क्यूबेक आंदोलन को कमजोर करने के लिए चीन की राह पर चले PM ट्रूडो, Quebec movement फिर शुरू हो पाएगा?
तिब्बत को कंट्रोल करने के लिए चीन इस इलाके में चीनी श्रमिकों के प्रवास को बढ़ाता चला जा रहा है। जनसांख्यिकीय यानि कि डेमोग्राफी में बदलाव कर वह बहुत हद तक वह तिब्बत के अलावा शिनजियांग प्रांत में उइगरों को कमजोर कर रहा है। ऐसा प्रतीत हो ता है कि इसी चीनी नीति की बदौलत ट्रूडो सरकार भी क्यूबेक आंदोलन को दबाने में लगी हुई है।
एक अलग क्यूबेक देश बनाने की मांग करने वाली पार्टी क्यूबकॉइस ने आरोप लगाया है कि कनाडा सरकार अस्थायी आप्रवासन में लगातार वृद्धि कर रहे हैं। सरकार के इस कदम की वजह से फ्रैंकोफोन क्यूबेकवासी अल्पसंख्यक होने की राह पर हैं।

पीक्यू ने बुधवार को प्रकाशित सांख्यिकी आंकड़ों के आधार पर दावा किया कि क्यूबेक प्रांत में बीते एक साल में अस्थायी आप्रवासियों की संख्या 50 फीसदी बढ़ गयी है, जो कि एक बड़ी वृद्धि है।
जुलाई 2022 से जुलाई 2023 के बीच क्यूबेक में अस्थायी आप्रवासियों की संख्या 3,22,000 से 4,71,000 हो गई है। पीक्यू नेता पास्कल बेरुबे ने कहा कि यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। ओटावा कहीं अधिक संख्या में अस्थायी आप्रवासियों को क्यूबेक में घुसने की अनुमति दे रहा है।
आपको बता दें कि कनाडा के लिए क्यूबेक वही है जो पाकिस्तान के लिए बलूचिस्तान है या चीन के लिए ताइवान है। दोनों ही प्रांत अपने 'मूल देश' से अलग होना चाहते हैं। क्यूबेक में रहने वाले लोगों की मूल भाषा फ्रेंच है।
वहीं, कनाडा के बाकी हिस्से में अंग्रेजी का वर्चस्व है। क्यूबेकवासी खुद को अंग्रेजी बोलने वाले कनाडाई से अलग मानते हैं। ये कनाडा में फ्रेंच भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए प्रयास करते रहे हैं। कनाडा में क्यूबेक प्रांत के अलग होने के लिए 2 बार जनमत संग्रह भी हो चुका है।
1995 में हुए रेफरेंडम में कनाडा के साथ रहने वाले 50.06 प्रतिशत के मुकाबले कनाडा का साथ न चाहने वालों की संख्या 49.04 प्रतिशत थी। जाहिर है कि क्यूबेक जनमत संग्रह बेहद मामूली अंतर से हार गया था।
इसके बाद से क्यूबेक में जनमत संग्रह नहीं कराया गया है। कई क्यूबिक वासी का मानना है कि तब तत्कालीन सरकार ने जनमत संग्रह के दौरान 'धोखा' किया था जिसकी वजह से क्यूबेक अलग प्रांत नहीं बन पाया।
भारत-कनाडा विवाद के बीच कुछ नेताओं ने अचानक क्यूबेक मूवमेंट का मुद्दा उछाल दिया है। जो कि क्यूबेक के कुछ लोगों को खूब रास आ रहा है। वे ट्विटर पर इसकी जमकर सराहना कर रहे हैं।
मॉरिशन15 नाम के एक यूजर ने इंडिया टुडे की एक खबर को शेयर करते हुए लिखा है, "बड़े भारतीय मीडिया आउटलेट अब सहानुभूतिपूर्ण तरीके से क्यूसी स्वतंत्रता के बारे में रिपोर्ट कर रहे हैं, यह अतीत की तुलना में एक बड़ा बदलाव है जहां भारत या तो उदासीन था या इसके विरुद्ध था। ट्रूडो और कनाडा ने अनजाने में हमारी मदद की है, और मैं इसके लिए उन्हें धन्यवाद देता हूं।












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