अमेरिका ने ऑस्ट्रेलिया को चीन के सामने बीच मंछधार में छोड़ा, बाइडेन के धोखे से सदमे में भारत का 'दोस्त'!
परमाणु पनडुब्बी हासिल करने के लिए ऑस्ट्रेलिया ने फ्रांस के साथ एकतरफा करार तोड़ दिया था, जिसको लेकर फ्रांस के साथ उसके रिश्ते काफी खराब हो गया थे।
वॉशिंगटन/कैनबरा, सितंबर 04: ऑस्ट्रेलिया के साथ ऑकस समझौता करने वाले अमेरिका ने चीन के खिलाफ आक्रामक हो रहे ऑस्ट्रेलिया को तगड़ा झटका दिया है और एक तरह से ऑस्ट्रेलिया को बीच मंछधार में फंसा दिया है। अगस्त में आई रिपोर्ट्स के मुताबिक, परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों का अधिग्रहण करने की ऑस्ट्रेलिया की महत्वाकांक्षी योजनाओं को अमेरिका ने बड़ा झटका दिया है और अब अगले कम से कम 10 सालों तक ऑस्ट्रेलिया के दो प्रमुख पार्टनर्स अमेरिका और ब्रिटेन उसे परमाणु ऊर्जा से संचालित पनडुब्बियां बनाने में मदद नहीं देंगे, जबकि ऑकस समझौते में सबसे ज्यादा अहय यही था, कि अमेरिका और ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया के परमाणु ऊर्जा से संचालित होने वाले पनडुब्बयों के निर्माण में मदद देंगे और तीनों पक्ष ऑकस समझौते के तहत इसके लिए तैयार हुए थे।

अमेरिका ने ऑस्ट्रेलिया को दिया झटका
हाल ही में मिशेल इंस्टीट्यूट फॉर एयरोस्पेस स्टडीज के एक सेमिनार में यूएस नेवी रियर एडमिरल स्कॉट पप्पानो से पूछा गया था, कि क्या ऑस्ट्रेलिया को परमाणु ऊर्जा के साथ पनडुब्बी निर्माण करने में मदद करने से अमेरिका अपने पैर पीछे खींच लेगा और जरूरी टेक्नोलॉजी और संसाधन उपलब्ध नहीं कराएगा? इस सवाल के जवाब में पप्पनो ने कहा कि, "यदि आप मेरी राय पूछ रहे हैं और अगर हम अपने औद्योगिक आधार में अतिरिक्त पनडुब्बी निर्माण को शामिल करने जा रहे हैं, तो यह अतिरिक्त क्षमता प्रदान करना महत्वपूर्ण निवेश के बिना अभी हमारे लिए हानिकारक होगा।" वहीं, ब्रिटेन भी अमेरिका के समान स्थिति में ही मौजूद है। जबकि, पूर्व ऑस्ट्रेलिया सरकार के रक्षा मंत्री रहे पीटर डटन ने जू महीने में कहा था, कि अमेरिका परमाणु ऊर्जा से संचालित होने वाली दो पनडुब्बियां साल 2030 तक ऑस्ट्रेलिया को सौंप देगा, हालांकि अपने इस बयान के पीछे उन्होंने किसी तरह का सबूत पेश नहीं किया और समय सीमा देने के पीछे की भी कोई वजह नहीं बताई।

ऑस्ट्रेलिया को अमेरिका से झूठी उम्मीद?
राष्ट्रीय टेलीविजन पर ऑस्ट्रेलिया के पूर्व रक्षा मंत्री की ये टिप्पणी क्या उनकी झूठी उम्मीद है? क्योंकि, ऑस्ट्रेलिया पूर्व रक्षा मंत्री ने विश्वास जताते हुए कहा था, कि अमेरिका ऑस्ट्रेलिया को परमाणु पनडुब्बियों के अधिग्रहण में मदद करने के लिए सभी समस्याओं को हटा देगा। हालांकि, अब अमेरिकी अधिकारी पप्पानो के बयानों से ऐसा प्रतीत होता है कि इस तरह की जल्दी डिलीवरी की संभावना कम हो गई है। इस तरह की चुनौतियां परमाणु पनडुब्बी डील को निस्संदेह प्रभावित करेंगी, कि अमेरिका कितनी तेजी से ऑस्ट्रेलिया को परमाणु पनडुब्बी की आपूर्ति करने में सक्षम हो सकता है। इसके अलावा, यूएस कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस (सीआरएस) की अगस्त 2022 की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि अमेरिका अपनी परमाणु पनडुब्बी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, यूएस वर्जीनिया-क्लास परमाणु पनडुब्बी कार्यक्रम ने अपने शुरुआती चरणों में "लागत वृद्धि" का अनुभव किया है और अब कंपनी को स्पेयर पार्ट्स की कमी, रखरखाव में देरी और शिपयार्ड की डिलीवरी की क्षमता के बारे में चिंताओं से पीड़ित है।

अमेरिका का पनडुब्बी कार्यक्रम खतरे में होगा?
इन समस्याओं के अलावा अमेरिकी अधिकारी पप्पानो ने बताया कि, परमाणु पनडुब्बियों के अधिग्रहण की ऑस्ट्रेलिया की योजना अमेरिका के अपने परमाणु पनडुब्बी कार्यक्रम को खतरे में डाल सकती है। पप्पानो के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में अमेरिकी पनडुब्बी का उत्पादन 2020 की तुलना में पांच गुना अधिक होने की उम्मीद है। कार्यभार में वृद्धि में वर्जीनिया-श्रेणी के को-प्रोडक्शन को एक साल में दो नावों तक दोगुना करना और नया वर्जीनिया ब्लॉक वी संस्करण पेश करना शामिल है, जिसमें 25-मीटर मिडसेक्शन है जो 28 टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों को रख सकता है। इसके अलावा, अमेरिका अपनी पुरानी ओहियो-श्रेणी की बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों को नए कोलंबिया वर्ग के लिए चरणबद्ध कर रहा है। पहली नाव को 2027 में सेवा में प्रवेश करने का अनुमान है, जिसमें 12 कोलंबिया उप-वर्ग को 14 लंबे समय से सेवा देने वाली ओहियो-श्रेणी की इकाइयों को बदलने के लिए तैयार हैं, जो पहली बार 1976 में सेवा में प्रवेश किया था। निक्केई समाचार रिपोर्ट में प्रोफेसर टेटसुओ कोटानी कहते हैं कि, लॉस एंजिल्स- और ओहियो-श्रेणी की पनडुब्बियों का सामूहिक तौर पर रिटायर्ड होना अमेरिका की समुद्री क्षमता को खतरनाक स्तर तक प्रभावित करेंगी। लिहाजा, अब अमेरिका पहले अपनी सुरक्षा को ध्यान में रखना चाहेगा।

अमेरिका की क्षमता कैसे होगी प्रभावित?
प्रोफेसर टेटसुओ कोटानी के मुताबिक, मौजूदा समय में अमेरिका के पास ज्यातातर परमाणु पनडुब्बियां साल 2020 के बाद से रिटायर्ड होने की सीमा रेखा को पार तक चुकी हैं, जिसके बाद अमेरिका की परमाणु पनडुब्बी ताकत में काफी ज्यादा कमी आएगी, क्योंकि अमेरिका में भी पनडुब्बियों के उस स्तर तक उत्पादन की संभावना काफी कम है। लिहाजा, साल 2027 के बाद से अमेरिका की परमाणु पनडुब्बी की क्षमता को अंदर से खोखला कर देंगी, खासकर उस स्थिति में, जब चीन ताइवान पर आक्रमण करने की योजना बना रहा है। इस प्रकार यह अत्यधिक संभावना है कि, अमेरिका अपनी स्वयं की रक्षा आवश्यकताओं को खतरे में डालकर परमाणु पनडुब्बियों को ऑस्ट्रेलिया को सौंपने की किसी योजना को फिलहाल अनुमति नहीं देगा। हालांकि, इसके बावजूद ऑस्ट्रेलिया के पास अभी भी अपनी लंबे समय से सेवा देने वाली कॉलिन्स-श्रेणी की नावों को बदलने के विकल्प हैं, जो कई सारी समस्याओं खराब वेल्डिंग, अत्यधिक शोर, अविश्वसनीय इंजन, गैर-सुव्यवस्थित पेरिस्कोप और अप्रचलित युद्ध प्रणाली शामिल हैं। हालांकि, इन कामों के लिए ऑस्ट्रेलिया के पास बजट की भी काफी कमी है।

क्या पारंपरिक पनडुब्बियों की तरफ बढ़ेगा ऑस्ट्रेलिया
हालांकि, वरिष्ठ रक्षा विश्लेषक ब्रेंट सैडलर ने निक्केई की एक रिपोर्ट में नोट किया है कि, ऑस्ट्रेलिया से पूंजी निवेश से अमेरिका में पनडुब्बी आपूर्ति आधार को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे AUKUS के लिए परमाणु पनडुब्बियों की आपूर्ति करने के लिए अमेरिकी क्षमताओं को जोड़ा जा सकता है, लेकिन, अमेरिका अपने स्वयं के पनडुब्बी कार्यक्रम को खतरे में नहीं डाल सकता है। वहीं, एशिया टाइम्स ने उल्लेख किया है कि, ऑस्ट्रेलिया परमाणु की प्रतीक्षा करते हुए लंबी दूरी की पारंपरिक पनडुब्बियों की खरीदारी पर फिर से विचार कर सकता है। आपको बता दें कि, ऑस्ट्रेलिया ने पहले फ्रांस से डीजल ऊर्जा से संचालित होने वाले 12 बाराकुडा शॉर्टफिन पारंपरिक पनडुब्बियों के निर्माण के लिए डील किया था, लेकिन अमेरिका के साथ ऑकस निर्माण के बाद ऑस्ट्रेलिया ने इस डील को अचानक खारिज कर दिया, जिससे फ्रांस काफी नाराज भी हुआ था और फ्रांस ने अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया को धोखेबाज कहा था, लेकिन अब खुद ऑस्ट्रेलिया को अमेरिका से धोखा मिलने की संभावना है।

इजरायल की तरफ देखेगा ऑस्ट्रेलिया
एशिया टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अब ऑस्ट्रेलिया अन्य बड़ी पारंपरिक नावों जैसे कि इजरायली डकार-क्लास या दक्षिण कोरियाई KSS-III-क्लास के डेरिवेटिव पर विचार करना चाह सकता है। ऑस्ट्रेलिया अपनी कोलिन्स-श्रेणी की नौकाओं के प्रतिस्थापन सेवा में प्रवेश करने तक अपनी पानी के भीतर युद्ध क्षमता अंतराल को भरने के लिए मानव रहित पनडुब्बियों का उपयोग करने पर भी विचार कर सकता है। एशिया टाइम्स ने ऑस्ट्रेलिया के मानव रहित पनडुब्बियों को विकसित करने को लेकर पिछले दिनों एक रिपोर्ट दी थी, जिसको लेकर संभावना है, कि उसे ऑस्ट्रेलिया संभावित रूप से लोम्बोक, सुंडा और मकासर जलडमरूमध्य में चोकपॉइंट्स को कवर करने के लिए तैनात कर सकता है।

ऑस्ट्रेलिया के पास क्या हैं ऑप्शन?
इसके अलावा, ऑस्ट्रेलिया यूएस वर्जीनिया-श्रेणी की नाव के बजाय सेकेंड-हैंड यूके एस्ट्यूट परमाणु पनडुब्बी का अधिग्रहण कर सकता है। डिफेंस न्यूज ने इस महीने रिपोर्ट दी है, कि ऑस्ट्रेलियाई पनडुब्बियां अपने यूके समकक्षों के साथ लेटेस्ट एस्ट्यूट-क्लास पनडुब्बी, एचएमएस एंसन पर प्रशिक्षण ले रही हैं, जो बाद में यूके-निर्मित पनडुब्बी के सिस्टम से परिचित हैं। डिफेंस न्यूज की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि, यूके में सात नियोजित एस्ट्यूट-क्लास नावें हैं, जिनमें से पांच पहले से ही सेवा में हैं और दो निर्माण के उन्नत चरणों में 2025 के मध्य में सेवा में प्रवेश करने के लिए तैयार हैं और उन्हें रिप्लेस करने की तैयारी पहले से ही शुरू हो चुकी है।
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