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बांग्लादेश ने असम में 10 ट्रक हथियार भेजने वाले ULFA आतंकी की फांसी की सजा को पलटा, बच गया खतरनाक परेश बरुआ!

Bangladesh acquits Paresh Barua: शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार हर एक वो कदम उठा रही है, जिसका रास्ता आतंकवाद की तरफ जाता है।

बांग्लादेश के एक हाईकोर्ट ने बुधवार को उल्फा (ULFA) नेता परेश बरुआ की मौत की सजा को उम्र कैद में बदल दिया है और पूर्वोत्तर भारत में अलगाववादी संगठन को हथियारों की तस्करी की कोशिश करने के 2004 के एक मामले में एक पूर्व मंत्री समेत पांच अन्य आतंकवादियों को बरी कर दिया है।

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ये मामला साल 2004 का है, जब बांग्लादेश के चटग्राम के रास्ते 10 ट्रक हथियार भारत के असम में तस्करी करने की कोशिश की गई थी, ताकि असम में हिंसा की आग को भड़काया जा सके। ये हथियार यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ असम (ULFA) के ठिकानों तक सुरक्षित रास्ते से पहुंचाए जा रहे थे, लेकिन सभी ट्रकों को भारतीय सेना ने जब्त कर लिया था।

भारत में भेजे जा रहे थे घातक हथियार

जब्त किए गए हथियारों में 27,000 से ज्यादा ग्रेनेड, 150 रॉकेट लॉन्चर, 11 लाख से ज्यादा गोला-बारूद, 1,100 सबमशीन गन और 11.41 मिलियन गोलियां शामिल थीं।

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बेंच में मौजूद एक सरकारी वकील ने बताया, कि दो सदस्यीय हाई कोर्ट बेंच ने उल्फा नेता परेश बरुआ की सजा कम कर दी है, जिसे मुकदमे के बाद मौत की सजा सुनाई गई थी। हालांकि, परेश बरुआ को गिरफ्तार नहीं किया जा सका था और अब माना जा रहा है, कि वो चीन में छिपा हुआ है।

लेकिन, बांग्लादेशी कोर्ट ने उसकी फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया है।

उन्होंने बताया, कि जस्टिस मुस्तफा जमान इस्लाम और जस्टिस नसरीन अख्तर की हाई कोर्ट बेंच ने पूर्व गृह राज्य मंत्री लुत्फ़ुज़्ज़मान बाबर और छह अन्य को बरी कर दिया है, जिन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी। फांसी से बचने वाले पांच अन्य लोगों में फोर्सेज इंटेलिजेंस (DGFI) के पूर्व महानिदेशक सेवानिवृत्त मेजर जनरल रज्जाकुल हैदर चौधरी, सरकारी उर्वरक संयंत्र (CUFL) के पूर्व प्रबंध निदेशक मोहसिन तालुकदार, इसके महाप्रबंधक इनामुल हक, उद्योग मंत्रालय के पूर्व अतिरिक्त सचिव नूरुल अमीन और जमात-ए-इस्लामी नेता मोतीउर रहमान निजामी शामिल हैं।

खुलासा हुआ था, इन संयंत्र स्थलों का इस्तेमाल उल्फा के लिए हथियारों के ट्रांस-शिपमेंट के लिए किया जाता था।

बांग्लादेश के राष्ट्रीय सुरक्षा खुफिया विभाग के पूर्व प्रमुख पूर्व ब्रिगेडियर जनरल अब्दुर रहीम, जो कि DGFI के पूर्व डायरेक्टर थे, उन्हें भी मौत की सजा सुनाई गई थी, लेकिन अपील और मौत की सजा पर सुनवाई की प्रक्रिया के दौरान जेल में उनकी सामान्य मौत हो गई।

हालांकि, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP)-जमात गठबंधन सरकार में पूर्व मंत्री निजामी को कई साल पहले बांग्लादेश के 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान मानवता के खिलाफ अपराध के आरोप में फांसी दे दी गई थी, जिसमें उन्होंने पाकिस्तानी सैनिकों का साथ दिया था, जबकि उनकी पार्टी देश की आजादी का विरोध कर रही थी।

बाबर के वकील शिशिर मनीर ने पहले पीठ को बताया, कि उनके मुवक्किल को राजनीतिक कारणों से मामले में झूठा फंसाया गया है और अभियोजन पक्ष उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों के समर्थन में कोई विश्वसनीय सबूत या भरोसेमंद गवाह पेश नहीं कर सका।

पूर्व मंत्री लुत्फ़ुज़्ज़मान बाबर को 2004 में शेख हसीना और उनकी पार्टी के शीर्ष नेताओं पर ग्रेनेड से हमला करने के मामले में भी सजा सुनाई गई थी, जिसमें 24 लोग मारे गये थे और सैकड़ों लोग घायल हो गये थे, लेकिन बांग्लादेश के एक और हाईकोर्ट ने एक दिसंबर को सुनवाई के दौरान उनकी फांसी की सजा को पलटते हुए उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया।

जबकि, 30 जनवरी 2014 को, पूर्वोत्तर बंदरगाह शहर चटगांव में एक विशेष न्यायाधिकरण ने हथियार बरामदगी मामले में पिछली बीएनपी सरकार के दो पूर्व मंत्रियों, दो पूर्व सेना जनरलों और एक शीर्ष उल्फा नेता सहित 14 लोगों को मौत की सजा सुनाई थी।

अदालत का यह फैसला बांग्लादेश के इलाके से होकर पूर्वोत्तर भारत में उल्फा के ठिकानों पर तस्करी के लिए लाए गए 10 ट्रक हथियारों की आकस्मिक जब्ती के करीब एक दशक बाद आया है।

दो राजनेताओं को मृत्युदंड दिया गया था, जिनमें बाबर और निजामी शामिल थे, जो जमात के पूर्व अमीर और उसी कैबिनेट में तत्कालीन उद्योग मंत्री थे, जबकि उल्फा के भगोड़े सैन्य विंग के प्रमुख बरुआ को मृत्युदंड दिया गया था।

पिछली बीएनपी के नेतृत्व वाली चार-पक्षीय सरकार के दौरान यह मामला सालों तक लटका रहा, जिसमें जमात प्रमुख सहयोगी थी, जबकि हथियार जब्त करने वाले पुलिस अधिकारियों को कथित तौर पर पेशेवर उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। 2008 में बाद में सैन्य समर्थित अंतरिम शासन ने आरोपों के बीच फिर से जांच का आदेश दिया गया और इस दौरान मामले को कमजोर करने के लिए तथ्यों को दबाने का जानबूझकर प्रयास किया गया था।

पूरक आरोपपत्र में कहा गया था, कि हथियार कुछ डीजीएफआई और एनएसआई अधिकारियों की निगरानी में उल्फा के लिए लाए गए थे, जबकि खेप को चटगांव में एक सरकारी घाट पर उतार दिया गया था ताकि उसे पूर्वोत्तर सीमांत क्षेत्रों के लिए ट्रकों में लोड किया जा सके।

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