Bangladesh: बांग्लादेशी छात्र खुद को क्यों बता रहे रजाकार, इसके क्या मायने हैं, शेख हसीना इससे क्यों भड़कीं?

What is Razakars: बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में कोटा के खिलाफ छात्रों के सड़कों पर उतरने से घातक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। माना जा रहा है, कि प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक झड़पों में 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई है, जिनमें ज्यादातर छात्र हैं।

प्रदर्शनकारियों का एक नारा ढाका की सड़कों पर छाया हुआ है, जिससे शेख हसीना की अगुआई वाली सरकार और छात्रों के बीच वाकयुद्ध शुरू हो गया है।

bangladesh razakar

"तुई के? अमी के? रजाकार, रजाकार! के बोलेचे, के बोलेचे, सैराचार- सैराचार।"

इस नारे का मतलब है "तुम कौन हो? मैं कौन हूं? रजाकार, रजाकार! कौन कहता है कौन कहता है, तानाशाह, तानाशाह!"

बांग्लादेश में रजाकार शब्द का इस्तेमाल बहुत ही आपत्तिजनक है, खासकर शेख हसीना के लिए। छात्रों का शेख हसीना को "तानाशाह" कहना भी कई लोगों को चौंका रहा है।

लेकिन आखिर ये रजाकार कौन थे? बांग्लादेश में अब रजाकार का डर क्यों पनप रहा है? आइये जानने की कोशिश करते हैं।

रजाकार और बांग्लादेश मुक्ति युद्ध

रजाकार, एक अर्धसैनिक बल था जिसने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना के साथ सहयोग किया था।

रजाकार, जिसका फारसी और उर्दू में अर्थ है 'स्वयंसेवक' या 'सहायक', मुख्य रूप से बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान के रूप में जाना जाता था) में रहने वाले पाकिस्तान समर्थक बंगाली और बिहारी थे, जो पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के विभाजन के खिलाफ थे।

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 50,000 रजाकारों ने स्थानीय आबादी पर छापे मारने और अत्याचार करने में पाकिस्तानी सेना की मदद की थी।

मानवविज्ञानी नयनिका मुखर्जी के मुताबिक, बांग्लादेश में 'रजाकार' शब्द का इस्तेमाल गाली के तौर पर किया जाता है। अखबार की रिपोर्ट में कहा गया है कि इसका मतलब 'सहयोगी' हो गया है और देश में इसे विश्वासघात से जोड़कर देखा जाता है।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, रजाकारों ने अल-बद्र और अल-शम्स जैसे कट्टरपंथी मजहबी मिलिशिया के साथ मिलकर पाकिस्तान के कब्जे का विरोध करने वाले नागरिकों, छात्रों, बुद्धिजीवियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को बुरी तरह से निशाना बनाया।

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, रजाकारों की सहायता से पाकिस्तानी सेना ने मुक्ति समर्थक बांग्लादेशियों के खिलाफ क्रूर कार्रवाई की थी, जिसमें 300,000 से 30 लाख नागरिकों की मौत हुई। करीब 10 लाख महिलाओं के साथ पाकिस्तानी सेना के जवानों और रजाकाओं ने बलात्कार किए, और माना जाता है, कि इस घटना से करीब 25 हजार से 1 लाख 95 हजार महिलाओं का गर्भ ठहर गया।

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बांग्लादेश की राजनीति में रजाकारों की वापसी क्यों हुई?

जुलाई में, बांग्लादेश के विश्वविद्यालय परिसरों में 1971 के बांग्लादेशी मुक्ति संग्राम के स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के लिए 30 प्रतिशत कोटा के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू किए गये। ये प्रदर्शन सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का परिणाम हैं, जिसमें सरकारी नौकरियों के लिए कोटा प्रणाली को बरकरार रखा गया है।

जिसके बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रदर्शनकारियों को रजाकार कह दिया, जिससे छात्र आक्रोशित हो गये और ये विरोध प्रदर्शन भड़क गया।

पिछले हफ्ते एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए शेख हसीना ने कहा, कि "क्या स्वतंत्रता सेनानियों के बच्चे और पोते प्रतिभाशाली नहीं हैं? क्या केवल रजाकारों के बच्चे और पोते ही प्रतिभाशाली हैं? स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति उनमें इतनी नाराजगी क्यों है? अगर स्वतंत्रता सेनानियों के पोते-पोतियों को कोटा का लाभ नहीं मिलता है, तो क्या रजाकारों के पोते-पोतियों को इसका लाभ मिलना चाहिए?"

प्रधानमंत्री के बाद उनकी पार्टी के कई नेताओं ने भी इसी तरह की टिप्पणी करके प्रदर्शनकारियों के बीच आक्रोश को और भड़का दिया। समाज कल्याण मंत्री दीपू मोनी ने कथित तौर पर कहा, कि "रजाकारों को मुक्ति संग्राम के शहीदों के खून से सने लाल और हरे झंडे को थामने का कोई अधिकार नहीं है।"

स्क्रॉल ने बताया है, कि शेख हसीना की टिप्पणी को "निराशाजनक और अपमानजनक" माना गया, जिसके कारण विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए।

कई छात्र इस बात से नाराज थे, कि उन्हें रजाकारों से तुलना की गई, जिन्हें देश में विश्वासघाती और गद्दार के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। अपना विरोध व्यक्त करने के लिए प्रदर्शनकारियों ने व्यंग्यात्मक रूप से खुद को "रजाकार" कहना शुरू कर दिया।

लेकिन इससे प्रधानमंत्री शेख हसीना और भड़क गईं, और उन्होंने कथित तौर पर कहा, कि "उन्होंने सड़कों पर पड़े शवों को नहीं देखा, फिर भी उन्हें खुद को रजाकार कहने में कोई शर्म नहीं है।"

शिक्षा मंत्री मोहिबुल हसन चौधरी ने फेसबुक पर लिखा, कि "जो लोग 'मैं रजाकार हूं' का नारा लगाते हैं, उन्होंने खुद को इस युग का 'सच्चा' रजाकार साबित कर दिया है। वे न्यायालय और सरकार दोनों की अवहेलना करते हैं।"

स्क्रॉल से बात करते हुए, प्रदर्शनकारी छात्रों के नेताओं में से एक सरजिस इस्लाम ने आरोप लगाया, कि सरकार नारे की "गलत व्याख्या" करके विरोध को दबाना चाहती है।

उन्होंने कहा, कि "हमने अपनी निराशा और गुस्सा जाहिर किया, कि हमें रजाकार इसलिए कहा गया, क्योंकि हम सभी के लिए समान अधिकार चाहते थे। ऐसा लगता है कि वे गलत व्याख्या करके विरोध को दबाना चाहते हैं।"

हालांकि, कुछ लोगों का मानना ​​है, कि सरकार ने छात्रों के खुद को रजाकार कहने के पीछे की मंशा को गलत नहीं समझा है। राजनीतिक विश्लेषक और टिप्पणीकार जाहेद उर रहमान ने स्क्रॉल से कहा, कि "वे पूरी तरह से जानते हैं, कि छात्रों के उन नारों का क्या मतलब था। लेकिन वे इसे अपने पक्ष में करने के लिए सुविधाजनक तरीके से पेश कर रहे हैं।"

हसीना को 'तानाशाह' क्यों कहा जाना आश्चर्यजनक है?

शेख हसीना पर बांग्लादेश में कठोर शासन करने का आरोप लगाया गया है। चुनावी धांधली के आरोपों के बीच वह इस साल की शुरुआत में लगातार चौथी बार सत्ता में आई थीं।

उनके राजनीतिक विरोधी पिछले डेढ़ दशक से ज्यादा वक्त से उनके लिए 'तानाशाह' शब्द का इस्तेमाल करते रहे हैं, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है, कि आम जनता ने खुले तौर पर उन्हें तानाशाह कहना शुरू कर दिया है, शेख हसीना की सरकार को लेकर लोगों की बढ़ती नाराजगी को दिखाता है।

नॉर्वे के ओस्लो विश्वविद्यालय में बांग्लादेश विशेषज्ञ और पोस्ट-डॉक्टरल शोधकर्ता मुबाशर हसन ने इंडिया टुडे को बताया, कि उन्हें 'तानाशाह' कहना आम चुनावों के बारे में संदेह का संकेत है।

हसन ने कहा, कि "शेख हसीना की सरकार समाज में डर फैलाने में कामयाब रही थी। अब, ऐसा लगता है, कि वो डर दूर हो गया है, और परिणामस्वरूप, यह तर्क देना उचित है, कि हसीना के नेतृत्व की स्पष्ट आलोचना हो रही है और नारे के माध्यम से उन्हें सार्वजनिक रूप से तानाशाह कहने से यह स्पष्ट है, कि छात्र उनकी चुनावी इंजीनियरिंग पर भी सवाल उठा रहे हैं।"

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