खतरे की घंटी: टूटने के कगार पर 180 लाख करोड़ टन वजनी बर्फ का हिस्सा, अंटार्कटिक के लिए चेतावनी जारी

अगले 20 सालों के बाद पूरा का पूरा पाइन आइललैंड की टूट जाएगा। पाइन द्वीप ग्लेशियर पहले से ही अंटार्कटिका के एक चौथाई बर्फ के नुकसान के लिए जिम्मेदार है।

नई दिल्ली, जून 12: वैज्ञानिकों ने दुनिया के लिए बहुत बड़ी चेतावनी जारी कर दी है और ये चेतावनी कोई सौ साल या दो सौ सालों के लिए नहीं है, बल्कि 20 सालों के बाद ही वैज्ञानिकों ने कहा है कि धरती पर बहुत बड़ी तबाही आने वाली है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि अंटार्कटिका ग्लेशियर की रक्षा करने वाला 180 लाख करोड़ टन वजनी पाइन आइसलैंड ग्लेशियर अगले 20 सालों में टूट जाएगा और टूटा ग्लेशियर अंटार्कटिक से अलग हो जाएगा। पाइन आइसलैंड अंटार्कटिक के पश्चिमी हिस्से में स्थित है, जो अंटार्कटिका का रक्षा करता है, और पिछले कई सालों से लगातार ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से पिघलता जा रहा है।

20 प्रतिशत हिस्सा गायब

20 प्रतिशत हिस्सा गायब

यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन ने सैटेलाइट तस्वीरों के हिसाब से रिसर्च किया है और अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पाइन आइसैलैंड पर फैली बर्फ की चादर लगातार पतली होती जा रही है और अगले 20 सालों में ये पूरा का पूरा हिस्सा अंटार्कटिक से टूटकर अलग हो जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक 2017 से 2020 के दौरान पाइन आइसलैंड के किनारे लगातार टूटते जा रहे हैं और टूटा हुआ हिस्सा अमुंडसेन सागर में गिर रहा है। इस सागर में आइसलैंड का हिस्सा गिरने का असर ये हो रहा है कि एक तो सागर में पानी का जलस्तर बढ़ रहा है और दूसरा असर ये हो रहा है कि एक हिस्सा टूटने के बाद दूसरा हिस्सा कमजोर हो जाता है और वो भी टूट जाता है।

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    इंसानों के पास नहीं बचा समय

    इंसानों के पास नहीं बचा समय

    रिपोर्ट के मुताबिक अगले 20 सालों के बाद पूरा का पूरा पाइन आइललैंड की टूट जाएगा। पाइन द्वीप ग्लेशियर पहले से ही अंटार्कटिका के एक चौथाई बर्फ के नुकसान के लिए जिम्मेदार है और जब यह पूरा टूट जाएगा तो समुद्र के जलस्तर पर करीब 1.6 फीट की वृद्धि हो जाएगी। वैज्ञानिकों ने गणित के आधार पर कहा है कि इंसानों ने आइसलैंड को बचाने का कीमती वक्त खो दिया है और स्थिति अब ऑउट ऑफ कंट्रोल हो चुकी है। इस आइसलैंड के पिघलने का जो अनुमान लगाया गया था, वो इससे कहीं ज्यादा रफ्तार से पिघला है। प्रोफेसर इयान जोफिन, जो यूडब्ल्यू अप्लाइट फिजिक्स लैब में ग्लेसियोलॉजिस्ट हैं, वो बताते हैं कि 'आइसलैंड का बहुत तेजी से पतन हो रहा है। ये अब टूटने के कगार पर पहुंच चुका है। और जब बर्फ का वो बड़ा हिस्सा टूट जाएगा तो हम अपना बहुत बड़ा नुकसान कर बैठेंगे।

    बर्फ के टूटने की गति

    बर्फ के टूटने की गति

    मोटे तौर पर देखा जाए तो, पिछले कुछ दशकों में पाइन द्वीप के बर्फ के शेल्फ का पतला होता गया है, और इसकी वजह है गर्म समुद्री धाराओं का होना। जिसकी वजह से बर्फ के बड़े बड़े हिस्से टूटते हैं और पानी में तैरते रहते हैं और फिर कुछ समय बाद वो भी पिघल जाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 2017 से 2020 के बीच बर्फ टूटने की तीन बड़ी घटनाएं हुई हैं, जिनमें 8 किलोमीटर लंबे और 36 किलोमीटर चौड़े बर्फ के टुकड़े उत्पन्न हो गये थे और बाद में टूटते टूटते छोटे छोटे हिस्से में बंटते चले गये और फिर पिघल गये। ये रिसर्च 'साइंस एडवांसेस' पत्रिका में प्रकाशित हुआ है, जो बताता है कि इंसानों के लिए क्लाइमेट चेंज कितना खतरनाक साबित हो रहा है।

    10 सालों में तीसरी बड़ी दरार

    10 सालों में तीसरी बड़ी दरार

    इससे पहले मार्च महीने में ग्रेटर लंदन के बराबर का एक हिमखंड यानी आइसबर्ग ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे स्टेशन के पास अंटार्कटिका में अलग हो गया है। यह घटना ब्रिटेन के हैली अनुसंधान स्टेशन से सिर्फ 20 किमी पर हुई थी। ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के अनुसार 26 फरवरी की सुबह अंटार्कटिक की सतह पर दरार आ गई थी, फिर वो तैरते हुए बर्फ की चट्टान से अलग हो गया। जिसके बाद ही विशालकाय हिमखंड का निर्माण हुआ। बताया जा रहा है कि जनवरी से ही हर रोज करीब 1 किमी की रफ्तार से अपनी सतह से अलग हो रहा था।पहला संकेत नवंबर 2020 में सामने आया था, जब उत्तरी रिफ्ट नामक एक नई खाई 35 किमी दूर स्टेनकोम्ब विल्स ग्लेशियर टोंग्यू के पास एक और बड़ी खाई की ओर बढ़ रही थी। पिछले 10 सालों में तीसरी बड़ी दरार सामने आई है।

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