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जानिए कैसे अफगानिस्तान पर हुआ तालिबान का कब्जा, क्यों अमेरिका ने बना डाला इसे आतंकी देश

नई दिल्ली, 05 जुलाई। दशकों तक अफगानिस्तान दुनिया के सबसे ताकतवर देशों के लिए अपनी ताकत दिखाने की प्रयोगशाला बना हुआ था। 9/11 के बाद जिस तरह से अमेरिका की सेना ने दोबारा यहां कदम रखा उसके बाद माना जा रहा था कि यहां हालात बेहतर हो सकते हैं, लेकिन ऐसा हो नहीं सका। फिलहाल अफगानिस्तान में अभी के हालात यह हैं कि तालिबान ने कंधार, काबुल समेत पूरे अफगानिस्तान पर नियंत्रण कर लिया है। अमेरिका द्वारा प्रशिक्षित सैनिक यहां से जान बचाकर भाग रहे हैं और ये लोग तजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान में जान बचाने के लिए छिप रहे हैं। यहां तक कि अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी भी देश छोड़कर चले गए हैं।

सेना को हटाने में अमेरिका की बड़ी गलती

सेना को हटाने में अमेरिका की बड़ी गलती

अगर अफगानिस्तान की कुल आबादी 3.80 करोड़ है, जिसमे से 60-70 हजार ही लोग तालिबान की सेना में शामिल हैं। तालिबान की ताकत इस समय इसलिए भी बहुत बढ़ गई है क्योंकि अमेरिका ने अफगानिस्तान छोड़ते समय अपने पुराने हथियार, गाड़िया, टैंक आदि यहीं छोड़ दिए क्योंकि यह मौजूदा अमेरिका के वर्ल्ड स्टैंडर्ड के हिसाब से नहीं थे। यही वजह है कि तकरीबन 700 ट्रक, हथियार, टैंक आदि तालिबान के कब्जे में है। इसकी मदद से ये लोग लगातार शहरों पर कब्जा करते हुए पूरे अफगानिस्तान पर नियंत्रण हासिल कर चुके हैं। अमेरिका ने जिन अफगानिस्तान के सैनिकों को प्रशिक्षण दिया था, वो अब अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे हैं या फिर तालिबान के सामने आत्मसमर्पण कर रहे हैं। आत्मसमर्पण के बाद तालिबान इन लोगों के हथियार अपने कब्जे में ले लेता है।

अफगानिस्तान की संरचना

अफगानिस्तान की संरचना

अफगानिस्तान की संरचना की बात करें यहां मुख्य रूप से आदिवासी रहते हैं और यहां 80-90 फीसदी इलाका पहाड़ी इलाका है। अफगानिस्तान में पश्तून की आबादी सबसे ज्यादा है। पाकिस्तान में भी बड़ी संख्या में पश्तून रहते हैं। लेकिन दो देशों के पश्तूनों को अलग करने का काम ब्रिटेन की सरकार ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच डूरंड लाइन खींचकर किया था। दरअसल ब्रिटेन नहीं चाहता था कि पश्तून एकजुट हो जाएं, लिहाजा दोनों को बांट दिया और एक बार फिर से फूट डालो और राज करों की नीति को अपनाया गया। जिसके चलते पश्तून आबादी का एक हिस्सा पाकिस्तान में और दूसरा हिस्सा अफगानिस्तान में चला गया।

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    अफगानिस्तान में सिर्फ अफगानिस्तानी ही राज कर सकते हैं

    अफगानिस्तान में सिर्फ अफगानिस्तानी ही राज कर सकते हैं

    जिस तरह का भू-भाग अफगानिस्तान का है वह किसी भी दूसरे देश के लिए काफी चुनौतीपूर्ण है। यहां किसी भी दूसरे देश से आगे लोगों के गुजर-बसर करना काफी मुश्किल क्योकि यहां अधिकतर भू-भाग पहाड़ी है, समतल जमीन की बहुत अधिक कमी है। यहां 80-90 फीसदी आबादी गांव में रहती थी। यहां खेती करना भी संभव नहीं है, लिहाजा अफगानिस्तान में अफगानिस्तान के लोग ही राज कर सकते हैं। अफगानिस्तान में बड़ी मात्रा में अफीम की खेती होती है, यहां बड़ी मात्रा में प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं, जिसके चलते अमेरिका और सोवियत यूनियन ने यहां अपना दखल दिया।

    अफगानिस्तान का इतिहास

    अफगानिस्तान का इतिहास

    प्रथम एंग्लो-अफगान युद्ध में अंग्रेजों को हार का मुंह देखना पड़ा था, दूसरे एंग्लो अफगान युद्ध में ब्रिटेन को जीत मिली और अफगानिस्तान के कुछ हिस्से पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया। लेकिन तीसरे एंग्लो-अफगान युद्ध में ब्रिटेन ने अफगानिस्तान को आजाद कर दिया। इसके बाद यहां राजा-महाराजा का शासन चलने लगा। राजा जाहिर शाह 1933 से 1973 तक अफगानिस्तान में शासन किया। 1973 में जाहिर शाह के चचेरे भाई मोहम्मद दाऊद खान ने तख्ता पलटकर शासन अपने हाथ में ले लिया। दाऊद खान को पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ अफगानिस्तान पार्टी ने मदद की। पीडीपीए को लेफ्ट पार्टी के तौर पर जाना जाता था।

    पीडीपीए का गठन

    पीडीपीए का गठन

    पीडीपीए का गठन 1965 में हुआ था, इसका गठन मुख्य रूप से गरीबों की स्थिति को सुधार के लिए हुआ था। मध्य एशिया के कई देशों में 1960 के दशक में पिछड़ों और गरीबों के लिए आंदोलन हो रहे थे। इसी आंदोलन के बीच अफगानिस्तान में भी इस पार्टी का गठन किया गया। पार्टी का गठन नूर मोहम्मद ताकी, बरबक कर्माल, हाफिजउल्लाह आमीन। पीडीपीए के दो मुख्य गुट थे, पहला परचम जोकि राष्ट्रवादी गुट था और इसे अमीर और मध्य वर्ग के लोगों का समर्थन प्राप्त था। दूसरा गुट खल्क गुट था जिसे ग्रामीण समर्थन था, अहम बात यह है कि अफगानिस्तान में 80-90 फीसदी लोग ग्रामीण इलाकों में रहते थे। खल्क गुट कट्टर था, जिसे सोवियत संघ का समर्थन प्राप्त था।

    तख्ता पलट का दौर

    तख्ता पलट का दौर

    मोहम्मद दाऊद खान पश्तूनों को एकजुट करने की नीति से अलग हो गए, जिससे पीडीपीए नाराज हो गया। जिसके बाद अप्रैल 1978 ट्रेड यूनियन लीडर की हत्या कर दी गई। माना जाता है कि दाऊद खान का इस हत्या के पीछे हाथ था। नूर मोहम्मद ताकी, हाफिजउल्ला, बरबक को घर में ही नजरबंद कर दिया गया। जिसके बाद एक बार फिर से अफगानिस्तान में तख्ता पलट की योजना तैयार होने लगी। पीडीपीए ने देश की सेना को अपने पक्ष में किया और तख्ता पलट किया गया। सेना ने मोहम्मद दाऊद को घर से निकालकर मार दिया। पीडीपीए और सेना तकरीबन 250 टैंक लेकर मोहम्मद दाऊद के घर पहुंची थी, जिसके बाद देश में तख्ता पलट हुआ।

    सुधारों का विरोध, अफगानिस्तान में सोविय संघ की सेना का प्रवेश

    सुधारों का विरोध, अफगानिस्तान में सोविय संघ की सेना का प्रवेश

    पीडीपीए के सत्ता में आने के बाद परचम और खल्क एक बार फिर से अलग हो गए। पीडीपीए गरीबों को जमीन देने का काम शुरू किया गया। महिलाओं को अधिकार दिए गए। शिक्षा पर जोर दिया गया, विवाह व्यवस्था में सुधार, कृषि सुधार, स्वास्थ्य व्यवस्था आदि में सुधार किए गए। लेकिन तकरीबन 90 फीसदी आबादी के अशिक्षित होने की वजह से लोग इन सुधारों के पक्ष में नहीं थे, लोगों को लग रहा था कि यह हमारी संस्कृति के खिलाफ है। लोगों ने विरोध करना शुरू कर दिया। इस विरोध के खिलाफ पीडीपीए को सोवियत संघ का समर्थन मिला। लोगों के विरोध के बाद पीडीपीए के दो गुट परचम और खल्क में विरोध शुरू हो गया। हाफिजउल्ला आमीन ने नूर मोहम्मद ताराकी की हत्या करवा दी। 1979 में हाफिज उल्ला अफगानिस्तान के राष्ट्रपति बन गए। हाफिज को और भी ज्यादा कट्टर और पागल नेता माना जाता था, यही वजह है कि सोवियत ने हाफिज उल्ला की हत्या करवा दी।

    अफगान युद्ध

    अफगान युद्ध

    आखिरकार कमल बरबाक देश के नेता बने। 1979 में अफगानिस्तान में स्थिरता लाने के लिए सोवियत संघ ने सेना भेज दी। जिसके बाद अफगानिस्तान के लोग पीडीपीए और सोवियत संघ के खिलाफ विरोध करने लगे और अफगानिस्तान में अफगान युद्ध शुरू हो गया, यह युद्ध 1979 से 1989 तक चला। अफगानिस्तान में सोवियत संघ की सेना पहुंचने के बाद अमेरिका पीडीपीए और सोवियत संघ के खिलाफ लड़ रहे मुजाहिद्दीन को अमेरिका ने समर्थन करना शुरू कर दिया। अमेरिका के अलावा पाकिस्तान, चीन, ब्रिटेन ने इन लोगों का समर्थन शुरू कर दिया, जिसके बाद सोवियत संघ ने 1989 में अपनी सेना को वापस बुला लिया।

    अफगानिस्तान में अमेरिका की एंट्री- ऑपरेशन साइक्लोन 1979-89

    अफगानिस्तान में अमेरिका की एंट्री- ऑपरेशन साइक्लोन 1979-89

    यह वह दौर था जब अमेरिका और सोवियत संघ के बीच विश्व शक्ति बनने की होड़ चल रही थी। चूंकि अफगानिस्तान में सोवियत संघ की एंट्री हो चुकी थी,लिहाजा अमेरिका ने भी यहां दखल देने का फैसला लिया। कई प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर अफगानिस्तान में अमेरिकी सीधी एंट्री नहीं ले सकता था,लिहाजा अमेरिका ने अपरोक्ष तौर पर यहां प्रवेश किया।अमेरिका अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन का सिद्धांत था कि वह अफगानिस्तान को आर्थिक मदद देंगे जिससे कि अर्थव्यवस्था बेहतर हो और सेना को मजबूत करने के लिए पैसा दिया जाए और हथियार मुहैया कराया जाए। रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका ने तकरीबन एक लाख मुजाहिदों को ट्रेनिंग दी थी। गौर करने वाली बात है कि पाकिस्तान की आईएसआई जोकि अफगानिस्तान के मुजाहिदों का समर्थन कर रही थी, उसके जरिए अमेरिका ने इन मुजाहिदों को ट्रेनिंग मुहैया कराई। अमेरिका पाकिस्तान को आर्थिक मदद भेजता था जिसका इस्तेमाल अफगानिस्तान में मुजाहिदों को मजबूत करने के लिए किया गया। शुरुआत में अमेरिका ने 5 लाख डॉलर से आर्थिक मदद की शुरुआत की थी, लेकिन 1980 के बाद इस राशि को बढ़ाकर तकरीबन 20-30 मिलियन डॉलर हर साल भेजा जाने लगा। 1987 तक इस राशि को बढ़ाकर 630 मिलियन डॉलर तक पैसा यहां भेजा जाने लगा।

    1996 से 2001 तक अफगानिस्तान में तालिबान का शासन

    1996 से 2001 तक अफगानिस्तान में तालिबान का शासन

    सऊदी अरब के कई युवा, वॉलंटियर भी अफगानिस्तान का समर्थन करने लगे। सऊदी अरब के ही एक अमीर परिवार से ताल्लुक रखने वाले ओसामा बिन लादेन ने अफगानिस्तान पहुंचकर अल कायदा की स्थापना की। यही नहीं जैश ए मोहम्मद, हक्कानी नेटवर्क समेत तमाम आतंकी संगठन अफगानिस्तान में पनपने लगे। इन्हीं मुजाहिदों न मिलकर तालिबान का गठन किया। मुजाहिद सीध तौर पर बिना हथियार की वजह से सोवियत के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ पा रहे थे। जिसके बाद अमेरिका इन लोगों को मिसाइल-हथियार आदि मुहैया कराए। सोवियत के अफगानिस्तान से जाने के बाद अमेरिका मुजाहिदों ने अमेरिका के निर्देश पर चलने से इनकार कर दिया, यही वजह है कि अमेरिका ने यहां फंडिंग भी बंद कर दी और 1996 से लेकर 2001 तक यहां तालिबान का अफगानिस्तान पर कब्जा रहा।

    क्या है तालिबान

    क्या है तालिबान

    वर्ष 1994 में तालिब शब्द से बना तालिबान संगठन बना। तालिब शब्द का मतलब होता है धार्मिक छात्र। पश्तूनों, मदरसों-धार्मिक संस्थान में पढ़ने वाले छात्र और सैनिकों ने इस संगठन से जुड़ना शुरू किया। दो साल के भीतर तालिबान ने पूरे अफगानिस्तान में अपना नियंत्रण कर लिया और मुल्ला मोहम्मद उमर इसका सुप्रीम लीडर बना। रिपोर्ट के अनुसार 2013 में टीबी से मर गया था। 1996 में मुल्ला मोहम्मद उमर ने 50 लोोगं के साथ मिलकर तालिबान का गठन किया था। वह अफगानिस्तान में शरिया कानून लगा करना चाहता था। तालिबान को पूरे अफगानिस्तान से समर्थन मिलने लगा और तालिबान गुट बड़ा होने लगा और 15000 से अधिक लोगों ने तालिबान का हाथ थाम लिया। तालिबान की रणनीति थी कि पहले बड़े शहरों पर कब्जा करो। 1996 से 2001 तक तालिबान का पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा था।

    तालिबाना का क्रूर शासन

    तालिबाना का क्रूर शासन

    तालिबान के शासन में औरतों पर सबसे ज्यादा अत्याचार हुए। औरतें बिना किसी मर्द के सार्वजनिक जगह पर नहीं जा सकती थीं, उन्हें तेज आवाज में बात नहीं करने की अनुमति थी, उन्हें खुले में बिना बुर्के के घुमने पर पाबंदी थी, किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में नहीं जा सकती थी,जिससे कई औरतें अवसाद में चली गईं। औरतों की शिक्षा बंद कर दी गई, तकरीबन 8-9 हजार महिला शिक्षकों को नौकरी से हटा दिया गया, सभी जगहों पर महिला कर्मचारियों को नौकरी से हटा दिया गया। खेल, संगीत मनोरंजन आदि पर पाबंदी थी। पश्चिमी सभ्यता, कपड़े आदि पर पाबंदी थी। अफगानिस्तान की जमीन आतंकियों के लिए पनाहगार बन गया था। यहां अल कायदा, जैश, हक्कानी जैसे आतंकी संगठन यहां पनपे। ओसामा बिन लादेन जोकि सऊदी अरब के अमीर परिवार से ताल्लुक रखता था वो भी अफगानिस्तान पहुंचा और उसने यहां अल कायदा जैसे आतंकी संगठन की शुरुआत की और उसी ने अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर प्लेन से हमले को अंजाम दिया था।

    9/11 के बाद फिर से अफगानिस्तान में लौटी अमेरिकी सेना

    9/11 के बाद फिर से अफगानिस्तान में लौटी अमेरिकी सेना

    तालिबान ने अफगानिस्तान में कट्टर कानून लागू किए। लेकिन जब 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर अल कायदा ने हमला किया तो एक बार फिर से अमेरिका ने अफगानिस्तान सेना भेजी। 2010 तक अमेरिका ने अफगानिस्तान में तकरीबन एक लाख सैनिकों को भेज दिया था। लेकिन बावजूद इसके अमेरिका को यहां हार का मुंह देखना पड़ा। 2014 तक अफगानिस्तान ने सैन्य ऑपरेशन बंद कर दिया। हालांकि अमेरिका ने तालिबान को शहरों से खदेड़ दिया लेकिन ये गांव में बसे थे। अवैध अफीम के व्यापार से तालिबानियों को कभी पैसों की कमी नहीं हुई। चूंकि अफगानिस्तान मुख्य रूप से पहाड़ी इलाका है और यहां समतल इलाके बहुत कम है और यहां के रास्तों के बारे में तालिबानियों को काफी अच्छे से पता था, यही वजह है कि ये लोग गुरिल्ला युद्ध लड़ते थे और अमेरिका के कई सैनिकों को मार देते थे। आकंड़ों के अनुसार अमेरिका के तकरीबन 4500 सैनिक अफगानिस्तान में मारे जा चुके हैं।

    2014 से अमेरिका में अमेरिका ने खत्म कर दिया था सैन्य ऑपरेशन

    2014 से अमेरिका में अमेरिका ने खत्म कर दिया था सैन्य ऑपरेशन

    बराक ओबामा के शासन काल में अमेरिका में यह आवाज उठने लगी कि हम अफगानिस्तान के आंतरिक मसलों में क्यों अपने सैनिकों को गंवा रहे हैं जिसके बाद डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि हम अपने सैनिकों को अफगानिस्तान से वापस बुला लेंगे। 2014 में अमेरिका ने सारे सैन्य ऑपरेशन बंद कर दिए और अफगानिस्तान की सेना को नियंत्रण दे दिया गया। हालांकि अमेरिका ने तालिबान को शहरों से खदेड़ दिया लेकिन वह उन्हें हराने में कामयाब नहीं हुए। जिसके बाद अमेरिका को यह समझ आ गया कि वह तालिबानियों को हरा नहीं सकते तो अमेरिका ने तालिबान के साथ शांति समझौता करने का फैसला लिया। 29 फरवरी 2020 को अमेरिका ने तालिबान के साथ कतर के दोहा में शांति समझौता किया।

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