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'ये अपनी ही बोलता है, इसे उठा लो...' - वुसत का ब्लॉग

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आज हमारा सियासत वियासत पर बतियाने का बिलकुल भी मन नहीं है. लिहाज़ा हम आपको ज़बरदस्ती तीन नज़्मे सुनाएंगे.

पहली नज़्म अहमद फ़रहाद की है, दूसरी अक़ील अब्बास जाफ़री की है और तीसरी नज़्म हबीब जालिब मरहूम की है.

और इन तीनों नज़्मों को हम दक्षिण एशियाई लोग ही अच्छे से समझ कर इसका मज़ा ले सकते हैं.

अहमद फ़राद की पहली नज़्म सुनिए-

ये अपनी मर्ज़ी से सोचता है इसे उठा लो

उठाने वालों से कुछ जुदा है इसे उठा लो

वो बेअदब इससे पहले जिन्हें उठा लिया था

ये उनके बारे में पूछता है इसे उठा लो

इसे बताया भी था कि क्या बोलना है, क्या नहीं बोलना

मगर ये अपनी ही बोलता है, इसे उठा लो

जिन्हें उठाने पे हमने बख़्शे मकामों खिलत

ये उन सयानों पे हंस रहा है, इसे उठा लो

ये पूछता है कि ये अमन ये आमा का मसला क्यूं

ये अमन ऐ आमां का मसला है, इसे उठा लो

इसे कहा था जो हम दिखाएं बस उतना देखो

मगर ये मर्ज़ी से देखता है, इसे उठा लो

सवाल करता है ये दीवाना हमारी हद पे

ये अपनी हद से गुज़र गया है इसे उठा लो

https://www.youtube.com/watch?v=Loc7lPUBzvs

अब्बास जाफ़री की दूसरी नज़्म

पहले शहर को आग लगाएं नामालूम अफ़राद (लोग)

और फिर अमन के नगमें गाएं नामालू अफ़राद

लगता है इंसान नहीं है कोई छलावा हैं

सब देखें और नज़र ना आएं नामालूम अफ़राद

हम सब ऐसे शहर ए नापुर्सा के वासी है

जिसका नज़्मों नष्ट चलाएं नामालूम अफ़राद

लगता है कि शहर का कोई वाली ना वारिस

हर जानिब बस धूम मचाएं नामालूम अफ़राद

पहले मेरे घर के अंदर मुझ को क़त्ल करें

और फिर मेरा शोग मनाएं नामालूम अफ़राद

इनका कोई नाम ना मसलक और ना कोई नस्ल

काम से बस पहचाने जाएं नामालूम अफ़राद

शहर में जिस जानिब भी जाएँ एक ही मंज़र हैं

आगे पीछे, दायें-बायें, नामालूम अफ़राद

https://www.youtube.com/watch?v=EkzICrcMlTM

हबीब जालिब की तीसरी नज़्म

मैंने उससे ये कहा

ये जो दस करोड़ हैं

जेहल का निचोड़ हैं

इनकी फ़िक्र सो गई

हर उम्मीद की किस

ज़ुल्मतों में खो गई

ये खबर दुरुस्त है

इनकी मौत हो गई

बे शऊर लोग हैं

ज़िन्दगी का रोग हैं

और तेरे पास है

इनके दर्द की दवा

मैंने उससे ये कहा

तू ख़ुदा का नूर है

अक्ल है शऊर है

क़ौम तेरे साथ है

तेरे ही वज़ूद से

मुल्क की नजात है

तू है मेहरे सुबहे नौ

तेरे बाद रात है

बोलते जो चंद हैं

सब ये शर पसंद हैं

इनकी खींच ले ज़बाँ

इनका घोंट दे गला

मैंने उससे ये कहा

जिनको था ज़बाँ पे नाज़

चुप हैं वो ज़बाँ-दराज़

चैन है समाज में

वे मिसाल फ़र्क है

कल में और आज में

अपने खर्च पर हैं क़ैद

लोग तेरे राज में

आदमी है वो बड़ा

दर पे जो रहे पड़ा

जो पनाह माँग ले

उसकी बख़्श दे ख़ता

मैंने उससे ये कहा

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