अमेरिकी चुनाव के नतीजों को क्या ट्रंप पलट भी सकते हैं?

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क़रीब दो हफ़्ते हो चुके हैं जो बाइडन को अमेरिकी चुनाव का विजेता बने लेकिन डोनाल्ड ट्रंप अब भी अपनी हार मानने को तैयार नहीं हैं. क्या उनके पास इस फ़ैसले को बदलने की कोई योजना है?

ट्रंप की नतीजों को क़ानूनी चुनौती देने की रणनीति तो काम नहीं कर रही. ट्रंप की टीम ने दर्जनों केस तो दायर कर दिए हैं लेकिन अभी कोई सबूत पेश नहीं किया है.

उनके वकील और पूर्व न्यूयॉर्क मेयर रूडी ज्यूलियानी ने गुरुवार को कहा कि ट्रंप कैंपेन मिशिगन में अपनी कानूनी चुनौती वापस ले रहा है. मिशिगन में बाइडन को 1,60,000 वोटों के अंतर से जीत मिली है.

जॉर्जिया राज्य ने भी 50 लाख बैलेट की दोबारा गिनती की है और बाइडन को 12 हज़ार से ज़्यादा वोटों से जीत मिली है. राज्य ने भी नतीजे पर मुहर लगा दिया है.

अब जब बारी-बारी से दरवाज़े बंद हो रहे हैं तो ट्रंप की रणनीति कानूनी लड़ाई से राजनीतिक लड़ाई पर शिफ्ट हो रही है.

अमेरिकी चुनाव 2020
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अमेरिकी चुनाव 2020

ट्रंप की रणनीति क्या है?

ट्रंप शायद ये सब करने का सोच रहे हैं-

  • जितना हो सके उतने राज्यों में वोट सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया को रोकना, या तो कानूनी मुक़दमे के ज़रिए या रिपब्लिकन रुझान के अधिकारियों को आपत्ति उठाने के लिए.
  • उन राज्यों के रिपब्लिकन प्रतिनिधियों को जहां बाइडन बहुत कम अंतर से जीते हैं, उन्हें चुनाव धांधली के चलते पॉप्युलर वोट के नतीजों को ख़ारिज करने के लिए मनाना.
  • उसके बाद प्रतिनिधियों को इस बात के लिए मनाना कि वे अपने राज्य के इलेक्टोरल कॉलेज के वोटों को 14 दिसंबर को बाइडन की बजाय ट्रंप को दे दें.
  • ऐसा पर्याप्त राज्यों में करना जैसे विसकॉन्सिन, मिशिगन और पेंसिलवेनिया में ताकि ट्रंप के 232 इलेक्टोरल वोट का आंकड़ा 269 के जीत के आंकड़े को पार कर सके.

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ऐसा होने का लिए ट्रंप क्या कोशिश कर रहे हैं?

ट्रंप उन लोगों पर दबाव बना रहे हैं जो इस मामले में प्रभाव रखते हैं कि राज्य किसे राष्ट्रपति के पद के लिए चुने.

जब अमेरिकी लोग राष्ट्रपति चुनाव में वोट करते हैं, दरअसल, वे राज्य स्तर पर चुनाव कर रहे होते हैं ना कि राष्ट्रीय स्तर पर. वे राज्य के इलेक्टर्स के लिए वोट करते हैं जो जीत कर राष्ट्रपति के लिए अपना वोट देते हैं. अक्सर ये इलेक्टर्स लोगों के चुनाव के मुताबिक़ ही वोट करते हैं. उदाहरण के तौर पर अगर मिशिगन ने जो बाइडन जीते हैं तो वहां के इलेक्टर्स उन्हें ही वोट करेंगे.

ट्रंप के अलग-अलग राज्यों पर दबाव बनाने का इशारा तब मिला जब ऐसी ख़बरें आई कि उन्होंने डेट्रॉयट के नतीजों को सर्टिफाई करने से इनकार करने वाले रिपब्लिकन अधिकारियों को उन्होंने फोन किया था.

छोटे स्तर के दो अधिकारियों का राष्ट्रपति से सीधा बात करना ही थोड़ी असामान्य बात थी. मिशिगन के रिपब्लिकन प्रतिनिधियों को भी शुक्रवार के लिए व्हाइट हाउस जाने का न्योता आया.

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क्या ट्रंप कामयाब हो सकते हैं?

ये नामुमकिन नहीं है लेकिन फिर भी चांस बहुत कम है. पहले तो राष्ट्रपति को कई राज्यों में ऐसा करना पड़ेगा जहां बाइडन की जीत का अंतर हज़ारों से लेकर लाखों तक का है. ये साल 2000 जैसा नहीं है जहां सिर्फ़ फ्लोरिडा ही मुख्य राज्य था.

इसके अलावा, जिन राज्यों को ट्रंप की टीम टारगेट कर रही है जैसे कि मिशिगन, विस्कॉन्सिन, पेंसिलवेनिया और नवाडा, उनमें से कई में डेमोक्रेट गवर्नर हैं और वे ये सब होता देखकर हाथ पर हाथ धरे तो नहीं बैठे रहेंगे.

जैसे मिशिगन में गवर्नर ग्रेचन व्हिटमर स्टेट इलेक्शन बोर्ड को हटा कर दूसरा बोर्ड ला सकते हैं तो बाइडन की जीत को सर्टिफाई कर देगा.

डेमोक्रेटिक गवर्नर बाइडन के समर्थन वाले इलेक्टर्स का नाम आगे कर सकते हैं. रिपब्लिकन प्रतिनिधि अपने नाम देंगे. फिर सदन को फैसला करना होगा कि वे किस ग्रुप को सुने.

ऐसा नहीं है कि बाइडन के समर्थकों के लिए चिंता की बात नहीं है. हालांकि इस बात के चांस उतने ही हैं जितने की किसी के लॉटरी जीतते हुए उस पर बिजली गिर जाए लेकिन इस स्टेज पर जीत हाथ से खिसकना ऐसा होगा कि उसके बारे में सोचने में भी डेमोक्रेट्स को घबराहट हो रही होगी.

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क्या ये रणनीति कानूनी तौर पर सही है?

ट्रंप ने अपने कार्यकाल का बड़ा हिस्सा राष्ट्रपति पद की परंपराओं को तोड़ने में बिताया है. ऐसा लग रहा है कि कार्यकाल के ये आख़िरी दिन भी ज़्यादा अलग नहीं होंगे.

ट्रंप चुनाव अधिकारियों या राज्य के प्रतिनिधियों पर दबाव बना रहे हैं जो कि पहले कभी नहीं देखने को मिला. ये विवादस्पद है लेकिन ग़ैर-क़ानूनी नहीं है.

अमरीका में पहले राज्य के प्रतिनिधियों की शक्ति ज़्यादा व्यापक थी कि वे कैसे अपने इलेक्टोरल वोट दें और आज भी ऐसी कोई संवैधानिक ज़रूरत नहीं है कि वे पाप्युलर वोट के मुताबिक वोट करें.

लेकिन तबसे प्रतिनिधियों ने नतीजों के अनुसार ही वोट देना शुरू किया है लेकिन मूल सिस्टम अब भी अपनी जगह है.

अगर राष्ट्रपति प्रतिनिधियों को मनाने में कामयाब हो जाते हैं जैसे कि मिशिगन में तो डेमोक्रेट्स की कानूनी आपत्ति का सामना करना पड़ेगा. क़ानून राष्ट्रीय स्तर पर भी और राज्य स्तर पर भी अस्पष्ट है. इस तरह की चीज़ पहले कभी शायद ही मुकदमे का मुद्दा बना हो.

क्या राज्य चुनाव से संबंधित अपने कानून बदल सकते हैं? शायद. लेकिन आख़िरी फैसला जजों का ही होगा.

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क्या किसी ने पहले ऐसा किया है?

आख़िरी बार चुनाव में क़रीब का मामला साल 2000 में हुआ था जब अल गोर और जॉर्ज बुश राष्ट्रपति चुनाव में खड़े थे. फ्लोरिडा में कुछ सौ वोटों का ही अंतर था. सुप्रीम कोर्ट ने दखल दिया और बुश राष्ट्रपति बने.

अगर कई राज्यों में चुनाव को लेकर विवाद की बात है तो साल 1876 में जाना पड़ेगा जहां रिपब्लिकन रदरफॉर्ड हेय्स और डेमोक्रेट सेमुअल टिलडन राष्ट्रपति चुनाव लड़ रहे थे.

फ्लोरिडा, लुसिआना, साउथ कैरोलाइना के इलेक्टोरल कॉलेज में किसी को बहुमत नहीं मिला. इसके बाद ये मामला निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेज़ेंटेटिव्स के पास गया जिन्होंने हेय्स की तरफ रुझान दिखाया और हेय्स राष्ट्रीय स्तर पर अपने प्रतिद्वंद्वी से उसी तरह जीते जैसे 2000 में बुश और 2016 में ट्रंप जीते थे.

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अगर ट्रंप के ये सब कदम फेल हो गए तो 20 जनवरी को दोपहर 12 बज कर 1 मिनट पर जो बाइडन अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति बन जाएंगे, फिर चाहे ट्रंप हार मानें या ना मानें.

उस प्वॉइंट पर सीक्रेट सर्विस और अमेरिका की सेना पूर्व राष्ट्रपति के साथ वैसा ही व्यवहार करने के लिए स्वतंत्र है जैसा वे सरकारी संपत्ति पर खड़े किसी अनधिकृत व्यक्ति के साथ करते हैं.

गुरुवार को एक प्रेस कांफ्रेस में जो बाइडन ने कहा, "ये अफसोसनाक है जो ट्रंप कर रहे हैं. वे लोकतंत्र के बारे में दुनिया को हानिकारक संदेश भेज रहे हैं.

ट्रंप अगर कामयाब न भी हुए तो भी वे आने वाले चुनावों के लिए एक ऐसी मिसाल कायम कर रहे हैं जो किसी अमेरिकी लोगों के अमेरिकी लोकतंत्र और संस्थाओं में भरोसे को कमज़ोर करेगी.

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