Chabahar Port: भारत के लिए चाबहार पोर्ट क्यों है अहम, NSA अजीत डोभाल ने ईरान से क्या बात की?
Chabahar Port and INSTC: भारत और ईरान के बीच रणनीतिक सहयोग को नई मजबूती उस समय मिली जब भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल और ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव तथा सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि डॉ. अली अकबर अहमदियन के बीच टेलीफोन पर अहम बातचीत हुई। यह जानकारी भारत में ईरान के दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर साझा की।
न्यूज एजेंसी ANI के अनुसार इस बातचीत में डोभाल ने क्षेत्र में ईरान की रचनात्मक भूमिका की सराहना करते हुए विशेष रूप से चाबहार बंदरगाह और अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) के विकास में भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया। उन्होंने ईरान को सहयोग और समर्थन के लिये धन्यवाद भी दिया।

डॉ. अहमदियन ने भारत और ईरान को दो प्राचीन सभ्यताओं के रूप में वर्णित करते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच गहरे ऐतिहासिक, राजनीतिक और आर्थिक संबंध हैं। उन्होंने रणनीतिक परियोजनाओं को शीघ्र लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि यह सहयोग क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के व्यापक हितों की पूर्ति करेगा।
क्या है चाबहार बंदरगाह समझौता?
इस उच्च-स्तरीय बातचीत की पृष्ठभूमि में वर्ष 2024 में भारत और ईरान के बीच हुआ वह दीर्घकालिक समझौता है, जिसके तहत इंडियन पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) और ईरान के पोर्ट एंड मैरीटाइम ऑर्गनाइज़ेशन (PMO) के बीच शाहिद बेहिश्ती टर्मिनल के संचालन हेतु 10 वर्षों का अनुबंध किया गया। इस समझौते में विवादों के समाधान के लिए नेताओं के बीच संवाद और सहयोग को प्राथमिक माध्यम के रूप में स्वीकार किया गया है।
चाबहार, ईरान का एकमात्र समुद्री बंदरगाह, भारत के लिए न केवल भू-राजनीतिक दृष्टि से बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह बंदरगाह भारत को अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरेशिया तक एक वैकल्पिक व्यापारिक मार्ग प्रदान करता है, जिससे पाकिस्तान पर निर्भरता कम होती है।
INSTC से भारत को क्या व्यापारिक लाभ?
INSTC के माध्यम से भारत, ईरान, रूस और यूरोप को जोड़ने वाले एक प्रमुख मल्टी-मॉडल परिवहन गलियारे के केन्द्र में चाबहार स्थित है। यह मार्ग कार्गो परिवहन में 30% लागत और 40% समय की बचत सुनिश्चित करता है। इसके माध्यम से भारत ऊर्जा संसाधनों से समृद्ध लेकिन समुद्र से रहित मध्य एशियाई देशों जैसे कज़ाखस्तान और उज़्बेकिस्तान के बाज़ारों तक बेहतर पहुँच बना सकता है।
मानवीय सहायता और रणनीतिक असर
चाबहार ने मानवीय सहायता के क्षेत्र में भी भारत को एक अहम मंच दिया है। कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने इसी मार्ग से अफगानिस्तान को 2.5 मिलियन टन गेहूँ और 2,000 टन दालें भेजीं। वर्ष 2021 में भारत ने ईरान को टिड्डी संकट से निपटने हेतु पर्यावरण-अनुकूल कीटनाशक भी इसी मार्ग से भेजा।
सुरक्षा की दृष्टि से चाबहार, चीन द्वारा पाकिस्तान में बनाए जा रहे ग्वादर बंदरगाह के प्रभाव को संतुलित करने के लिए भारत का रणनीतिक जवाब भी है। यह अरब सागर में भारत की समुद्री उपस्थिति को भी मज़बूती प्रदान करता है।
चुनौतियाँ और वैश्विक दबाव
हालांकि, इस परियोजना को लेकर चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। ईरान पर अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के चलते भारत को भविष्य में जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है। हाल ही में अमेरिका ने भारत को इस समझौते के संबंध में प्रतिबंधों के संभावित खतरे की चेतावनी दी है। वहीं, हाउथी विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में पैदा की गई अस्थिरता, अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी और ईरान-इज़राइल तनाव जैसी क्षेत्रीय परिस्थितियाँ भी इस परियोजना की प्रगति को प्रभावित कर सकती हैं।
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