अमेरिका में भारतीय समुदायों के लिए बनेगा जाति-विरोधी कानून; दक्षिणपंथी हिन्दू क्यों कर रहे विरोध?
अगर कैलिफोर्निया में सीनेटर वहाब का कानून लागू होता है तो वह जाति आधारित भेदभाव पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला अमेरिकी राज्य बन सकता है। इससे पहले सिएटल ऐसा कानून बनाने वाला पहला शहर बना था।

Image: Oneindia
अमेरिका के सिएटल शहर में जाति के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करने वाला कानून बनाया गया है। ऐसा पहली बार हुआ है कि भारत के बाहर किसी देश में ऐसे कानून बनाए गए हैं। इसके बाद अब कैलिफोर्निया में जातिवाद के खिलाफ कानून बनाने की तैयारी हो रही है।
अमेरिका के कैलिफोर्निया प्रांत विधानसभा में स्टेट सीनेटर आयशा वहाब ने बीते महीने एंटी कास्ट बिल पेश किया है। अगर ये बिल पास हो गया तो कैलिफोर्निया अमेरिका का पहला राज्य होगा जहां जाति के आधार पर भेदभाव करने पर प्रतिबंध होगा।
इस प्रस्ताव ने अमेरिका में हिन्दू समुदाय को दोफाड़ कर दिया है। हाल ही में कैलिफोर्निया में बड़ी संख्या में भारतीय-अमेरिकियों ने जाति-आधारित भेदभाव वाले कानून के खिलाफ शांतिपूर्ण रैली निकाली। विरोध कर रहे भारतीय-अमेरिकियों को डर है कि सरकारी नीति में जाति को लेकर कानून बनाने से अमेरिका में 'हिंदूफोबिया' के कारण होने वाली घटनाएं बढ़ेंगी।
कई लोगों का यह मानना है कि यह बिल नफरत को बढ़ाएगा। कानून के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों ने कैलिफोर्निया के सांसदों से अपील की कि वे हिंदुओं को अलग न करें और न ही उनके हिंदू होने के कारण यह मानकर बैठ जाएं कि वे दोषी हैं।
दक्षिणपंथी हिन्दुओं का तर्क है कि जाति-आधारित भेदभाव भयावह है, अमेरिका में इसे प्रतिबंधित करने वाला कोई भी कानून पूरे दक्षिण एशियाई समुदाय, विशेषकर हिन्दुओं को निशाना बनाएगा। उनका कहना है कि अमेरिका में जातिगत पूर्वाग्रह दुर्लभ है। यह इतना व्यापक नहीं जितना बताया जाता है।
कानून बनाने के विरोध में कुछ दलित भी नजर आ रहे हैं। भारत में जन्मे और सैन फ्रांसिस्को में रहने वाले दलित आल्ड्रिन दीपक ने डायचे वेले से बात करते हुए कहा कि 35 साल में उन्होंने अमेरिका में कभी जातिगत भेदभाव का सामना नहीं किया। कभी भी उनका अनुभव बुरा नहीं रहा।
दीपक ने कहा कि वे कभी नहीं चाहेंगे कि जाति अमेरिका में एक मुद्दा बने। वह कहते हैं, "जहां कोई मुद्दा नहीं है, वहां इसे खड़ा करने से समुदाय में बंटवारा ही होगा।" कोएलिशन ऑफ हिंदूज ऑफ नॉर्थ अमेरिका के अध्यक्ष निकुंज त्रिवेदी ने कहा कि जाति के मुद्दे को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है।
निंकुज ने कहा, "इस देश में हिंदू धर्म के बारे में समझ बहुत कम है। कई लोग मानते हैं कि जातिप्रथा ही हिंदू धर्म है लेकिन ऐसा नहीं है। हिंदू धर्म में विचारों, मान्यताओं और अभ्यास में विविधता है।"
अमेरिकी जनगणना में 2018 में किए गए अमेरिकी सामुदायिक सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका में भारतीय मूल के लगभग 42 लाख लोग रहते हैं। इस बढ़ती आबादी के साथ बढ़ते जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए दलित कार्यकर्ता कानूनों की मांग कर रहे हैं।
भारत ने 1948 में जातिगत भेदभाव पर प्रतिबंध लगा दिया था और उस नीति को 1950 में संविधान में शामिल किया था। हालांकि देश अब तक जातिवाद से मुक्त नहीं हो पाया है।












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