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कैसे-कैसे जहर का शिकार बन रहे हैं शिकारी पक्षी

नई दिल्ली, 31 अगस्त। भले ही बाज और गिद्धों की आबादी बढ़ने की कुछ अच्छी खबरें पिछले कुछ समय में सुनाई देती रही हों, ये शिकारी पक्षी अपने वजूद के संकट से जूझ रहे हैं. एक ताजा अध्ययन में पता चला है कि दुनियाभर में शिकारी बाज, चील और गिद्धों की आबादी तेजी से घट रही है.

Provided by Deutsche Welle

इंटरनेशनल यूनियन फॉर द कंजरवेशन ऑफ नेचर और बर्डलाइफ इंटनेशनल के एक विश्लेषण में पता चला है कि शिकारी पक्षियों की 557 प्रजातियों में से 30 प्रतिशत खतरे में हैं. 18 प्रजातियां ऐसी हैं जो बहुत ज्यादा खतरे में हैं. इनमें फिलीपाइन ईगल और ऐनोबोन उल्लू जैसे पक्षी शामिल हैं.

नहीं बचे प्राकृतिक आवास

शोधकर्ताओं में शामिल जेरार्डो सेबालोस के मुताबिक ऐसी कई प्रजातियां हैं जो स्थानीय स्तर पर विलुप्त हो रही हैं यानी उन जगहों के पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी कोई भूमिका नहीं रह गई है. सेबालोस एक पक्षी विज्ञानी हैं और नेशनल ऑटोनॉमस यूनिवर्सिटी ऑफ मेक्सिको में काम करते हैं. वह इस अध्ययन के लेखकों में से एक हैं, जो जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल अकैडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित हुआ है.

मिलिए, 11 अद्भुत पक्षियों से

सेबालोस कहते हैं, "सुनहरी बाज मेक्सिको का राष्ट्रीय पक्षी है. लेकिन मेक्सिकों में अब बहुत कम सुनहरी बाज बचे हैं." 2016 में हुई गणना का अनुमान था कि मेक्सिको में 100 से भी कम ऐसे जोड़े बचे हैं जो नए बच्चे पैदा कर सकें.

कभी ये बाज दक्षिणी मेक्सिको के अलावा मध्य और दक्षिण अमेरिका में भी दूर-दूर तक पाए जाते थे. लेकिन पेड़ों की कटाई के चलते इनकी आबादी में भारी कमी देखी गई है.

कई तरह के खतरे

जिन प्रजातियों पर विलोप का खतरा मंडरा रहा है उनमें से ज्यादातर ऐसे हैं जो दिन में सक्रिय रहते हैं. और शोध कहता है कि उनकी आबादी में 54 प्रतिशत की कमी हुई है. रात के वक्त सक्रिय रहने वाले शिकारी पक्षियों जैसे उल्लू आदि 47 फीसदी कम हो गए हैं.

नॉर्थ टेक्सस यूनिवर्सिटी के जीव विज्ञानी जेफ जॉनसन के मुताबिक इसका अर्थ है कि पक्षियों की आबादी को प्रभावित कर रहे कारणों को दूर नहीं किया गया है और फौरन इस ओर ध्यान दिए जाने की जरूरत है. स्मिथसोनियन माइग्रेटरी बर्ड सेंटर में शोध सहायक इवान ब्यूशले कहते हैं कि दुनियाभर में ये पक्षी अपने प्राकृतिक आवास के कम होने के संकट से जूझ रहे हैं.

जानेंः कौन से पक्षी निभाते हैं जीवनभर साथ

जहरीले रसायन डीडीटी का असर बाज के अंडों पर पड़ता था. इस कारण उत्तर अमेरिका में बाज लगभग खत्म हो गए थे. 1972 में अमेरिका ने डीडीटी पर प्रतिबंध लगा दिया था. लेकिन ब्यूशले कहते हैं कि और बहुत सारे खतरे अब भी बाकी हैं जिनमें चूहों को मारने के लिए इस्तेमाल होने वाला जहर, शिकारियों की गोलियां आदि शामिल हैं. बहुत सारे शिकारी पक्षी चूहों और मरे हुए जानवरों को खाते हैं.

अर्जन्टीना की कोमाहुए नेशनल यूनिवर्सिटी में जीव विज्ञानी सर्गियो लैम्बर्टुची कहते हैं कि ऐंडियन गिद्ध की आबादी कीटनाशकों, लेड और अन्य जहरीले रसायनों के कारण घट रही है. दक्षिण एशिया में भी रसायनों के बढ़ते इस्तेमाल ने शिकारी पक्षियों की आबादी को प्रभावित किया है. कुछ पक्षियों की संख्या तो 95 प्रतिशत तक कम हो गई है.

वीके/एए (एपी)

Source: DW

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