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India Canada: खालिस्तानी आतंक पर कनाडा का यू-टर्न, क्या मार्क कार्नी के साथ सुधरेंगे भारत के रिश्ते?

Canada U-turn on Khalistani terror: सितंबर 2023 में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उस समय हलचल मच गई जब कनाडा के पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया। यह बयान कनाडा की संसद में दिया गया, जिसमें उन्होंने बिना किसी ठोस सबुत के भारत सरकार की भूमिका पर संदेह जताया।

इस एकतरफा आरोप के बाद भारत और कनाडा के द्विपक्षीय रिश्तों में एक बड़ी दरार खड़ी हुई और गंभीर तनाव आ गए थे। भारत ने उस समय कनाडा के इन आरोपों को पूरी तरह से खारिज किया था।

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इसके साथ ही कनाडा पर खालिस्तानी चरमपंथियों को शरण देने, भारत विरोधी एजेंडे को बढ़ावा देने और लोकतांत्रिक संस्थाओं का दुरुपयोग करने का आरोप भी लगाया। भारत ने यह भी कहा कि निज्जर एक घोषित आतंकवादी था, जिसे कुछ लोग कनाडा में मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में पेश कर रहे थे।

मार्क कार्नी की अगुवाई में बदली दिशा

अब कनाडा में सत्ता परिवर्तन हो चुका है। मार्क कार्नी देश के नए प्रधानमंत्री बने हैं, और उनकी सरकार ने विदेश नीति में उल्लेखनीय बदलाव के संकेत दिए हैं। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि पहली बार कनाडा की खुफिया एजेंसी CSIS (Canadian Security Intelligence Service) ने अपनी 2024 की सार्वजनिक रिपोर्ट में खालिस्तानी चरमपंथ को एक "राष्ट्रीय सुरक्षा खतरा" घोषित किया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कनाडा में सक्रिय खालिस्तानी समूह केवल विचारधारा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे हिंसा की योजना, वित्तपोषण और वैश्विक स्तर पर आतंकी हमलों की साजिश में भी शामिल हैं। ये समूह लोकतांत्रिक संस्थानों का इस्तेमाल कर अपने अलगाववादी और हिंसक एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं।

G7 के बाद नई शुरुआत: मोदी-कार्नी की महत्वपूर्ण मुलाकात

G7 सम्मेलन के बाद अलबोरदा में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के बीच एक विशेष द्विपक्षीय मुलाकात हुई। यह केवल एक औपचारिक भेंट नहीं थी, बल्कि भारत-कनाडा संबंधों को एक नई दिशा देने का प्रयास था।

बैठक में दोनों नेताओं ने खुलकर व्यापार, खनिज संसाधनों, ऊर्जा सुरक्षा, लोकतांत्रिक मूल्यों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे विषयों पर चर्चा की। प्रधानमंत्री मोदी ने इस बातचीत के दौरान स्पष्ट किया कि दोनों देशों के रिश्तों की नींव "आपसी सम्मान, संप्रभुता और कानून के शासन" पर आधारित होनी चाहिए।

कनाडा और भारत के बीच आर्थिक संबंध भी लगातार मजबूत हो रहे हैं। कनाडा की कई कंपनियों ने भारत में बड़े पैमाने पर निवेश किया है, वहीं भारतीय प्रवासी भी कनाडा में व्यवसाय और निवेश के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। दोनों देशों ने डिप्लोमेटिक सेवाओं को फिर से शुरू करने, व्यवसाय और नागरिक सेवाएं बहाल करने, तथा नए उच्चायुक्तों की नियुक्ति पर सहमति जताई है।

सख्ती या रणनितिक चाल? Canada's U-turn on Khalistani terror

पिछले वर्षों में कनाडा ने खालिस्तानी मुद्दे को "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" का हिस्सा बताया था और भारत की चिंताओं को नजरअंदाज किया था। लेकिन अब पहली बार कनाडा की आधिकारिक रिपोर्ट में माना गया है कि खालिस्तानी चरमपंथ भारत और कनाडा दोनों के लिए खतरा है। यह एक बहुत बड़ा रणनीतिक बदलाव है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि ये समूह सिर्फ "स्वतंत्रता की मांग" नहीं कर रहे, बल्कि हिंसा, अलगाववाद और अस्थिरता फैलाने के लिए सक्रिय हैं। इसे अब कोई घरेलू मुद्दा नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि भरत सरकार ने सालों से यह दावा किया है कि कनाडा में खालिस्तानी तत्व खुलेआम सक्रिय हैं। और भारत की संप्रभुता के खिलाफ काम कर रहे हैं। अब कनाडा की सरकार खुद यह बात स्वीकार कर रही है। यह एक बड़ा डिप्लोमैटिक यू-टर्न है, जो भारत की चिंताओं को औपचारिक मान्यता देता है।

पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने जब हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया था, तब उन्होंने "संप्रभुता", "आपसी सम्मान" जैसे शब्दों से परहेज किया था। लेकिन मार्क कार्नी की बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में इन शब्दों का स्पष्ट उल्लेख हुआ। यह इंगित करता है कि कनाडा की नई सरकार रिश्तों को सुधारने के लिए ईमानदार कोशिश कर रही है।

यह सवाल अब अहम है कि क्या कनाडा केवल बयानबाज़ी तक सीमित रहेगा या फिर वास्तव में खालिस्तानी आतंकियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगा? भारत इस घटनाक्रम को एक झिझक भरा लेकिन सकारात्मक कदम मान रहा है, लेकिन असली भरोसा तभी बनेगा जब कनाडा अपनी धरती पर भारत विरोधी तत्वों को समर्थन देना पूरी तरह बंद करेगा।

भारत-कनाडा संबंधों को मिलेगी नई दिशा?

कनाडा की राजनीति में हुए बदलाव का असर उसकी विदेश नीति पर साफ दिखाई देने लगा है। खालिस्तानी चरमपंथ को राष्ट्रीय सुरक्षा खतरा मानना केवल एक नीति परिवर्तन नहीं, बल्कि भारत के साथ नई समझ और सहयोग की ओर एक ठोस कदम है। अब देखना यह होगा कि क्या यह सिर्फ कूटनीतिक शिष्टाचार रहेगा या वास्तविक कार्रवाई में बदलेगा।

यदि कनाडा वाकई भारत के साथ सम्मानजनक और स्थिर रिश्ते चाहता है, तो उसे अपने देश में पल रहे आतंकवादी और अलगाववादी तत्वों पर निर्णायक कार्यवाही करनी होगी। यही भविष्य के भारत-कनाडा संबंधों की असली कसौटी होगी।

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