तालिबान पर पाकिस्तान को बड़ी डिप्लोमेटिक जीत? चीन और रूस के बाद ब्रिटेन ने किया इमरान खान का समर्थन!

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने साफ तौर पर कहा है कि अफगानिस्तान की बेहतरी के लिए वो तालिबान के साथ काम करने के लिए तैयार हैं।

लंदन/इस्लामाबाद, अगस्त 21: अंतर्राष्ट्रीय मान्यता लेने की कोशिश में लगे तालिबान को आने वाले दिनों में वैश्विक स्तर पर बड़ी कामयाबियां मिल सकती हैं और पूरी दुनिया से ऐसे संकेत मिलने लगे हैं कि तालिबान उनके लिए 'अछूत' रहने वाला नहीं है। पाकिस्तान लगातार तालिबान को मान्यता दिलाने की लिए अलग अलग देशों से संपर्क साध रहा है और एक दिन पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन और जर्मनी की चांसलर एंजला मर्केल से बात की थी और ब्रिटेन की तरफ से जो बयान आया है, उससे पता चलता है कि बोरिस जॉनसन इमरान खान की बात मान सकते हैं।

ब्रिटिश पीएम ने क्या कहा?

ब्रिटिश पीएम ने क्या कहा?

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने शुक्रवार को कहा कि अफगानिस्तान पर 'आतंकवादियों' के कब्जे के बाद यदि आवश्यक होगा तो ब्रिटेन तालिबान के साथ काम करेगा। इसके साथ ही बोरिस जॉनसन ने अपने विदेश मंत्री का बचाव किया, जो अफगानिस्तान में स्थिति खराब होने के बाद लोगों के निशाने पर आ गये थे। ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि, ''मैं लोगों को आश्वस्त करना चाहता हूं कि तालिबान के साथ काम करते हुए अफगानिस्तान के लिए एक समाधान खोजने के हमारे राजनीतिक और कूटनीतिक प्रयास निश्चित रूप से जारी रहेंगे।"

ब्रिटिश नागरिकों को निकाला बाहर

ब्रिटिश नागरिकों को निकाला बाहर

वहीं, बोरिस जॉनसन ने कहा कि, ''काबुल हवाई अड्डे पर जो स्थिति बनी थी और हजारों अफगान जो पलायन की कोशिश कर रहे थे, अब उनकी स्थिति में सुधार आया है और पहले के मुकाबले स्थिति बेहतर हो रही है।'' ब्रिटिश सरकार ने कहा कि, उसने शनिवार से 1,615 लोगों को सुरक्षित निकाला है, जिसमें 399 ब्रिटिश नागरिक और उनके आश्रित, 320 दूतावास कर्मचारी और 402 अफगान शामिल हैं। आपको बता दें कि अफगानिस्तान में स्थिति खराब होने के बाद अमेरिका के साथ साथ ब्रिटेन की भी जमकर आलोचना की जा रही है और ब्रिटेन के विदेश मंत्री की इस्तीफे की मांग की जा रही है।

पाकिस्तान की डिप्लोमेटिक जीत?

पाकिस्तान की डिप्लोमेटिक जीत?

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने साफ तौर पर कहा है कि अफगानिस्तान की बेहतरी के लिए वो तालिबान के साथ काम करने के लिए तैयार हैं, जिसका मतलब यही निकलता है कि तालिबान को विदेशी सरकारों के कड़े रूख का सामना नहीं करना पड़ रहा है। वहीं, पाकिस्तान लगातार इस कोशिश में है कि वो जल्द से जल्द तालिबान को मान्यता दिलाए और फिर खुद पाकिस्तान भी तालिबान राज को मान्यता दे। पाकिस्तान खुद पहले मान्यता देकर जल्दबाजी नहीं करना चाहता है, लिहाजा वो चीन और रूस के साथ भी लगातार बात कर रहा है। एक दिन पहले जब पाकिस्तान के प्रधनमंत्री इमरान खान ने बोरिस जॉनसन से बात की थी, तो उन्होंने अफगानिस्तान संकट को सुलझाने के अलावा अफगानिस्तान को आर्थिक मदद देने की भी गुहार लगाई थी और अब जब ब्रिटेन के पीएम ने अफगानिस्तान की बेहतरी के लिए तालिबान के साथ काम करने की बात की है, तो निश्चित तौर पर तालिबान के लिए पाकिस्तान की डिप्लोमेटिक जीत माना जाएगा।

तालिबान की तरफ नरम चीन

तालिबान की तरफ नरम चीन

चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी की मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने चीन के लोगों को कहा है कि तालिबान एक असलियत और उसे स्वीकार करने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए। ग्लोबल टाइम्स ने कहा है कि ''चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी को इस्लामिक चरमपंथी संगठन को मान्यता देने में हिचकिचाना नहीं चाहिए''। चीन की सरकारी मीडिया ने पिछले दिनों एक के बाद एक कई आर्टिकिल अफगानिस्तान को लेकर प्रकाशित की है, जिसमें कहा गया है कि तालिबान को मान्यता नहीं देना चीन की विदेश नीति के लिए अच्छा नहीं होगा। इसके साथ ही ग्लोबल टाइम्स में चीन के विदेश मंत्री वांग यी को तालिबान के साथ कंधा से कंधा मिलाकर खड़ा दिखाया गया था। वहीं, तालिबान ने भी चीन को अफगानिस्तान के पुननिर्माण में योगदान देने का न्योता दिया है, ऐसे में माना जा रहा है कि चीन जल्द ही तालिबान शासन को मान्यता दे सकता है।

रूस को मान्यता देने में दिक्कत नहीं

रूस को मान्यता देने में दिक्कत नहीं

चीन ने साफ कर दिया है कि उसे तालिबान को मान्यता देने में कोई दिक्कत नहीं है, तो रूसी राष्ट्रपति भवन क्रेमलिन को भी तालिबान को मान्यता देने में दिक्कत नहीं है। एक तरफ जहां भारत, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्रिटेन और ईरान समेत कई देश अपने राजनयिको को काबुल से निकालने में लगे हैं, वहीं रूस ने साफ कर दिया है कि वो काबुल का दूतावास बंद नहीं करेगा और रूसी अधिकारी काबुल में ही रहेंगे। पाकिस्तान ने भी ऐसा ही किया है। वहीं, रूसी राज्य मीडिया ने कहा है कि, तालिबान का निर्माण तब हुआ था, जब अफगानिस्तान से रूस की सेना वापस आ गई थी और तालिबान ने वादा किया है कि वो राजनयिकों को नुकसान नहीं पहुंचाएगा और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। समाचार एजेंसी एपी ने तालिबान के राजनीतिक कार्यालय के प्रवक्ता सुहैल शाहीन के हवाले से रूसी समाचार एजेंसी तास को बताया कि, 'तालिबान के 'रूस के साथ अच्छे संबंध' हैं और 'रूसी और अन्य दूतावासों के कामकाज के लिए सुरक्षित स्थिति सुनिश्चित करना तालिबान की सामान्य नीति' है।

तुर्की और ईरान का तालिबान पर रूख

तुर्की और ईरान का तालिबान पर रूख

तालिबान और तुर्की के संबंध अभी तक अच्छे नहीं रहे हैं। तुर्की के राष्ट्रपति लगातार तालिबान की आलोचना करते रहे हैं और तालिबान तुर्की को काबुल एयरपोर्ट से अपनी सेना जल्द हटाने के लिए धमकाता रहा है। लेकिन, अब तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोगन ने कहा है कि, तालिबान के देशव्यापी हमले के बीच शरणार्थी संकट को रोकने के लिए उनका देश पाकिस्तान के साथ अफगानिस्तान में स्थिरता के लिए काम करेगा। यानि, तुर्की भी तालिबान को मान्यता देने के पक्ष में दिख रहा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान लगातार तुर्की और तालिबान के बीच में समझौता करवा रहे है। तुर्की के राष्ट्रपति ने इसी हफ्ते कहा कि 'अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता लाने के लिए पाकिस्तान के पास एक 'महत्वपूर्ण कार्य' है, और अफगानिस्तान में शांति स्थापना के लिए तुर्की-पाकिस्तानी सहयोग की आवश्यकता होगी।'' वहीं, ईरान ने अपने सभी राजनयिकों को अफगानिस्तान से बाहर निकाल लिया है। ईरानी विदेश मंत्रालय ने रविवार को कहा है कि काबुल दूतावास में उसके एक भी कर्मचारी नहीं है।

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