BRICS Summit: मोदी+पुतिन+जिनपिंग, ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को लेकर क्यों जल रहा अमेरिका, डॉलर का काम तमाम?

BRICS Summit 2024: किसी देश को दबाने के लिए अमेरिका झुंड के साथ आक्रमण करता है और कनाडा सहित यूरोपीय देश उस झुंड का हिस्सा होते हैं, जैसा हम खालिस्तान के मुद्दे पर देख रहे हैं, कि भारत पर दबाव बनाने के लिए अमेरिका ने कनाडा, न्यूजीलैंड और यूके जैसे देशों को आगे कर दिया है।

वहीं, रूस को भी अमेरिका की अगुवाई में पश्चिमी देशों ने झुंड बनाकर घेर रखा है और यूक्रेन युद्ध शुरू होने के करीब तीन साल बाद, जब अमेरिका ने पुतिन के देश को प्रतिबंधों की बेड़ियों में पूरी तरह जकड़ लिया था, तो उसे उम्मीद थी, कि पुतिन घुटनों पर आ जाएंगे, लेकिन रूसी राष्ट्रपति, पूरी ठसक के साथ एक दर्जन से ज्यादा विश्व नेताओं के साथ शिखर सम्मेलन कर रहे हैं और अमेरिका को बता रहे हैं, कि वो अकेले नहीं हैं, बल्कि देशों का एक उभरता हुआ गठबंधन उनके साथ खड़ा है।

BRICS Summit 2024

अमेरिका के जलन के पीछे की वजह जानिए

दक्षिण-पश्चिमी रूसी शहर कजान में आज से शुरू होने वाला तीन दिवसीय ब्रिक्स शिखर सम्मेलन, दुनिया की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के समूह का शिखर सम्मेलन है, जिसमें इस साल की शुरुआत में मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात, इथियोपिया और ईरान को शामिल किया गया है।

जिन नेताओं के भाग लेने की उम्मीद है, उनमें चीन के शी जिनपिंग, भारत के नरेंद्र मोदी, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, दक्षिण अफ्रीका के सिरिल रामफोसा के साथ-साथ क्लब के बाहर के देश, जैसे तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन भी शामिल हैं। ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ने सिर में चोट लगने के बाद अपनी यात्रा रद्द कर दी है।

यानि ब्रिक्स शक्तिशाली हो रहा है और माना जा रहा है, कि इस साल भी कम से कम 10 से 15 देशों को ब्रिक्स में शामिल किया जा सकता है और इन ग्रुप में शामिल होने वाले ज्यादातर देशों की विचारधारा इस मुद्दे पर एक है, कि वो किसी भी प्रतिबंध का समर्थन नहीं करते हैं।

फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद से रूसी राष्ट्रपति द्वारा आयोजित अब तक की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय सभा रूस में होने जा रही है, जो अमेरिका के जलन की सबसे बड़ी वजह है।

अमेरिका के जलने की दूसरी सबसे बड़ी वजह ये है, कि ब्रिक्स में शामिल सभी देश ग्लोबल ऑर्डर में बदलाव चाहते हैं, खासकर मॉस्को, बीजिंग और तेहरान जैसे कुछ देश, सीधे संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिम का मुकाबला करना चाहते हैं। जबकि, भारत बराबरी की दोस्ती या भागीदारी चाहता है।

लिहाजा, ये वो संदेश है, जिसे व्लादिमीर पुतिन और करीबी साझेदार और सबसे शक्तिशाली ब्रिक्स देश के नेता शी जिनपिंग इस सम्मेलन में पेश करने वाले हैं।

यानि, अब वो पश्चिमी देश हैं, जो अपने प्रतिबंधों और गठबंधनों के साथ दुनिया में अलग-थलग खड़े हैं, जबकि "वैश्विक बहुमत" देश अमेरिका को अब चौधरी मानने के लिए तैयार नहीं हैं।

शुक्रवार को पत्रकारों को दिए गए बयान में पुतिन ने ब्रिक्स देशों के बढ़ते आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव को एक "निर्विवाद तथ्य" बताया और कहा, कि अगर ब्रिक्स और इच्छुक देश एक साथ काम करते हैं, तो वे "नई विश्व व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण तत्व होंगे", हालांकि उन्होंने इस बात से इनकार किया कि यह समूह "पश्चिम विरोधी गठबंधन" है।

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ब्रिक्स के मंच से अमेरिका को चुनौती?

पुतिन का संदेश इस मंच से और भी मार्मिक होगा, क्योंकि यह बैठक अमेरिकी चुनावों से कुछ ही दिन पहले हो रही है, जहां पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की संभावित जीत से अमेरिका, यूक्रेन के प्रति अपने कट्टर समर्थन को बदल सकता है और इसके अलावा, ट्रंप की संभावित जीत ने अमेरिका के यूरोपीय सहयोगियों की नींदे भी उड़ा दी हैं।

बर्लिन में कार्नेगी रूस यूरेशिया सेंटर के निदेशक एलेक्स गबुएव ने कहा, "यह ब्रिक्स शिखर सम्मेलन वास्तव में (पुतिन के लिए) एक उपहार है। जिसमें संदेश यह होगा, कि आप रूस के वैश्विक अलगाव के बारे में कैसे बात कर सकते हैं जब (ये सभी) नेता ... कज़ान आ रहे हैं।"

गबुएव ने कहा, कि रूस ब्रिक्स को "एक अग्रणी, नए संगठन के रूप में चित्रित करना चाहता है, जो वैश्विक समुदाय के रूप में हम सभी को ज्यादा न्यायपूर्ण व्यवस्था की ओर ले जाता है।" लेकिन रूस की व्यापक बयानबाजी के बावजूद, कजान में मिलने वाले नेताओं के पास कई तरह के दृष्टिकोण और हित हैं। हालांकि, ऑब्जर्वर्स का अभी भी मानना है, कि ब्रिक्स देशों के निजी विचार अलग अलग हैं, लिहाजा पुतिन जो संदेश भेजना चाहते हैं, वो शायद ही भेज पाएं।

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वैश्विक संकट के बीच ब्रिक्स शिखर सम्मेलन

रूस द्वारा आयोजित यह सम्मेलन पिछले साल जोहान्सबर्ग में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से एकदम अलग है, जब पुतिन ने वीडियो स्क्रीन के जरिए वर्चअली भाग लिया था और माना गया, कि यूक्रेन में 'कथित युद्ध अपराधों' के लिए अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय से गिरफ्तारी वारंट से बचने के लिए उन्होंने सम्मेलन में भाग नहीं लिया था।

लेकिन इस साल, रूसी राष्ट्रपति संगठन के आकार में लगभग दोगुना होने के बाद से पहले शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे हैं - और यह सम्मेलन एक बहुत ही अलग वैश्विक परिदृश्य से पहले हो रहा है।

ब्रिक्स मुख्य रूप से आर्थिक सहयोग के लिए तैयार है, पिछले साल इसकी बैठक यूक्रेन में युद्ध की छाया में हुई थी। अब, जबकि वह युद्ध जारी है, मध्य पूर्व में बढ़ता संघर्ष, जहां इजरायल ईरान के प्रॉक्सी से लड़ रहा है, ये तमाम मुद्दे नेताओं की बातचीत पर भी हावी होने की संभावना है।

पिछले हफ्ते पुतिन ने पुष्टि की थी, कि फिलिस्तीनी नेता महमूद अब्बास इस कार्यक्रम में शामिल होंगे। पर्यवेक्षकों का कहना है, कि रूसी नेता और उनके अधिकारी संभवतः संघर्ष का उपयोग करेंगे - और ग्लोबल साउथ में अमेरिका और इजराइल के लिए उसके समर्थन के प्रति गुस्से का इजहार करेंगे।

चीन और रूस दोनों ने बढ़ते संघर्ष में युद्ध विराम का आह्वान किया है और इजराइल की कार्रवाइयों की आलोचना की है, जबकि अमेरिका ने गाजा में हमास और लेबनान में हिज्बुल्लाह जैसे आतंकवादी समूहों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करने के इजरायल के अधिकार का समर्थन किया है।

यूक्रेन युद्ध का प्रस्ताव ब्रिक्स मंच पर आएगा?

अटलांटिक काउंसिल में अबू धाबी स्थित वरिष्ठ गैर-निवासी फेलो जोनाथन फुल्टन ने CNN से कहा है, कि शिखर सम्मेलन में भाग लेने वाले कई लोग, मध्य पूर्व में संघर्ष को "इस बात का एक प्रमुख उदाहरण मानते हैं, कि देशों के इस विशेष समूह को ज्यादा प्रभाव क्यों होना चाहिए।"

पर्यवेक्षक यह भी देखेंगे, कि क्या चीन और ब्राजील इस सभा का उपयोग यूक्रेन में युद्ध पर अपने संयुक्त 'छह-सूत्री शांति प्रस्ताव' को आगे बढ़ाने के लिए एक मंच के रूप में करते हैं, जैसा कि उन्होंने पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में किया था। फिर, यूक्रेनी नेता वोलोडिमिर जेलेंस्की ने इस प्रयास की आलोचना करते हुए कहा था, कि ऐसी योजनाओं से मास्को को मदद मिलेगी, जबकि बीजिंग और ब्रासीलिया को चेतावनी दी: "आप यूक्रेन की कीमत पर अपनी शक्ति नहीं बढ़ाएंगे।"

वहीं, हाल ही में ईरान को ब्रिक्स में शामिल किया जाना - जिसके बारे में कहा जा रहा है, इसने रूस को सैकड़ों ड्रोन, साथ ही कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें (जिससे ईरान ने इनकार किया है) प्रदान की हैं, वो रूस के और करीब आ गया है। इसके अलावा, चीन को लेकर अमेरिका के आरोप हैं, कि वो डबल यूज वाले संदिग्ध मशीनी सामानों की सप्लाई रूस को कर रहा है, जिससे चीन इनकरा करता है।

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भारत ने भी अमेरिका को दिया संदेश

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से ठीक एक दिन पहले भारतीय विदेश मंत्रालय ने चीन के साथ LAC पर सैन्य टकराव खत्म करते हुए ऐतिहासिक समझौते पर पहुंचने की घोषणा की है, जो साफ साफ अमेरिका को संदेश है, कि वो खालिस्तानी आतंकवादियों को लेकर भारत पर जो दबाव बना रहा है, नई दिल्ली उसे बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।

अमेरिका को ये नहीं भूलना चाहिए, कि भारत भविष्य का सुपरपावर है और इंडो-पैसिफिक में बिना भारत के वो चीन का बाल भी बांका नहीं कर सकता है, लिहाजा अमेरिका को अपनी मानसिकता में बदलाव करनी होगी।

भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने कहा है, कि भारत और चीन पूर्वी लद्दाख में वर्षों से चले आ रहे सैन्य गतिरोध को लेकर एक समझौते पर पहुंच गए हैं। मिस्री ने कहा, कि भारत और चीन पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर 'गश्त व्यवस्था' को लेकर एक समझौते पर पहुंच गए हैं।

मिस्री ने कहा, "पिछले कई हफ्तों में हुई चर्चाओं के बाद, भारतीय और चीनी राजनयिक और सैन्य वार्ताकार विभिन्न मंचों पर एक-दूसरे के साथ नजदीकी से संपर्क में रहे हैं और इन चर्चाओं की वजह से, भारत-चीन सीमा क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर गश्त व्यवस्था पर एक समझौता हुआ है, जिससे 2020 में इन क्षेत्रों में उठे मुद्दों का समाधान हो गया है।"

भारत और चीन के बीच सैन्य तनाव टलने के बाद अब साफ हो गया है, कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच मुलाकात हो सकती है।

डॉलर का काम तमाम?

इसके अलावा, पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहे रूस से उम्मीद की जा रही है कि वह आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में अपने सहयोगियों को वैश्विक भुगतान के लिए डॉलर के विकल्प को अपनाने के लिए राजी कर लेगा, जो डॉलर के लिए बहुत बड़ा झटका होगा। रूस यह दिखाने की कोशिश करेगा, कि वह खुद को अलग-थलग करने के पश्चिमी एजेंडे से अछूता है, और समूह के अन्य सदस्यों को वैश्विक वित्तीय प्रणाली में सुधार के लिए राजी करेगा।

अमेरिका और पश्चिमी देश उसे ग्लोबल ट्रांजेक्शन सिस्टम से बाहर कर चुके हैं, जिसकी वजह से रूस के लिए डॉलर में कारोबार करना मुश्किल हो गया है और वो एक नया व्यवस्था बनाना चाहता है। और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को उम्मीद है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पश्चिम के प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए उनके पास समर्थन है।

उन्होंने कहा है, कि "मुझे पूरा विश्वास है कि एकजुट होकर काम करके हम अर्थव्यवस्था, निवेश, प्रौद्योगिकी और मानव पूंजी में अपने देशों की क्षमता को पूरा करने में सक्षम होंगे, वैश्विक विकास पर ब्रिक्स के सकारात्मक प्रभाव को मजबूत करेंगे और दुनिया को अधिक सुरक्षित और सामंजस्यपूर्ण बनाएंगे।"

प्रतिबंधों ने रूस के लिए किसी भी तरह का लेनदेन करना काफी मुश्किल बना दिया है और भारत, चीन जैसे देश भी डॉलर पर अपनी निर्भरता खत्म करना चाहते हैं।

मॉस्को को उम्मीद है, कि डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए उसकी नई वित्तीय प्रणाली एक विकल्प प्रदान करेगा। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि कितने देश स्पष्ट रूप से विकल्प का समर्थन करते हैं। लेकिन, अगर नई वित्तीय प्रणाली पर सहमति बनती है, तो डॉलर एक बड़े बाजार से हाथ धो सकता है।

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