रूस को रोकने पाकिस्तान से फिर रिश्ता जोड़ रहा अमेरिका, बाइडेन के लिए पुतिन को छोड़ेंगे शहबाज?

अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिकन ने ना सिर्फ पाकिस्तान के नये विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन को बधाई दी है, बल्कि उन्हें अमेरिका आने और द्विपक्षीय बैठक करने का भी न्योता दिया है।

इस्लामाबाद/वॉशिंगटन, मई 08: दो दिन पहले अचानकर पाकिस्तान के नये विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो के पास अमेरिका से फोन आता है। वहीं, अमेरिका, जिसने पिछले साल सितंबर के बाद से पाकिस्तान सरकार से तमाम उच्चस्तरीय बैठकें बंद कर दी थीं और पिछले साल सितंबर महीने में आखिरी बार पाकिस्तान और अमेरिका के विदेशमंत्रियों की बातचीत हुई थी, लेकिन बिलावल भुट्टो के पास अमेरिका से फोन आता है और फोन करने वाले शख्स का नाम एंटनी ब्लिंकन होता है, जो अमेरिका के विदेश मंत्री हैं।

रिश्ता सुधारने की बात

रिश्ता सुधारने की बात

एंटनी ब्लिंकन पाकिस्तान के नये विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो से बात करना शुरू करते हैं और ये बातचीत पूरे 50 मिनटों तक चलती है, जिसमें अमेरिकी विदेश मंत्री पाकिस्तान के नये विदेश मंत्री को अमेरिका आने का न्योता देते हैं। पाकिस्तान के लिए ये 'आश्चर्यजनक' बात थी, कि अमेरिका की तरफ से ही रिश्ता जोड़ने के लिए पहल की जा रही थी, जबकि पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ने अमेरिका से लगभग लगभग पाकिस्तान के संबंधों को पूरी तरह से खराब कर दिया था। लेकिन, एंटबी ब्लिंकन बिलावल भुट्टो से कहते हैं, कि अमेरिका और पाकिस्तान के बीच राजनयिक संबंधों और सैन्य संबंधों का पुनरुद्धार होना चाहिए। इसके साथ ही एंटनी ब्लिंकन इसी महीने बिलावल भुट्टो से पाकिस्तान आकर द्विपक्षीय बैठक करने का प्रस्ताव रखते हैं। लेकिन, सवाल उठता है, अचानक क्यों?

सैन्य संबंध भी बहाल करने की पहल

सैन्य संबंध भी बहाल करने की पहल

अमेरिकी विदेश मंत्री ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो के सामने पाकिस्तान के साथ व्यापक संबंध बनाने का आह्वान किया और बिलावल को 18 मई को संयुक्त राष्ट्र खाद्य सुरक्षा बैठक के लिए वॉशिंगटन आमंत्रित किया है। इतना ही नहीं, पता तो ये भी तला है कि, पेंटागन ने रावलपिंडी जीएचक्यू (पाकिस्तानी सेना मुख्यालय) और सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा के साथ कम्यूनिकेशन के सैन्य चैनल भी फिर से खोल दिए हैं। लेकिन, अमेरिका का अचानक पाकिस्तान के प्रति प्रेम के क्या मायने हैं? पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान अभी भी इसे समझने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि अमेरिका का व्यवहार काफी चौंकाने वाला है।

इमरान सरकार में खराब हुए संबंध

इमरान सरकार में खराब हुए संबंध

पाकिस्तान के पूर्व पीएम इमरान खान नियाज़ी, जब तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे, अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने उन्हें फोन नहीं किया। जिससे बौखलाए इमरान खान ने रूस के साथ रिश्ता जोड़ना शुरू कर दिया। पाकिस्तान के साथ चीन का रिश्ता पहले से ही अमेरिका को असहज करता आया है, लेकिन यूक्रेन युद्ध के शुरू होने वाले दिन ही इमरान खान का मॉस्को पहुंचना, अमेरिका को हैरान करने वाला था। इसके साथ ही इमरान खान ने साफ कर दिया, पाकिस्तान अब रूस के साथ नये सिरों से रिश्तों को जोड़ेगा, लेकिन, अमेरिका और पाकिस्तान के बीच नए सिरे से शुरू हुई इस बातचीत ने अमेरिका और भारत की कीमत पर इस्लामाबाद को शामिल करने के लिए मास्को की रणनीतिक योजना को विफल कर दिया।

भारत के साथ भी गेम कर रहा था रूस!

भारत के साथ भी गेम कर रहा था रूस!

पिछले एक साल में रूस ने भारत के साथ भी अपने संबंधो को लेकर थोड़ा अलग तरह का व्यवहार दिखाया है और रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने अप्रैल 2021 में नई दिल्ली का दौरा करने के बाद इस्लामाबाद का दौरा किया था और आतंकवाद से लड़ने के नाम पर पाकिस्तान को अतीत में एमआई -35 एम और एमआई -17 हेलीकॉप्टर जैसे अधिक विशेष सैन्य उपकरण की आपूर्ति करने का वादा किया था। रूस ने 2016 से द्रुज़बा (दोस्ती) नामक द्विपक्षीय विशेष बलों के अभ्यास के साथ-साथ अरब सागर में रूस के साथ समुद्री अभ्यास भी किया, जिसे अरब मानसून कहा जाता है। जो भारत को पसंद नहीं था। लेकिन, अमेरिका के एक फोन ने ही पाकिस्तान को रूस से दूर कर दिया है और डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, बिलावल भुट्टो अमेरिका जाने के लिए तैयार हो गये हैं और पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय बिलावल के अमेरिका दौरे की तैयारी में जुट गई है।

रूस के साथ इमरान ने बनाए रिश्ते

रूस के साथ इमरान ने बनाए रिश्ते

बतौर प्रधानमंत्री रहते हुए इमरान खान पाकिस्तान और रूस के बीच के संबंधों को गहरा करना चाहते हैं, और यह तब स्पष्ट हो गया था, जब 24 फरवरी 2022 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मिलने के लिए मास्को पहुंच गये थे, जिस दिन मास्को ने यूक्रेन पर आक्रमण किया था। इतना ही नहीं, इमरान खान ने 15 अगस्त 2021 को काबुल पर तालिबान के कब्जे की प्रशंसा की थी, इसे अफगानिस्तान के लोगों के लिए गुलामी की बेड़ियां तोड़ने जैसा बताया था और अफगानिस्तान में लड़ाई शुरू करने, या फिर जिस तरह से अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से निकली, उसे लेकर इमरान खान ने सीधे तौर पर बाइडेन प्रशासन को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया था। इतना ही नहीं, पाकिस्तान के अपदस्थ प्रधानमंत्री ने यूरोपीय संघ की भी आलोचना की, जब संयुक्त राष्ट्र महासभा के मानवाधिकार सुरक्षा परिषद से वोटिंग के जरिए रूस को सस्पेंड कर दिया गया।

भारत भी अफगान पर सतर्क

भारत भी अफगान पर सतर्क

इतना ही नहीं, जिस तरह से इमरान खान ने खुलकर अफगानिस्तान में तालिबान शासन का समर्थन किया, उसे लेकर नई दिल्ली लगातार अफगान-पाक क्षेत्र के घटनाक्रम पर नजर रख रही है, वहीं पाकिस्तान के नए सिरे से जुड़ाव का अमेरिका का प्राथमिक कारण पड़ोसी अफगानिस्तान में कट्टर तालिबान इस्लामी शासन में अल कायदा का उदय है। तालिबान ने कभी भी अल कायदा को खारिज नहीं किया है, लेकिन, कथित तौर पर तालिबान, इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान प्रांत (आईएसकेपी) का विरोध करता है, जो अफगानिस्तान में खैबर दर्रे के पार पनप रहा है। इसके साथ ही हाइड्रोकार्बन समृद्ध फारस की खाड़ी क्षेत्र के साथ साथ अफगान-पाक क्षेत्र में बढ़ते चीनी प्रभाव ने भी अमेरिका को चिंता में डाल रखा है, लिहाजा अमेरिका के लिए पाकिस्तान को अपने पक्ष में करना एक बड़ी मजबूरी है।

पाकिस्तान करेगा अफगानिस्तान में मदद?

पाकिस्तान करेगा अफगानिस्तान में मदद?

तालिबान के सर्वोच्च नेता हैबतुल्लाह अकुंजदा को लगभग एक साल से किसी ने नहीं देखा है, लेकिन अफगान महिलाओं पर इस्लामी शासन का नवीनतम फरमान स्पष्ट रूप से इंगित करता है, कि तालिबान की अति-रूढ़िवादी नीतियों में कोई बदलाव नहीं हुआ है और अफगानिस्तान की तासिबान सरकार में अल्पसंख्यकों को शामिल करने का वादा सिर्फ एक खोखला सपना है। तथ्य यह है कि अफगान केवल तथाकथित सर्वोच्च नेता की रिकॉर्डिंग कर रहे हैं, जबकि अखुंदजादा कहीं नहीं देखा जा सकता है और पाकिस्तान प्रायोजित हक्कानी नेटवर्क और कंधार आधारित पारंपरिक तालिबान के बीच मुल्ला याकूब के नेतृत्व में सत्ता संघर्ष अभी भी जारी है। अफगानिस्तान में अति-इस्लामिक कट्टरवाद का उदय और पाकिस्तान में इसका फैलाव न केवल भारत के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। लिहाजा, अमेरिका पाकिस्तान को अपने पाले में करके रखना चाहता है। लेकिन, सवाल ये है, कि क्या पाकिस्तान रूस को छोड़कर अमेरिका की तरफ एक बार फिर से खड़ा होगा, क्योंकि पाकिस्तान पर चीन का भी प्रेशर होगा।

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