तालिबान के राज में क्या अल क़ायदा और आईएस का अड्डा बन सकता है अफ़ग़ानिस्तान?

काबुल की सड़कों पर तालिबान के लड़ाके
Reuters
काबुल की सड़कों पर तालिबान के लड़ाके

अफ़ग़ानिस्तान के सुदूर कुनार प्रांत की एक घाटी में ऑनलाइन जिहादी चैट फ़ोरम पर चरमपंथी संगठन अल-क़ायदा के समर्थक ख़ुशियाँ मना रहे हैं. ये लोग अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की जीत को 'ऐतिहासिक विजय' मान रहे हैं.

अफ़ग़ानिस्तान से उन सुरक्षाबलों के बाहर जाने से पूरी दुनिया में फैले पश्चिम विरोधी जिदाही समूहों को बड़ा उत्साह मिला है, जिन्होंने आज से 20 साल पहले यहीं की ज़मीन पर तलिबान और अल-क़ायदा को अस्थायी रूप से खदेड़ दिया था.

इसके बाद इराक़ और सीरिया में हार के बाद नई ज़मीन तलाश रहे कथित इस्लामिक स्टेट जैसे चरमपंथी संगठनों से जुड़े लड़ाकों के लिए अब अफ़ग़ानिस्तान के वो अनियंत्रित स्थान पैर जमाने का नया अड्डा बन सकते हैं, जहाँ तालिबान ने बीते दशक बिताए हैं.

पश्चिमी देशों के सैन्य अधिकारी और राजनेता चेतावनी देते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में अल-क़ायदा पहले से कहीं अधिक ताक़त के साथ वापसी कर सकता है.

अफ़ग़ान संकट पर हुई एक आपात बैठक के बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने चेतावनी दी कि अफॉग़ानिस्तान फिर से अंतरराष्ट्रीय चरमपंथियों का अड्डा न बन जाए, इसके लिए पश्चिमी देशों को एकजुट होना होगा.

सोमवार को संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने संयुक्त राष्ट्र युरक्षा परिषद से अपील की कि वो "अफ़ग़ानिस्तान में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के ख़तरे को कम करने के लिए हरसंभव रास्तों का इस्तेमाल करें."

लेकिन क्या अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की वापसी का सीधा मतलब अल-क़ायदा के अड्डों की वापसी और पश्चिमी देशों पर हमला करने के लिए अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल होगा. ज़रूरी नहीं है कि ऐसा ही हो.

वैधता और पहचान पाने की चाहत

इससे पहले साल 1996 से लेकर 2001 तक अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का शासन था. उस समय देश में एक तरह से बंदूक का राज था.

उस वक़्त तीन देश सऊदी अरब, पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात ने अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सरकार की वैधता को स्वीकार किया था.

तालिबान ने इस दौर में ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में चल रहे चरमपंथी संगठन अल-क़ायदा को अपने यहाँ पनपने दिया. इस संगठन ने साल 2001 में अमेरिका में 9/11 के आतंकवादी हमलों को अंजाम दिया, जिसमें कुछ बहुमंज़िला इमारतें ध्वस्त हुईं और क़रीब 3,000 लोगों की जान गई.

एक अनुमान के अनुसार अल-क़ायदा ने पूरी दुनिया से करीब 20,000 लोगों को अपने शिविरों में प्रशिक्षित किया और उन्हें अपने देशों में लौट कर घातक कारनामों को अंजाम देने के लिए तैयार किया. इसी वजह से अल-क़ायदा को 'आतंक का विश्वविद्यालय' भी कहा जाता है.

आज की तारीख़ में तालिबान ख़ुद को सही मायनों में "अफ़ग़ानिस्तान के इस्लामी शासक" के रूप में देखता है और वो चाहेगा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे इसी पहचान के साथ स्वीकृति मिले.

तालिबान
BBC
तालिबान

तालिबान पहले से ही ये कह रहा है वो भ्रष्टाचार, आंतरिक कलह और संसाधनों के दुरुपयोग को ख़त्म कर देश में शांति, क़ानून व्यवस्था स्थापित करना चाहता है. बीते 20 साल पहले तालिबान की सत्ता इससे एकदम उलट थी.

हाल में दोहा में तालिबान के साथ अफ़ग़ान शांति वार्ता हुई थी, जो बेनतीजा साबित हुई. तालिबान की तरफ से मध्यस्थ को स्पष्ट कर दिया गया था कि जब तक वो खुद को अल-क़ायदा से पूरी तरह दूर नहीं कर लेता, तब तक उसे किसी प्रकार की स्वीकृति नहीं मिल सकती.

तालिबान का कहना था कि ये काम वो पहले ही कर चुका है. हालाँकि संयुक्त राष्ट्र की एक हालिया रिपोर्ट में ये दावा किया गया कि ऐसा कतई नहीं है. रिपोर्ट में कहा गया था कि दोनों संगठनों के बीच क़बायली समुदायों के स्तर पर संबंध तो है ही, बल्कि वैवाहिक संबंध भी हैं.

हाल में जब तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान में तेज़ी से पैर पसारना शुरू किया, कई जगहों पर तालिबान के अफ़ग़ान लड़ाकों के साथ "विदेशी" यानी ग़ैर-अफ़ग़ानी लड़ाके भी दिखे.

ये भी स्पष्ट है कि एक तरफ तालिबान का चेहरा बने उसके प्रवक्ता और मध्यस्थ बातचीत में व्यावहारिक और नरम रुख़ वाले दिखते हैं, तो दूसरी तरफ ज़मीन पर बदले की भावना से हो रही बर्बर घटनाएँ हो रही है.

12 अगस्त को एक तरफ जब तालिबान राजधानी काबुल की तरफ अपने पैर बढ़ा रहा था, अमेरिका में काबुल के उपराजदूत ने ट्वीट कर कहा, "दोहा में तालिबान का दिया बयान बदक्शां, गज़नी, हेलमंद और कंधार में उठाए गए उनके क़दमों से मेल नहीं खाता. हिंसा, डर और युद्ध के ज़रिए ताक़त को अपने हाथों में समेटना उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग कर देगा."

ये भी पढ़ें-

ओसामा बिन लादेन
Getty Images
ओसामा बिन लादेन

जिहादियों को रोकना पश्चिमी देशों के लिए हो सकता है मुश्किल

तालिबान बेहद कड़े माने जाने वाले इस्लाम के शरिया क़ानून का पालन करता है. जिसके तहत उसका मूल उद्देश्य अफ़ग़ानिस्तान के भीतर सत्ता क़ायम करना है, न कि उसकी सीमाओं के बाहर शासन करना.

लेकिन अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट के उद्देश्य तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान की सीमाओं से अलग हैं. ये संभव है कि आने वाली तालिबान सरकार इन समूहों पर अंकुश लगाने की कोशिश करे. हालाँकि ऐसी संभावनाएँ भी हैं कि देश के कई इलाक़ों में उनकी हरकतें सरकार की नज़रों में न आए.

एशिया पेसिफ़िक फाउंडेशन के डॉक्टर सज्जन गोहल कहते हैं कि उन्हें उम्मीद है कि कुनार में अल-क़ायदा समर्थकों की संख्या आने वाले वक्त में बढ़ सकती है. फ़िलहाल यहाँ 200 से 500 अल-क़ायदा समर्थन मौजूद होने अनुमान है.

वो कहते हैं, "कुनार प्रांत पर तालिबान के क़ब्ज़े का काफ़ी बड़ा सामरिक महत्व है. ये बेहद मुश्किल पहाड़ों और जंगलों से भरी घाटी का इलाक़ा है. अल-क़ायदा वहाँ पहले से ही मौजूद है और आने वाले वक़्त में ये संगठन अपना संख्या बल बढ़ाने की पूरी कोशिश करेगा."

अगर ऐसा हुआ तो पश्चिमी देशों के लिए इस पर लगाम लगाना बेहद मुश्किल साबित हो सकता है.

बीते दो दशकों में पश्चिमी देशों की निर्भरता अफ़ग़ान ख़ुफ़िया सेवा नेशनल डायरेक्टरेट ऑफ़ सिक्योरिटी और उसके नेटवर्क के अलावा अपने ख़बरियों और अमेरिका, ब्रिटेन और अफ़ग़ान विशेष सुरक्षाबलों पर रही है.

अफ़ग़ानिस्तान में ये सब अब ख़त्म हो गया है और इस कारण अब वो ख़ुफ़िया अर्थों में 'बेहद मुश्किल जगह' बन गई है.

अगर आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों की पहचान कर ली जाती है और उनके सटीक ठिकाने का पता लगा लिा जाता है, तो अमेरिका के लिए ड्रोन हमलों या क्रूज़ मिसाइल हमलों का विकल्प रहता है. साल 1998 में ओसामा बिन लादेन पर इसी तरह का एक हमला किया गया था, लेकिन वो बच गए थे.

डॉक्टर गोहल कहते हैं कि काफ़ी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि क्या पाकिस्तानी अधिकारी विदेशी लड़ाकों को अपने क्षेत्र से होते हुए अफ़ग़ानिस्तान जाने की इजाज़त देते हैं या फिर वो उन्हें रोकने में सक्षम हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+