एशिया के दो सबसे अमीर गौतम अडानी-मुकेश अंबानी में 'जंग' शुरू, कौन होगा किंग, किसे नुकसान?
अंबानी की रिलायंस जियो इन्फोकॉम लिमिटेड भारत के मोबाइल बाजार में शीर्ष खिलाड़ी है, जबकि अडानी समूह के पास वायरलेस दूरसंचार सेवाएं प्रदान करने का लाइसेंस भी नहीं है।
नई दिल्ली, अगस्त 01: पिछले महीने जून में भारत के खरबपति कारोबारी मुकेश अंबानी और उनके सहयोगी अप्रत्याशित दुविधा में पड़ गये, जब ये बहस चल रही थी, उनके साम्राज्य का कारोबार अब किस दिशा में आगे बढ़ाया जाए। अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड एक विदेशी दूरसंचार कंपनी खरीदने पर विचार कर रही थी, जब उनके पास यह खबर पहुंची, कि गौतम अडानी, जिन्होंने कुछ महीने पहले ही अंबानी को एशिया के सबसे अमीर कारोबारी की कुर्सी से हटाया है, वो भारत में 5जी नेटवर्क की बीडिंग में बोली लगाने की योजना बना रहे हैं। इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले से परिचित लोगों के मुताबिक, रिलायंस इंडस्ट्रीज के लिए ये एक बहुत बड़ा झटका था और गुजरात के दो सबसे अमीर कारोबारी 'जंग' के मैदान में आ चुके थे।

अंबानी के सामने सबसे बड़ी चुनौती
अंबानी की रिलायंस जियो इन्फोकॉम लिमिटेड भारत के मोबाइल बाजार में शीर्ष खिलाड़ी है, जबकि अडानी समूह के पास वायरलेस दूरसंचार सेवाएं प्रदान करने का लाइसेंस भी नहीं है। लेकिन, ऐसा लगता है, कि अडानी ने अंबानी के महत्वाकांझी जमीन पर आकर खेलने की पूरी तैयारी कर ली है, लिहाजा अंबानी का कैंप पूरी तरह से हाई अलर्ट पर है। इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मामले से परिचिति लोगों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर जानकारी दी है, कि अंबानी कैंप, 5जी नेटवर्क ऑक्शन में अडानी की एंट्री के बाद काफी सावधान है। इस मामले से परिचित लोगों के अनुसार, सहयोगियों के एक समूह ने मुकेश अंबानी को विदेशी टेलीकॉम कंपनी को खरीदने की सलाह दी है और उनसे भारत के बाहर भी अपने कारोबार का विस्तार करने और अपने व्यापार में विविधता लाने की सलाह दी है, लेकिन सलाहकारों के एक दूसरे धरे ने घरेलू मैदान पर किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए धन को बचाने की सलाह दी है।

अंबानी बनाम अडानी...शुरू हुई 'जंग'
मुकेश अंबानी, जिनकी संपत्ति करीब 90 अरब डॉलर के करीब है, उन्होंने अभी तक कभी भी किसी विदेशी कंपनी को खरीदने के लिए बोली नहीं लगाई है। और मामले से परिचित लोगों के मुताबिक, मुकेश अंबानी के इस फैसले के पीछे सबसे बड़ी वजह ये थी, कि उन्होंने फैसला किया था, कि अगर अडानी की तरफ से चुनौती मिलती है, तो उनकी वित्तीय स्थिति मजबूत बनी रही और अंबानी के मुताबिक ये एक समझदारी भरा फैसला होगा। वहीं, अडानी, जिन्होंने इस साल पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा की संपत्ति अर्जित की है, वो 5जी ऑक्शन में कड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं और ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडेक्स के आंकड़ों के आधार पर इस साल गौतम अडानी के पास 118.3 अरब डॉलर की संपत्ति हो गई है। पिछले 20 सालों से अडानी ने अपने कारोबार को काफी खामोशी के साथ विस्तार किया है, लेकिन अब एशिया के दो सबसे अमीर कारोबारी तेजी से एक ही जमीन पर आगे बढ़ रहे हैं, और अडानी ने पारंपरिक क्षेत्रों से इतर भी अपने कारोबार का विस्तार करने का फैसला कर लिया है।

अरबपति राजवंश
हिंदुस्तान के दो अरबपतियों के बीच शुरू हुआ ये संघर्ष अब भारत की सीमाओं के बाहर भी जाने के लिए मंच तैयार कर रहा है और घर में तो जंग शुरू हो ही चुकी है, क्योंकि 3.2 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था वाला देश भारत, काफी तेजी से डिजिटल होने के लिए आगे बढ़ रहा है और 5जी नेटवर्क आने के बाद भारत के बाजार में अप्रत्याशित वृद्धि होने की पूरी संभावना है, लिहाजा एक्सपर्ट्स का मानना है, कि कमोडिटी-नेतृत्व वाले क्षेत्रों से अलग हटकर भी पैसों की ये लड़ाई शुरू हो जाएगी, जहां अंबानी और अडानी... दोनों अपने अपने भाग्य को आजमाएंगे। ई-कॉमर्स से लेकर डेटा स्ट्रीमिंग और स्टोरेज तक उभर रहे अवसर, जो अमेरिका के 19वीं सदी के आर्थिक उछाल की याद दिलाते हैं, जिसने कार्नेगीज, वेंडरबिल्ट्स और रॉकफेलर्स जैसे अरबपति राजवंशों के उदय को बढ़ावा दिया, वो भारत में भी होने की संभावना है, जिसके मुख्य खिलाड़ी अंबानी और अडानी होंगे।

भारतीय बाजार पर अरबपतियों की नजर
पिछले दो दशकों से भारतीय बाजार और दो अरबपतियों पर नज़र रखने वाले मुंबई निवेश सलाहकार फर्म केआरआईएस के संस्थापक अरुण केजरीवाल ने इकोनॉमिक टाइम्स से कहा कि, दोनों भारतीय परिवार समान रूप से विकास के भूखे हैं, और इसका मतलब है कि वे अनिवार्य रूप से एक-दूसरे प्रतिस्पर्धा में शामिल होने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि, 'अंबानी और अडानी सहयोग करेंगे, सह-अस्तित्व में रहेंगे और प्रतिस्पर्धा करेंगे।" उन्होंने कहा कि,"और अंत में, सबसे योग्य व्यक्ति आगे बढ़ जाएगा।" वहीं, इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अडानी और अंबानी की कंपनियों के प्रतिनिधियों ने इस कहानी के लिए टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। वहीं, 9 जुलाई को एक सार्वजनिक बयान में, अडानी समूह ने कहा था कि, वर्तमान में अंबानी के प्रभुत्व वाले उपभोक्ता मोबाइल स्पेस में प्रवेश करने का उसका कोई इरादा नहीं है, और केवल "निजी नेटवर्क समाधान" बनाने और बढ़ाने के लिए सरकारी नीलामी में खरीदे गए किसी भी एयरवेव का उपयोग करेगा। इससे वो अपने हवाई अड्डों और बंदरगाहों पर साइबर सुरक्षा बढ़ाने पर ध्यान देगा।

टेलीकॉम मार्केट में आएंगे अडानी?
हालांकि, इस तरह की टिप्पणी के बावजूद, अटकलें लगाई जा रही हैं कि अडानी अंततः उपभोक्ताओं के लिए वायरलेस सेवाओं की पेशकश करने का उपक्रम कर सकते हैं। वहीं, अहमदाबाद में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के पूर्व प्रोफेसर शंकरन मणिकुट्टी ने कहा कि, "मैं उपभोक्ता मोबाइल बाजार में अंबानी की तुलना में अडानी की लेट एंट्री और जियो के साथ प्रतिस्पर्धा को कम करके नहीं आंकता हूं, फिलहाल तो बिल्कुल नहीं''। दशकों से, अडानी का व्यवसाय बंदरगाहों, कोयला खनन और शिपिंग जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित रहा है, वहीं अंबानी ने तेल के कारोबार में भारी निवेश करना जारी रखा, लेकिन पिछले एक साल में नाटकीय तौर पर ये समीकरण बदल चुका है।

विदेश तक पहुंची अडानी की नजर
इस साल मार्च महीने में अडानी ग्रुप को सऊदी अरब में संभावित साझेदारियों की दिशा में खोज करने के लिए कहा गया था और ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक बहुत संभावना है, कि अडानी ग्रुप सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी अरामको में भारी निवेश कर सकता है। वहीं, इससे कुछ महीने पहले, रिलायंस, जो अभी भी अपने राजस्व का अधिकांश हिस्सा कच्चे तेल से संबंधित व्यवसायों से प्राप्त करता है, उसने अपनी ऊर्जा इकाई में अरामको को 20% हिस्सेदारी बेचने की योजना को रद्द कर दिया। इस लेन-देन पर पिछले दो सालों से लगातार बातचीत चल रही थी। इसके साथ ही इन दोनों अरबपतियों के बीच हरित ऊर्जा क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण ओवरलैप है, और अंबानी और अडानी, दोनों ने ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में 70-70 अरब डॉलर के निवेश की बात कही है, जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार की प्राथमिकता से जुड़ा हुआ है। इस बीच, अडानी ने डिजिटल सेवाओं, स्पोर्ट्स, रिटेल, पेट्रोकेमिकल्स और मीडिया में गहरी महत्वाकांक्षाओं का संकेत देना शुरू कर दिया है। अंबानी की रिलायंस या तो इन क्षेत्रों में पहले से ही हावी है या फिर उनके लिए बड़ी योजनाएं मौजूद हैं।

उपभोक्ताओं को होगा फायदा?
दूरसंचार में अगर अडानी ने बड़े पैमाने पर उपभोक्ताओं को लक्षित करना शुरू कर दिया, तो इतिहास बताता है कि प्रतिस्पर्धा के शुरुआती चरण में कीमतों में गिरावट आ सकती है, लेकिन अगर दोनों कंपनियां एकाधिकार हासिल कर लेती हैं, तो भारत के वायरलेस स्पेस में वर्तमान में तीन निजी खिलाड़ियों का वर्चस्व है। जब अंबानी ने 2016 में टेलीकॉम में अपना प्रारंभिक प्रवेश किया, तो उन्होंने मुफ्त कॉल और बहुत सस्ते डेटा की पेशकश की थी, जिसे एक दुस्साहसिक कदम बताया गया, लेकिन, एक बार फिर से कीमतों में बढ़ोतरी हो गई है। लिहाजा देखना दिलचस्प होगा, कि दो अरबपतियों की लड़ाई में उपभोक्ताओं को कितना फायदा होता है?
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