए एक मात्र 22 से 40 किलोमीटर चौड़ा रास्ता बचा। जो आज अपनी इमेजनरी आकृति में एक मुर्गी के गर्दन की तरह दिखाई देता है। नार्थ ईस्ट के 7 स्टेट मिलकर मुर्गी का सिर बनते हैं। और बचे भारत के दूसरे हिस्से मुर्गी का पूरा शरीर। और यही सिलिगुड़ी कॉरिडोर मुर्गी के गर्दन वाला हिस्सा बनता है। जिसे चिकन नेक कहा जाता है।

चिकन नेक और भारत की कनेक्टिविटी

22 किलोमीटर चौड़ा सिलिगुड़ी कॉरिडोर ही नार्थ ईस्ट के 7 राज्यों को भारत के दूसरे राज्यों से जोड़ता है। अगर एयर फैसिलिटी को छोड़ दिया जाए तो नार्थ ईस्ट तक पहुंचने वाला एक-एक समान इसी कॉरिडोर के जरिए पहुंचाया जाता है। अगर इस कॉरिडोर में कुछ अड़चन आई तो नार्थ ईस्ट के साथ कनेक्टिविटी खतरे में पड़ सकती है। इस कॉरिडोर पर चीन की लंबे वक्त से नजर है। चीन लंबे समय से इसे काटकर भारत से बाकी के सातों राज्यों को अलग करना चाहता है। जुलाई 2017 में चीन ने अपनी मीडिया में दावा किया था की चीन सिलिगुड़ी कॉरिडोर के करीब एक सड़क बना रहा है। जिससे नार्थ ईस्ट के राज्यों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। ये बात इस हद तक बढ़ गई थी कि भारतीय राजनायिकों को इसका खंडन करना पड़ा था।

बांग्लादेश का चीन को खुला ऑफर

हाल ही में अप्रैल 2025 में चीन के दौरे पर गए बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने नार्थ ईस्ट को लैंड लॉक्ड बता दिया। कहा कि नार्थ ईस्ट का समुद्र तक पहुंचने का इकलौता रास्ता बांग्लादेश से होकर गुजरता है। इसलिए चीन को बांग्लादेश के अंदर और ज्यादा निवेश करना चाहिए। यूनुस के इस बयान पर भारत ने अपत्ति जताई और इस बयान को देश की संप्रभुता और अखंडता के लिए खतरा बताया। साथ ही बांग्लादेश के ऊपर कुछ निर्यात के बैन भी लगाए। नार्थ ईस्ट से म्यांमार के जरिए कोलकाता तक व्यापार के दूसरे रूट, कालादान प्रोजेक्ट को दोबारा गति दी। जिसके बारे हम आपको पहले बता चुके हैं।

भारत की सरहद पर मंडरा रहा चीन

लेकिन मोहम्मद यूनुस द्वारा किए इस अपील को चीन ने एक बड़े मौके की तरह देखा और तुरंत लपक लिया। Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत-भूटान-चीन वाले इस ट्रायऐंगल जंक्शन पर चीन ने 2024 से ही मिलिट्री एक्टिविटी बढ़ा दी है। चीन ने LAC के करीब 6 नए एयरबेस को इंजन टेस्ट पैड, सपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और बेहतर टेक्नोलॉजी के साथ अपग्रेड किया है। टिंगरी, ल्हुंजे, बुरांग, युतियान और यारकांत रीजन में चीन ने काफी डेवलपमेंट किया है। यहां के यानी रनवे पर ड्रोन्स भी देखे गए हैं, भारत के लिए एक बड़ा खतरा बना रहते हैं।

तख्तापलट और चीन की ढाका में एंट्री

ऑर्ब्जवर रिसर्च फाउंडेशन में चीन-ताइवान स्टडीज़ के फेलो कल्पित मनकीकर ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया है कि "चीन के पास इस इलाके के लिए पहले से प्लान तैयार है। शेख हसीना के दौर में भारत और बांग्लादेश के संबंध अच्छे थे स्थिर थे। इसलिए चीन ने अपने इस प्लान को होल्ड कर रखा था। अब जब सत्ता परिवर्तन हुआ है तो मोहम्मद यूनुस ने खुद से ही चीन को खुली पेशकश की है। हमें अभी नहीं पता है कि इस लालमोनिरहाट एयरबेस प्रोजेक्ट के लिए चीन की क्या योजना है। लेकिन इसका इस्तेमाल भारत के दूसरे हिस्सों से, नार्थ ईस्ट की ओर होने वाली मिलिट्री और सिविलियन एक्टिविटी पर नजर रखने के लिए किया जा सकता है।"

चीन के बांग्लादेश में प्रोजेक्ट शुरू

इधर, चीन ने बांग्लादेश के अंदर कुछ इकोनॉमिकल प्रोजेक्ट भी शुरू कर दिए हैं। जैसे की तीस्ता प्रोजेक्ट में फाइनेंशियली मदद करना। सैटेलाइट सिटी बसाने की प्लानिंग करना। और रंगपुर के पास एक सोलर पावर प्लांट बनाना। इसको लेकर इकोनॉमिक्स टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, "रंगपुर के पास बन रहे इस सोलर प्रोजेक्ट में काम करने वाले करीब करीब सभी लोग चीन से हैं। लोकल लोगों को इसमें ना के बराबर शामिल किया गया है। चीन की ये कंपनियां भारत-बांग्लादेश बॉर्डर के बेहद करीब इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी के लिए काम कर रही है।"

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में चाइना स्टडीज़ की प्रोफेसर श्रीपर्णा पाठक बताती हैं कि "रिपोर्ट से पता चला है कि लालमोनिरहाट एयरबेस के रिडेवलपमेंट्स में चीन की भागीदारी है। शायद इसे एक सिविलियन एयरपोर्ट के तर्ज पर डेवलप किया जा रहा है। लेकिन डर है कि इसका इस्तेमाल मिलिट्री पर्पस के लिए भी हो सकता है। डर है कि चीन यहां से सिलिगुड़ी कॉरिडोर पर नजर रख सकता है और मिलिट्री इंटेलिजेंस इकट्ठा कर सकता है।" इसके अलावा 17 मई 2025 को रक्षा विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी ने एक्स पर बताया था कि कैसे चीन के अधिकारी बांग्लादेश के दौरे पर हैं। जहां वो भारत बांग्लादेश बॉर्डर के सीमावर्ती इलाकों का दौरा कर रहे हैं। खासकर लालमोनिरहाट एयरबेस का। इस एयरबेस की भारत बांग्लादेश बॉर्डर से दूरी मात्र 12 किलोमीटर है। जबकि सिलिगुड़ी कॉरिडोर से इसकी दूरी करीब 135 किलोमीटर।

भारत-बांग्लादेश के मौजूदा संबंध

हाल के दिनों की अगर बात करें तो भारत बांग्लादेश के संबंध थोड़े खराब हुए हैं। लेकिन दोनों देश के राजनायिक इसे लेकर किसी भी तरह की बयानबाजी से बचते नजर आते हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था कि, "भारत, बांग्लादेश के साथ सकारात्मक और रचनात्मक रिश्तों की उम्मीद करता है। हम एक लोकतांत्रिक, समावेशी और समृद्ध बांग्लादेश बनाने के पक्ष में है"। तो वहीं जब बीबीसी बांग्ला ने मोहम्मद यूनुस से भारत से गिरते संबंधों पर सवाल किया, तब यूनुस ने कहा कि "हमारे संबंधों में कोई गिरावट नहीं है। हमारे संबंध अच्छे हैं और भविष्य में भी अच्छे रहेंगे।"

किसका फायदा-किसका नुकसान?

अगर भारत के बजाए चीन के करीब जाने के सवाल का जवाब ढ़ूंढ़े। तो 2-3 बातें सामने आती हैं। बांग्लादेश में भारत की पूर्व राजनायिक रह चुकीं वीना सीकरी ने बीबीसी को हाल ही में दिए अपने इंटरव्यू में बताया था कि बांग्लादेश और भारत के बीच दूरी बढ़ने का एक कारण शेख हसीना और बांग्लादेश में हुए हिंदूओं पर हमले हैं। बांग्लादेश की अपील के बावजूद भारत ने शेख हसीना का प्रत्यपर्ण नहीं किया। और इधर भारत ने बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के दौरान वहां हुए हिंदूओं और अल्पसंख्यकों पर हमलों पर नराजगी जताई थी। जिसे बांग्लादेश ने फेक न्यूज़ बता कर इग्नोर करने की कोशिश की थी। हालांकि इस्कॉन मंदिर के पुजारी चिन्मयदास की गिरफ्तारी ने बांग्लादेश को दोबारा कटघरे में खड़ा कर दिया था।

बांग्लादेश में लौट सकते हैं 1971 से पहले वाले हालात

बांग्लादेश की चीन के साथ बढ़ती नजदीकी पर वीना सीकरी बताती हैं कि "बांग्लादेश और चीन के बीच अतीत में भी डिफेंस का रिश्ता रहा है। जिसमें बांग्लादेश को बहुत से सैन्य सामान और हथियार चीन से मिलते रहे हैं। अब बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद मोहम्मद यूनुस को सामने रख कर जमात-ए-इस्लामी की सरकार अपने पुराने ढर्रे और पुराने संबंधों की ओर वापस लौट रही है। वो 1971 में हुए हर बात को टालने की कोशिश कर रहे हैं। जो ताकतें 1971 में हार गई थीं वही अब सत्ता में वापस आने की कोशिश में है।"

बांग्लादेेश को कुल कितना नुकसान?

द डिप्लोमैटिक मैग्जीन की साउथ एशिया एडिटर सुधा रामचंद्रन ने लिखा है कि "जब ट्रंप ने बांग्लादेश के ऊपर 37 फिसदी टैरिफ की घोषणा कर रखी है। तब भारत ने बांग्लादेश को मिली ट्रांसशिपमेंट की सुविधा पर रोक लगा दी। भारत का ये फैसला बांग्लादेश को अंतरराष्ट्रीय ट्रेड में चोट दे सकता है। कपड़े की फैक्ट्रियां बंद हो सकती है। हजारों लोग बेरोजगार हो सकते हैं।" वहीं थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने बीबीसी को बताया है कि "बांग्लादेश जो निर्यात करता है उसमें 80% कपड़ा ही है जो दूसरे देशों को बेचा जाता है। जो काफी अच्छी क्वालिटी के होता है। ये लोग दो तरीके से कपड़े बनाते हैं। पहला ये कि चीन से फैब्रिक मंगाया। बांग्लादेश में कटवाया-सिलवाया और निर्यात कर दिया। लेकिन इससे वैल्यू ऐड नहीं होता। असली वैल्यू ऐड होता है यार्न से खुद फैब्रिक बनाकर, उसे काटकर, सिलकर बेचने से। इस काम में बांग्लादेश की बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां और लाखों लोग लगे हुए हैं। बांग्लादेश अगर भारत से यार्न निर्यात करना बंद कर चीन से मिले फैब्रिक पर काम करेगा। तब इससे फायदा चीन का होगा और उसका सामान भी ज्यादा बिकेगा। लेकिन इससे बांग्लादेश से निर्यात होने वाले कपड़ों की क्वालिटी में कमी आएगी, जिससे दूसरे देशों में इसकी बिक्री घट सकती है"।

चीन कर लेगा बांग्लादेश के पोर्ट पर कब्जा?

भारत बांग्लादेश रिश्तों में आई गिरावट का भले ही चीन फायदा उठाना चाह रहा हो, भले ही वो बांग्लादेश के कुछ प्रोजेक्ट में निवेश कर दे, भले ही इससे बांग्लादेश को मौजूदा फायदा दिखे। लेकिन लंबे वक्त में इसका बुरा असर बांग्लादेश के ही इकोनॉमी पर देखने को मिलेगा। हो सकता है चीन से शुरू हुए इस नए रिश्ते की शुरूआत की कीमत बांग्लादेश को अपने पोर्ट बीजिंग के हवाले कर चुकानी पड़े।

वनइंडिया के इस एक्सप्लेनर पर आपकी क्या राय है, हमें कॉमेंट में बताएं।

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