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Explainer: अमेरिका का ओडीसियस लैंडर बनाम भारत का चंद्रयान-3.. जानिए NASA और ISRO में कौन रहा वर्ल्ड चैंपियन?

NASA Vs ISRO: अंतरिक्ष में वर्ल्ड चैंपियन बनने की रेस लगी हुई है और अमेरिका, भारत, चीन, रूस, फ्रांस और जापान जैसे देश लगातार अलग अलग मिशन को अंजाम दे रहे हैं। इसी कड़ी में अमेरिका ने करीब 52 सालों के बाद एक बार फिर से 23 फरवरी को चंद्रमा पर अपने लैंडर ओडीसियस को उतारा है।

ओडीसियस मिशन से पहले अमेरिका ने करीब 52 साल पहले अपोलो मिशन को अंजाम दिया था और स्पेस सेक्टर में रूस के साथ चल रही रेस में अपनी बादशाहत कायम कर ली थी। लेकिन, ओडीसियस मिशन सिर्फ अमेरिका के चंद्रमा के रेस में फिर से शामिल होने भर नहीं है, बल्कि चंद्रमा की सतह पर निजी अंतरिक्ष कंपनियों के उतरने का भी प्रतीक है।

us vs india lunar exploration

ओडीसियस मिशन, अमेरिका के ह्यूस्टन में 10 साल पुरानी कंपनी इंटुएटिव मशीन्स का है, जिसने 15 फरवरी को ओडीसियस लैंडर को चंद्रमा पर भेजने के लिए स्पेसएक्स के फाल्कन 9 रॉकेट का इस्तेमाल किया था। ये स्पेसक्राफ्ट अपने साथ नासा के 6 और पेलोड को अपने साथ चंद्रमा पर लेकर गया था।

ओडीसियस का लैंडर मॉड्यूल, जिसे नोवा-सी कहा जाता है, वो पिछले साल चंद्रयान-3 के बाद चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में उतरने वाला दूसरा मॉड्यूल बन गया है। यानि, भारत के बाद अमेरिका अब दूसरा देश बन गया है, जिसने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर अपने लैंडर को उतारा है।

चंद्रयान-3 और जापान के SLIM (Smart Lander for Investigating Moon) के बाद, एक साल के भीतर यह तीसरी चंद्रमा-लैंडिंग की घटना है।

चंद्रमा की रेस में फिर उतरा अमेरिका

ओडीसियस की लैंडिंग चंद्रमा की खोज में एक नई शुरुआत का प्रतीक है, जिसका मकसद भविष्य में इंसानों के लिए चंद्रमा को घर बनाने को लेकर नये रिसर्च करना और चंद्रमा पर नई टेक्नोलॉजी के विस्तार के लिए वातावरण तैयार करने के लिए तंत्र का निर्माण करना है।

ओडीसियस लैंडर, अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ की तरफ से चलाए गये 1960 और 1970 के दशक की चंद्रमा लैंडिंग से बहुत अलग है, जिसमें अपोलो मिशन के तहत चंद्रमा पर इंसानों को उतारना भी शामिल है। हालांकि, वे अपने आप में ऐतिहासिक वैज्ञानिक घटनाएं थीं, लेकिन अभी भी चंद्रमा पर मौजूद संसाधनों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है, क्योंकि अभी तक चंद्रमा पर उस तरह की तकनीक का विकास नहीं हो पाया है।

ओडीसियस लैंडर के जरिए अमेरिका ये भी रिसर्च कर रहा है, कि उसका मिशन आर्टिमिस कितना कामयाब हो पाएगा। आपको बता दें, कि अमेरिका अब चंद्रमा के साउथ पोल पर इंसानों को उतारना चाहता है और इसी कड़ी में मिशन आर्टिमिस पर काम कर रहा है।

लेकिन, मिशन ओडीसियस सिर्फ चंद्रमा पर अंतरिक्ष यान या मनुष्यों को उतारने को लेकर ही नहीं है, बल्कि चंद्रमा पर बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था के निर्माण को लेकर बढ़ाया गया एक और कदम है, जो चंद्रमा पर इस तरह के निर्माण कार्य के लिए माहौल तलाशने का काम करेगा।

Odysseus vs chandrayaan-3

चंद्रयान-3 बनाम ओडीसियस मिशन

अमेरिका के इस रेस में उतरने के साथ ही ये खेल काफी दिलचस्प हो चुका है, क्योंकि भारत भी चंद्रमा पर इंसानों को भेजने की योजना पर काम कर रहा है। लिहाजा जानना जरूरी हो जाता है, कि अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की तुलना में इसरो के चंद्रयान-3 मिशन की लागत क्या थी।

- चंद्रयान-3 मिशन भारत सरकार का मिशन था, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसाधन केन्द्र यानि इसरो संचालित कर रहा था, लेकिन मिशन ओडीसियस अमेरिका की एक निजी स्पेस कंपनी ने अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और एलन मस्क की अंतरिक्ष कंपनी स्पेसएक्स के साथ मिलकर अंजाम दिया है।

- वहीं, बात अगर लागत की करें, तो ओडीसियस लैंडर को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतारने के लिए इंटुएटिव मशीन्स ने नासा के साथ 980 करोड़ का करार किया था। जबकि, चंद्रयान-3 को चंद्रमा पर उतारने में भारत को सिर्फ 615 करोड़ रुपये का खर्च आया था।

-हालांकि, चंद्रयान-3 के रिजल्ट आ चुके हैं और इसने 100 प्रतिशत नतीजे दिए हैं, लेकिन अभी तक ओडीसियस लैंडर की तरफ से भेजे गये नतीजों का निष्कर्ष नहीं निकला है। लिहाजा, फिलहाल ये नहीं कहा जा सकता है, कि ओडीसियस लैंडर के नतीजे कितने प्रतिशत तक सही हुए हैं।

- ओडीसियस लैंडर को चंद्रमा की सतह पर उतारने में अमेरिका को सिर्फ 16 दिनों का वक्त लगा है और दक्षिणी ध्रुव पर उतरने के बाद ये सात दिनों तक काम करेगा। जबकि, चंद्रयान-3, चंद्रमा की सतह पर 14 दिनों तक एक्टिव रहा था। चंद्रयान-3 के लैंडर और रोवर, दोनों ने ही 14 दिनों तक काम किया था।

- ओडीसियस 6 एंगल वाला सिलेंडर के आकार का लैंडर है, जिसे 15 फरवरी को लॉन्च किया गया था और इसने एक हफ्ते में ही चंद्रमा की दूरी नाप ली और 21 फरवरी को चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश कर गया था। जबकि, चंद्रयान-3 को 14 जुलाई 2023 को श्रीहरिकोटा में स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया गया था और एक महीने तक सफर करने के बाद इसने 23 अगस्त 2023 को चंद्रमा पर सफल लैंडिंग की थी।

अमेरिका और भारत, दोनों का मकसद चंद्रमा पर अपने रिसर्च को आगे ले जाना है, लेकिन इसरो बजट की कमी से जूझता है, जबकि नासा के पास अथाह पैसा है और उसे एलन मस्क के साथ साथ कई और प्राइवेट कंपनियों का साथ हासिल है। लिहाजा, बजट और संसाधनों के मामले में नासा और इसरो की तुलना नहीं की जा सकती है, लेकिन इसरो के पास जुझारू वैज्ञानिकों की टीम है, और इसी बदौलत वो स्पेस सेक्टर की अंग्रणी एजेंसियों में शुमार है।

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