Bashar al-Assad: डॉक्टर से क्रूर डिक्टेटर: बशर अल-असद के अर्श से फर्श तक पहुंचने की कहानी
Bashar al-Assad Story: साल 2002 से पहले शायद ही कोई बशर अल-असद को एक क्रूर तानाशाह कह सकता था, क्योंकि वो लगातार यातना, जेल की सजा, इंडस्ट्रियल मर्डर के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। उस वक्त वो सिर्फ 2 सालों के लिए अपने पिता हाफिज के उत्तराधिकारी के तौर पर सीरिया के राष्ट्रपति बने थे, जिनका नाम क्रूरता के लिए कुख्यात था।
बशर अल-असद आंखों के डॉक्टर थे और उन्होंने लंदन से डॉक्टर की पढ़ाई की थी और बाद में उन्होंने जेपी मॉर्गन में काम करने वाली एक इन्वेस्टमेंट बैंकर, ब्रिटिश-सीरियाई लड़की अस्मा से शादी कर ली। उस वक्त वो दुनिया को ये दिखाना चाह रहे थे, कि उनके नेतृत्व में सीरिया एक अलग रास्ता अपना सकता है।

इस दौरान उन्होंने पश्चिमी देशों की तरफ हाथ बढ़ाए, पब्लिक रिलेशन कैम्पेन चलाए और असद परिवार को एक साधारण परिवार की ही तरह दिखाने की कोशिश की, जो किसी भी तरह की क्रूरता के खिलाफ है।
उस साल ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने दमिश्क का दौरा किया था और उनके ही शब्दों में उन्होंने कहा था, कि "मुझे कॉफी के लिए असद ने आमंत्रित किया था, जो एक महंगे सूट में सफेद सोफे पर बैठे थे।" इस मुलाकात के बाद राष्ट्रपति असद ने ब्रिटेन की राजकीय यात्रा की थी।
इस दौरान कुछ अनिश्चितताओं का संकेत देते हुए राष्ट्रपति असद इस बात के लिए उत्सुक थे, कि दुनिया में सीरिया को कैसे देखा जाता है और उन्होंने बदलाव की संभावनाओं को दुनिया के सामने रखा, जिसमें दमिश्क और इजराइल के बीच के संबंध भी शामिल थे।
हालांकि, ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर से बातचीत के दौरान बशर ने अमेरिका पर अल-कायदा की तरफ से किए गए 9/11 के हमले और उसके बाद अफगानिस्तान पर अमेरिकी आक्रमण के बारे में बात करते हुए एक खौफनाक और लगभग बेकार की बात कही। बशर ने जोर देकर कहा, कि "दुनिया को पता होना चाहिए कि इस्लामवादी विद्रोहियों को बेरहमी से कुचलने में उनके पिता हमेशा "सही" रहे थे।"

बशर अल-असद की तानाशाही
ब्रिटेन की राजकीय यात्रा के बाद सीरिया की राजनीति में काफी पानी बहा, जिसमें लोगों का खून शामिल था और 22 सालों के बाद बशर सत्ता से बेदखल कर दिए गये और सत्ता से बाहर करने वाला कोई और नहीं, बल्कि अलकायदा की ही एक शाखा 'हयात तहरीर अल शाम' था, जिसे HTS कहा जाता है।
इस तरह से असद के शासन का नाटकीय अंत हो गया और मध्य पूर्व के नक्शे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा, पूरी तरह से फिर से नई राजनीति के लिए तैयार हो गया है।
सीरिया में आए अरब स्प्रिंग के पहले के दिनों में भी बशर अल-असद के सीरिया की वास्तविकता - मुअम्मर गद्दाफी के लीबिया की तरह ही था, और ये एक ऐसा देश बन गया था, जिसमें एक विशाल सुरक्षा तंत्र हमेशा मौजूद रहता था, असद के एजेंट बाजारों, टैक्सी स्टैंड और सड़क के कोनों पर हमेशा नजर रखते थे।
सीरिया के लिए लोकतंत्र के मॉडल को मानने से इनकार करते हुए, बशर के सुधार की शुरुआती पेशकश राजनीतिक परिवर्तन से पहले आर्थिक बदलाव का वादा करना था, अलोकप्रिय राज्य एकाधिकार को मुक्त बाजार के साथ बदलना, लेकिन उनके इस फैसले का फायदा सिर्फ अमीर वर्ग को मिला।
धीरे धीरे पता चला, कि असद का राजनीतिक सिद्धांत उसके पिता से जरा भी अलग नहीं था और वो उन्होंने अत्यधिक तानाशाही का शासन स्थापित किया, जिसके केन्द्र में सेना, वायुसेना और खुफिया एजेंसियां थीं।
जबकि, शुरूआती दिनों में बशर ने 2001 में कई राजनीतिक कैदियों को रिहा किया - मुख्य रूप से कम्युनिस्टों को और पश्चिम को यह दिखाने की कोशिश की, कि सीरिया बदल रहा है। उन्होंने कऊ लोगों को माफी दिए, लेकिन हकीकत ये थी, कि दूसरी तरफ लगातार लोगों की गिरफ्तारियां चल रही थीं और सीरिया की सत्ता, वो अपने पिता के रास्ते पर ही चला रहे थे, जहां असहमति के लिए कोई स्थान नहीं था।
2011 के सीरियाई विद्रोह के खतरे के तहत बशर का आखिरी दिखावा भी फिसल गया, और बशर का एक नया चेहरा दुनिया के सामने आया, जब छात्रों के आंदोलन को कुचलने करे लिए बशर ने बेरहमी से उनकी हत्या करवाई, आंदोलन को क्रूरता के साथ कुचलने की कोशिश की और अपने ही देश के छात्रों पर कैमिकल हथियार चलाए।
साल 2011 से 2015 के बीच सेडनाया की जेल में 13 हजार से ज्यादा लोग बेरहमी से मार दिए गये, जिसे "मानव वधशाला" के रूप में जाना जाता है।
जबकि, इस दौरान असद के चेहरे को चमकाने की काफी कोशिशें की गई और यहां तक की, उन्हें 'रेगिस्तान में खिला गुलाब' भी बताया गया। जबकि, असद का शासन, उनके पिता के शासन की तुलना में भी ज्यादा भयावह हो गया था।
उनके पिता ने शासन का एक सिद्धांत तैयार किया था, कि 'किसी भी विरोध को हिंसक तरीके से कुचल दो', जो बाद असद के लिए शासन का मॉडल साबित हुआ, जिसके तहत उन्होंने सीरिया में नरसंहार करवाए।
असद के पिता हाफिज ने 1982 में सीरिया में भीषण नरसंहार करवाया था। कैदी नेताओं की सामूहिक हत्या कर दी गई। मुस्लिम ब्रदरहुड के लोगों और उनके परिवारों की हत्या कर दी गई। फरवरी 1982 में हमा शहर पर जमीनी और हवाई हमले किए गये, जिसमें हजारों लोग मारे गए। यह एक ऐसी रणनीति थी, जिसे बशर और उनके भाई माहेर ने भी उतनी ही जोश से अपनाया।

अरब स्प्रिंग
धीरे धीरे पता चलता गया, कि शुरू में बशर अल-असद ने अपने पिता से अलग दिखने की सिर्फ इसलिए कोशिश की थी, क्योंकि असल में उन्हें सीरिया का नया उत्तराधिकार नहीं माना गया था। उनके भाई बैसेल को देश के भविष्य के तौर पर पेश किया गया था, जिनकी 1994 में एक कार दुर्घटना में मौत हो गई। लेकिन, कई लोगों को लगता है, कि ये मौत नहीं, असल में हत्या थी।
बशर अल-असद, जो उस वक्त तक लंदन में थे, वो खुद को एक ऐसा शख्स दिखाते थे, जिसे सीरिया की राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है, लेकिन भाई की मौत के बाद वो वापस देश लौटे और अपने पिता से शासन की ट्रेनिंग लेनी शुरू कर दी।
साल 2011 में अरब स्प्रिंग शुरू होने तक, बशर अल-असद के चेहरे को पूरी तरह से चमका दिया गया था। वो अपने दोस्तों के साथ हॉलीवुड की फिल्में देखते थे, रेस्टोरेंट में खाना खाते थे, आधुनिक युग की बातें करते थे, लेकिन अरब स्प्रिंग ने उनके चेहरे के नकाब को नोंचकर हटा दिया।
2011 में अरब स्प्रिंग शुरू होने से पहले सीरिया में छिटपुट प्रदर्शन शुरू हो गये थे और मार्च आते आते आंदोलन की आग तेजी से फैलने लगी और धीरे धीरे ये एक क्रांति में तब्दील हो गई। इस क्रांति को कुचलने के लिए सीरिया की सेना ने गोलीबारी शुरू कर दी और फिर शासन के करीबी मिलिशिया के टैंक मौत के दस्ता बनकर आम लोगों पर बरसने लगे।
साल 2012 में विकीलीक्स ने हजारों ईमेल हैक कर खुलासा किया, कि बशर अल-असद की पत्नी अस्मा ने पेरिस से महंगे आभूषण मंगवाए, जबकि दूसरी तरफ आम लोग भूख से मर रही थी।
सबसे बड़ा खुलासा ये था, कि बशर शासन को मजबूत करने के लिए रूसी सैन्य सलाहकार काम कर रहे और बशर ने हिंसा जारी रखने के लिए लगातार सैन्य दस्तावेजों पर दस्तखत किए। पता चला, कि सीरिया में आम लोगों का कत्लेआम किया जा रहा है।
अरब स्प्रिंग के दौरान सीरिया में 5 लाख से ज्यादा लोग मारे गये और देश की आधी से ज्यादा आबादी विस्थापित हो गई।
इसी दौरान सीरिया में इस्लामिक स्टेट का भी उदय हुआ, जिसने सालव 2013 में सीरियाई शहर रक्का को अपना राजधानी बना लिया था और उसने क्रूरता और कत्लेआम में बशर की सेना को भी पीछे छोड़ दिया। ISIS की क्रूरता ने दुनिया का ध्यान बशर अल-असद के शासन से हटा दिया और इसका फायदा उन्होंने अपने ही लोगों पर रासायनिक हथियार बरसाकर क्रांति को कुचलने के लिए इस्तेमाल किया।
हालांकि, अभी भी इस बात पर बहस दारी है, कि क्या राष्ट्रपति बशर अल-असद ने व्यक्तिगत तौर पर रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल की इजाजत दी थी या नहीं। लेकिन, कई एक्सपर्ट्स का कहना है, कि ये सीरियाई शासन की सत्ता को बचाए रखने की रणनीति थी।
इस दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा, जिन्होंने पहले रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल होने को 'रेड लाइन' बताया था और सीरियाई लोगों में एक उम्मीद जताई थी, उन्होंने भी यूटर्न ले लिया और अपने ही बनाए 'रेड लाइन' को मिटा डाला, जिसने तानाशाह बशर को बेलगाम कर दिया।
इस दौरान बशर के शासन को बनाए रखने के लिए रूस ने अपनी सेना भेजी और ईरान ने भी सीरियाई शासन की मदद करनी शुरू कर दी। ईरानी प्रॉक्सी हिज्बुल्लाह बशर सरकार के साथ मिलकर नागरिकों के खिलाफ होने वाली रक्तपात में शामिल हो गई। यानि, सीरिया की हालत ये हो गई, कि लोगों को एक तरफ से ISIS मार रहा था और दूसरी तरह से बशर की सरकार।
ISIS के खिलाफ अमेरिकी अभियान ने एक तरह से बशर के तानाशाह शासन को सुरक्षा ही दी, जबकि इस दौरान वो पूरी तरह से रूस और ईरान के समर्थन पर निर्भर हो गये।
न्यू लाइन्स के प्रधान संपादक और सीरिया के एक प्रमुख विशेषज्ञ हसन हसन ने लिखा है, कि "बशर अल-असद सिर्फ एक सुनियोजित जिहादी अभियान के कारण नहीं टूटा, बल्कि इसलिए भी टूटा, कि 13 साल के गृहयुद्ध ने उसकी सेना को खोखला कर दिया है, और उसके सैनिकों का मनोबल गिरा दिया है।"
अब सीरिया के कई हिस्से बन गये हैं। कुछ क्षेत्रों में अमेरिका समर्थित मिलिशिया का शासन है, तो कुछ क्षेत्रों में तुर्की समर्थित गुटों का और अब राजधानी दमिश्क समेत ज्यादातर हिस्सों में HTS का नियंत्रण स्थापित हो गया है। और इस तरह से सीरिया से बशर अल-असद के क्रूर शासन का तो अंत हो गया, लेकिन देश का कंट्रोल अब जिन हाथों में चला गया है, वो भी बशर अल-असद से कम नहीं है और उसे भी असहमति बर्दाश्त नहीं है।












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