कैंसर के इलाज को आसान बनाने में मिली बड़ी सफलता

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वैज्ञानिकों ने आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल से पता लगाया है कि कैंसर कैसे बढ़ता है.

इससे डॉक्टरों को मदद मिलेगी कि वो मरीज़ों के लिए सबसे प्रभावशाली इलाज कैसे शुरू करें.

लंदन के इंस्टिट्यूट ऑफ़ कैंसर रिसर्च (आईसीआर) और यूनिवर्सिटी ऑफ़ एडिनबर्ग की टीम ने मिलकर एक नई तकनीक की खोज की है- रिवॉल्वर (रिपीटेड इवोल्यूशन ऑफ़ कैंसर)

कैंसर के दौरान डीएनए में आए बदलावों के पैटर्न को ये तकनीक रिकॉर्ड करती है और इस जानकारी को भविष्य में होने वाले अनुवांशिक बदलावों को समझने के लिए इस्तेमाल करती है.

शोधकर्ताओं का कहना है कि ट्यूमर में लगातार आते बदलाव कैंसर के इलाज में एक बड़ी चुनौती थी. एक कैंसर 'ड्रग रेसिस्टेंट' हो सकता है यानी कैंसर पर दवाई का असर बंद हो जाता है.

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स्तन कैंसर

हालांकि, अगर डॉक्टर ये पता लगा सकें कि ट्यूमर कैसे विकसित होगा तो वो इसके बढ़ने से पहले ही या इसके ड्रग रेसिस्टेंट होने से पहले ही इलाज शुरू कर सकते हैं.

टीम को ट्यूमर में बार-बार आने वाले परिवर्तनों और कैंसर से बच जाने के बीच भी संबंध मिला है.

इस तकनीक से डीएनए परिवर्तन के दोहराव का पैटर्न, कैंसर का पता लगाने में मदद कर सकता है और फिर इलाज भी उसी के मुताबिक़ होगा.

उदाहरण के तौर पर, शोधकर्ताओं को पता चला कि जैसे ब्रेस्ट ट्यूमर में ट्यूमर को रोकने वाले पी53 प्रोटीन की जीन में चूक होती है जिसके बाद क्रोमोज़ोम 8 में बदलाव होते हैं तो ऐसे मरीज़ कम बच पाते हैं.

रिसर्च टीम ने एक नई मशीनी तकनीक बनाई है जो एक जैसे मरीज़ों के ट्यूमर की जानकारी बताती है.

शोधकर्ताओं ने फेफड़ों, स्तन, गुर्दे और आंतों के कैंसर के लिए पिछले अध्ययनों के 178 रोगियों के 768 ट्यूमर सैंपल का इस्तेमाल किया और प्रत्येक ट्यूमर के डेटा का इस्तेमाल कैंसर का पता लगाने और हर कैंसर के परिवर्तनों की तुलना करने के लिए किया.

पैटर्न का पता लगाकर और उसे कैंसर बायोलॉजी पर उपलब्ध जानकारी से जोड़कर वैज्ञानिक ट्यूमर के विकास का पता लगा सकते हैं.

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कैंसर का ट्रंप कार्ड

ये रिसर्च 'जरनल नेचर मेथड़स' में प्रकाशित हुआ है.

इस रिसर्च टीम के प्रमुख डॉक्टर एंड्रिया सोट्टोरिवा ने बताया कि इस तकनीक से उम्मीद है कि डॉक्टर कैंसर के 'ट्रंप कार्ड' को हटाने में कामयाब हो जाएंगे यानी अब तक कैंसर किस तरह बढ़ेगा ये मालूम करना मुश्किल था.

उन्होंने कहा, "इस तकनीक से भविष्य में थोड़ा झांकने में मदद मिलेगी और कैंसर की शुरुआती स्टेज पर ही हस्तक्षेप कर सकते हैं. पता लगा सकते हैं कि कैंसर में आगे क्या होने वाला है."

इंस्टीट्यूट ऑफ़ कैंसर रिसर्च के प्रोफ़ेसर पॉल वर्कमैन ने कहा, "कैंसर का विकास हमारे लिए इसके इलाज में सबसे बड़ी चुनौती थी"

"अगर हम पहले ही पता लगा सकें कि ट्यूमर कैसे बढ़ेगा तो ड्रग रेसिस्टेंस होने से पहले ही हम इलाज में ज़रूरी बदलाव कर सकते हैं यानी कैंसर से एक क़दम आगे रहे सकते हैं."

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