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"मैं सबसे किस्मत वाली और बदकिस्मत एक साथ हो गई": अफगान मेडिकल प्रवेश परीक्षा की टॉपर

काबुल, 30 अगस्त। 20 साल की साल्गी को पिछले हफ्ते जब पता चला कि उसने यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षा में टॉप किया है, तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. पिछले कई महीनों से साल्गी अपने घर में बंद इस परीक्षा की तैयारी में जुटी थी. और जब रिजल्ट आना था तो उनका पूरा परिवार सोलर एनर्जी से चलने वाले टीवी के सामने डटा था.

Provided by Deutsche Welle

साल्गी कहती हैं कि उनकी मेहनत रंग लाई है. वह बताती हैं, "उस पल में मुझे लगा कि किसी ने मुझे पूरी दुनिया तोहफे में दे दी है. मेरी मां खुशी से रोने लगी. और उसके साथ मैं रोने लगी."

अनिश्चित भविष्य

साल्गी और उनके परिवार की यह खुशी जल्दी ही चिंता में बदल गई क्योंकि उन्हें याद आ गया कि देश अब तालिबान के नियंत्रण में है. 15 अगस्त को तालिबान काबुल में घुस गया था और अब देश शरिया कानून लागू होने की तैयारी कर रहा है. पिछली बार जब तालिबान सत्ता में था तो महिलाओं के पढ़ने और काम करने पर कड़ी पाबंदियां थीं.

साल्गी की कड़ी मेहनत की गवाही देते सर्टिफिकेट

साल्गी कहती हैं, "हमारा भविष्य अनिश्चित है. सोचते रहते हैं कि अब क्या होगा. मुझे लगता है कि मैं सबसे किस्मत वाली और बदकिस्मत एक साथ हूं."

देश की करीब दो तिहाई आबादी 25 साल से कम आयु की है. यानी पूरी एक पीढ़ी है जिसे तालिबान का शासन याद नहीं है, जो 20 साल पहले सत्ता से हटा दिए गए थे. 1996 से 2001 तक तालिबान ने अफगानिस्तान पर राज किया था लेकिन 9/11 के आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया और तालिबान को सत्ता से बाहर कर दिया.

आजादी छिनने का डर

दोबारा सत्ता में आने के बाद तालिबान ने छात्रों को यकीन दिलाया है कि उनकी पढ़ाई प्रभावित नहीं होगी. उन्होंने कहा है कि महिला अधिकारों का सम्मान किया जाएगा. साथ ही तालिबान ने प्रतिभाशाली पेशेवरों से देश ना छोड़ने की भी अपील की है.

तस्वीरों मेंः मिशन काबुल

लेकिन मोबाइल फोन, पॉप म्यूजिक और लैंगिक मिश्रण की आदि हो चुकी इस नई पीढ़ी को पुरानी बातों के आधार पर डर सता रहा है कि उनकी सारी आजादियां छीन ली जाएंगी. समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने कई युवाओं से बातचीत की.

21 साल की सूजन नबी कहती हैं कि उन्होंने बड़ी बड़ी योजनाएं बना रखी थीं. वह बताती हैं, "अपने लिए मैंने आने वाले 10 साल के लिए कई ऊंचे लक्ष्य तय किए थे. हमें जिंदगी की उम्मीद थी, बदलाव की उम्मीद थी. लेकिन एक हफ्ते में उन्होंने देश कब्जा लिया और 24 घंटे में हमारी उम्मीदें, हमारे सपने हमसे छीन लिए गए."

इस बारे में तालिबान प्रवक्ता को कुछ सवाल भेजे गए हैं, जिनके जवाब अब तक नहीं मिले हैं.

15 अगस्त की सुबह जब तालिबान काबुल की ओर बढ़ रहे थे जब 26 साल के जावेद यूनिवर्सिटी से घर की ओर दौड़ पड़े थे. अपना पूरा नाम बताने से डर रहे जावेद ने सारे ईमेल, सारे सोशल मीडिया मेसेज डिलीट कर दिए हैं, खासकर वे जो अमेरीकियों को भेजे गए थे.

जावेद बताते हैं कि अमेरिकी फंड से चलने वाले प्रोग्राम से उन्हें जितने भी सर्टिफिकेट मिले थे, वे सारे उन्होंने अपने घर के पिछवाड़े में जला दिए. अपने अच्छे काम के लिए उन्हें एक ट्रोफी मिली थी जो उन्होंने तोड़ दी. पिछले दो हफ्ते में ऐसे तमाम लोगों ने देश छोड़ देने की कोशिश की है, जो विदेशी संस्थाओं के लिए काम करते थे.

इतिहास का डर

इन युवाओं ने तालिबान को अपने माता-पिता द्वारा सुनाए गए किस्से-कहानियों में ही जाना है. बहुतों ने तो पहली बार तालिबान लड़ाकों को देखा भी तब जब वे काबुल की सड़कों पर पट्रोलिंग करते नजर आए.

लोकतांत्रिक सरकार के दौरान अफगानिस्तान में सेकंड्री स्कूल में बच्चों की संख्या काफी बढ़ी है. 2001 में 12 फीसदी बच्चे सेकंडरी स्कूल में दाखिला लेते थे. वर्ल्ड बैंक के मुताबिक 2018 में इनकी संख्या बढ़कर 55 फीसदी हो गई.

देखिएः अफगानिस्तान पर 10 फिल्में

कभी देश में सिर्फ एक रेडियो स्टेशन हुआ करता था, आज वहां 170 रेडियो स्टेशन, 100 से ज्यादा अखबार और दर्जनों टीवी स्टेशन हैं. और, स्मार्टफोन और इंटरनेट तो तालिबान के राज में होता ही नहीं था, जिसने युवाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय सीमाएं खोल दी हैं.

18 साल की इलाहा तमीम ने यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षा पास की है. वह कहती हैं, "ये चीजें तो हम हर वक्त इस्तेमाल करते हैं. जब रिलैक्स होना है तब भी और जब दुनिया में हो रही नई घटनाओं के बारे में जानना है तब भी. मैं इन्हें खोना नहीं चाहती."

तालिबान के भरोसा देने के बावजूद बहुत सी लड़कियों ने स्कूल आना बंद कर दिया है. तमीम कहती हैं, "मैं ऐसे माहौल में बड़ी हुई हूं जहां हम आजाद थे. स्कूल जा सकते थे. बाहर जहां चाहे जा सकते थे. मेरी मां उस बुरे वक्त की कहानियां सुनाती है. वे कहानियां बहुत डरावनी हैं."

दोहा स्थित तालिबान के राजनीतिक दफ्तर के सदस्य अम्मार यासिर ने प्रवेश परीक्षा में प्रथम आने वाली साल्गी को खुद बधाई दी है. मेडिकल स्कूल में दाखिले के लिए यारिस ने ट्विटर पर शुभकामनाएं भेजी हैं.

साल्गी उम्मीद करती हैं कि वह डॉक्टर बन पाएंगी. वह कहती हैं, "अगर तालिबान लड़कियों को उच्च शिक्षा हासिल करने देता है और रुकावट पैदा नहीं करता है तो ठीक है. नहीं तो मेरी जिंदगी की सारी मेहनत खतरे में है."

वीके/एए (रॉयटर्स)

Source: DW

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